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MP Election 2023: शिवपुरी की लड़ाई कपड़े फाड़ने तक क्यों आई, छह बार के विधायक की सीट बदलने के क्या मायने?
Wed, 18 Oct 2023 05:43 PM IST
जयदेव सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: जयदेव सिंह
Updated Wed, 18 Oct 2023 05:43 PM IST
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शिवपुरी सीट
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
मध्य प्रदेश चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद कई जगह बगावती सुर सुनाई दे रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा शिवपुरी सीट को लेकर हो रही है। इस सीट पर पार्टी ने शिवपुरी जिले की ही पिछोर सीट से छह बार के विधायक केपी सिंह को टिकट दिया है।केपी सिंह को टिकट मिलने के बाद भाजपा से कांग्रेस में आए वीरेंद्र रघुवंशी नाराज हैं। उनके समर्थक नाराजगी जताने भोपाल तक पहुंच गए। यहां प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के सामने हुई उनकी नोकझोंक के एक वीडियो ने सियासी पारा काफी बढ़ा दिया है। बात कपड़े फटने तक आ गई।
आखिर इस वीडियो में ऐसा क्या था? वीडियो सामने आने के बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच टकराव की खबरें क्यों आईं? शिवपुरी सीट को लेकर क्यों ववाल हो रहा है? पिछोर से छह बार जीतने वाले केपी सिंह शिवपुरी क्यों भेजे गए? शिवपुरी सीट का सियासी इतिहास कैसा है? आइये जानते हैं…
अभी क्या हुआ है?
कांग्रेस ने नवरात्र के पहले दिन 144 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की। इसके बाद कई जगह विरोध और बगावत के मामले सामने आए। भाजपा से कांग्रेस में आए कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी को टिकट नहीं मिलने पर उनके समर्थक मंगलवार को कमलनाथ के सामने विरोध प्रदर्शन करने पहुंचे। यहां पर कमलनाथ ने उनको दिग्विजय सिंह और जयवर्धन सिंह के कपड़े फाड़ने की बात कह दी। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। भाजपा ने भी वीडियो को लेकर तंज कसा। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'जब परिवार बड़ा होता है तो सामूहिक सुख और सामूहिक द्वंद्व दोनों होते हैं। समझदारी यही कहती है कि बड़े लोग धैर्यपूर्वक समाधान निकालें। ईश्वर भी उन्हीं का साथ देते हैं जो मन और मेहनत का मेल रखते हैं।'
कुछ देर बाद ही दोनों नेता वचन पत्र जारी करने एक मंच पर आए। वचन पत्र जारी करने से पहले कमलनाथ से कपड़े फाड़ने वाली बात को लेकर सवाल किया गया। कमलनाथ ने कहा, 'मैंने कहा था यदि आपकी बात वह नहीं मानें तो आप भी उनके कपड़े फाड़िए।' इस पर दिग्विजय सिंह ने उनको टोकते हुए कहा, 'भैया, ए और बी फॉर्म पर दस्तखत किसके होते हैं? ये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के, तो कपड़े किसके फटने चाहिए? बताओ।' दोनों के बीच इस संवाद को सुनकर लोगों ने भी ठहाके लगाए।
कांग्रेस ने नवरात्र के पहले दिन 144 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की। इसके बाद कई जगह विरोध और बगावत के मामले सामने आए। भाजपा से कांग्रेस में आए कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी को टिकट नहीं मिलने पर उनके समर्थक मंगलवार को कमलनाथ के सामने विरोध प्रदर्शन करने पहुंचे। यहां पर कमलनाथ ने उनको दिग्विजय सिंह और जयवर्धन सिंह के कपड़े फाड़ने की बात कह दी। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। भाजपा ने भी वीडियो को लेकर तंज कसा। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'जब परिवार बड़ा होता है तो सामूहिक सुख और सामूहिक द्वंद्व दोनों होते हैं। समझदारी यही कहती है कि बड़े लोग धैर्यपूर्वक समाधान निकालें। ईश्वर भी उन्हीं का साथ देते हैं जो मन और मेहनत का मेल रखते हैं।'
कुछ देर बाद ही दोनों नेता वचन पत्र जारी करने एक मंच पर आए। वचन पत्र जारी करने से पहले कमलनाथ से कपड़े फाड़ने वाली बात को लेकर सवाल किया गया। कमलनाथ ने कहा, 'मैंने कहा था यदि आपकी बात वह नहीं मानें तो आप भी उनके कपड़े फाड़िए।' इस पर दिग्विजय सिंह ने उनको टोकते हुए कहा, 'भैया, ए और बी फॉर्म पर दस्तखत किसके होते हैं? ये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के, तो कपड़े किसके फटने चाहिए? बताओ।' दोनों के बीच इस संवाद को सुनकर लोगों ने भी ठहाके लगाए।
शिवपुरी सीट
- फोटो :
AMAR UJALA
वीरेंद्र रघुवंशी तो कोलारस विधायक हैं फिर शिवपुरी सीट से दावेदारी क्यों?
