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सेरेब्रल पाल्सी और डिस्लेक्सिया भी नहीं रोक पाया यश का जज्बा, आईआईएम लखनऊ में मिला दाखिला

Tue, 08 Sep 2020 03:51 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: Sneha Baluni Updated Tue, 08 Sep 2020 03:51 PM IST
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mumbai youth suffering from cerebral palsy dyslexia make it to iim lucknow by getting 92 percent in cat 2019
यश गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media

21 साल के यश अवधेश गांधी ने जीवन में आई हर मुसीबत को पीछे छोड़कर आईआईएम लखनऊ में दाखिला लिया है। उनकी कहानी प्रेरणादायक है क्योंकि वे सेरेब्रल पाल्सी और डिस्लेक्सिया जैसी बीमारी से पीड़ित हैं। उन्हें लिखित परीक्षा देने के लिए एक लेखक की जरूरत होती है। वे लंगड़ाकर चलते हैं इसके बावजूद मुंबई की लोकल ट्रेन से यात्रा करते हैं। 

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इतना ही नहीं उनका उच्चारण अस्पष्ट है लेकिन उनकी भावनाएं उनके विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती हैं। सेरेब्रल पाल्सी और डिस्लेक्सिया ऐसी स्थिति को कहते हैं जिसमें बोलने के लिए जरूरी मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। हालांकि इसमें से कोई भी दिक्कत उन्हें कैट-2019 में 92.5 अंक लाने से नहीं रोक सकी। 
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गांधी ने आईआईएम लखनऊ में शैक्षणिक सत्र 2020-22 के लिए विकलांग कोटा के तहत दाखिला लिया है। इसपर मुंबई में रहने वाले गांधी ने कहा कि उनके लिए इससे ज्यादा खुशी की बात नहीं हो सकती। उन्होंने कहा, ‘मैं आईआईएम लखनऊ का हिस्सा बनकर खुश हूं।’ वे पिछले महीने से ऑनलाइन कक्षाएं ले रहे हैं।
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यश ने कैट के लिए जुलाई 2018 में तैयारी शुरू कर दी थी, जब वह अपने स्नातक पाठ्यक्रम के दूसरे वर्ष में थे। उन्होंने कहा, ‘मुझे संख्याओं के साथ समस्याओं होती हैं। इसलिए मुझे क्वांटीटेटिव एबिलिटी सेक्शन में अतिरिक्त प्रयास करना पड़ा। यह कठिन था लेकिन असंभव नहीं था।’ उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और उन्हें आईआईएम बंगलूरू छोड़कर सभी आईआईएम से इंटरव्यू के लिए फोन आया। उन्हें आईआईएम कोझीकोड और इंदौर से ऑफर लेटर मिले थे उच्च रैंक की वजह से लखनऊ को चुना। 

यश के माता-पिता उनके सपोर्ट सिस्टम हैं। निजी कंपनी में काम करने वाले अवधेश गांधी ने कहा, ‘जब वह स्कूल गया तो उसे सीखने में कठिनाई का सामना करना पड़ा और वह अपने सहपाठियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं था। लेकिन उसने धीरे-धीरे सीखा। उसे हमेशा सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ी।’

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