2004 के लोकसभा चुनाव के बाद यशोधरा राजे ने शिवपुरी सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद हुए उप-चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर वीरेंद्र रघुवंशी ही उतरे थे। उन्होंने यहां से कांग्रेस को जीत दिलाई। 2008 के विधानसभा चुनाव में रघुवंशी फिर से मैदान में थे। हालांकि, उन्हें भाजपा के माखन लाल राठौड़ ने 1,751 वोट से हरा दिया।
2013 में एक बार फिर भाजपा ने यहां से यशोधरा राजे सिंधिया को टिकट दिया। वहीं, कांग्रेस के टिकट पर एक बार फिर वीरेंद्र रघुवंशी मैदान में थे। रघुवंशी को इस बार 11,145 वोट से हार मिली।
2018 के चुनाव में वीरेंद्र रघुवंशी पाला बदलकर भाजपा में आ गए। भाजपा ने उन्हें शिवपुरी जिले की ही कोलारस सीट से मैदान में उतारा। रघुवंशी ने यहां से कांग्रेस के महेंद्र यादव को महज 720 वोट के अंतर से मात दे दी। भाजपा के टिकट पर विधायक बने रघुवंशी ने 2023 के चुनाव से चंद महीने पहले ही कांग्रेस में वापसी कर ली। रघुवंशी इस बार फिर से शिवपुरी सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन उनकी जगह कांग्रेस ने केपी सिंह को टिकट दे दिया। इसके बाद से ही यह बगावत शुरू हुई है।
2004 के लोकसभा चुनाव के बाद यशोधरा राजे ने शिवपुरी सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद हुए उप-चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर वीरेंद्र रघुवंशी ही उतरे थे। उन्होंने यहां से कांग्रेस को जीत दिलाई। 2008 के विधानसभा चुनाव में रघुवंशी फिर से मैदान में थे। हालांकि, उन्हें भाजपा के माखन लाल राठौड़ ने 1,751 वोट से हरा दिया।
2013 में एक बार फिर भाजपा ने यहां से यशोधरा राजे सिंधिया को टिकट दिया। वहीं, कांग्रेस के टिकट पर एक बार फिर वीरेंद्र रघुवंशी मैदान में थे। रघुवंशी को इस बार 11,145 वोट से हार मिली।
2018 के चुनाव में वीरेंद्र रघुवंशी पाला बदलकर भाजपा में आ गए। भाजपा ने उन्हें शिवपुरी जिले की ही कोलारस सीट से मैदान में उतारा। रघुवंशी ने यहां से कांग्रेस के महेंद्र यादव को महज 720 वोट के अंतर से मात दे दी। भाजपा के टिकट पर विधायक बने रघुवंशी ने 2023 के चुनाव से चंद महीने पहले ही कांग्रेस में वापसी कर ली। रघुवंशी इस बार फिर से शिवपुरी सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन उनकी जगह कांग्रेस ने केपी सिंह को टिकट दे दिया। इसके बाद से ही यह बगावत शुरू हुई है।
शिवपुरी सीट
- फोटो :
AMAR UJALA
केपी सिंह को शिवपुरी सीट से टिकट क्यों?
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कमलनाथ सरकार में मंत्री रहे केपी सिंह शिवपुरी जिले की ही पिछोर विधानसभा सीट से विधायक हैं। केपी सिंह पिछोर से सीट से लगातार छह चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने 1993, 1998, 2003, 2008, 2013 और 2018 के विधानसभा चुनाव में पिछोर सीट पर कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की है। इस बार पार्टी ने उन्हें पिछोर की जगह शिवपुरी से चुनाव मैदान में उतारा है। पार्टी जिले के कद्दावर नेता के जरिए इस सीट पर अपनी हार का क्रम तोड़ने की उम्मीद कर रही है।
दूसरी ओर शिवपुरी सीट से विधायक यशोधरा राजे सिंधिया पहले ही चुनाव नहीं लड़ने का एलान कर चुकीं हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि भाजपा यहां से केंद्रीय मंत्री और यशोधरा के भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया को टिकट दे सकती है। सिंधिया और केपी सिंह की तकरार और दोस्ती दोनों इस क्षेत्र में चर्चा में रही है। सिंधिया के अलावा इस सीट से भाजपा की ओर से देवेंद्र जैन, धैर्यवर्धन शर्मा, रामजी व्यास, राजू बाथम जैसे नाम भी चर्चा में रहे हैं। ऐसे में इस सीट पर भाजपा किसे उम्मीदवार बनाएगी यह देखना भी दिलचस्प होगा।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कमलनाथ सरकार में मंत्री रहे केपी सिंह शिवपुरी जिले की ही पिछोर विधानसभा सीट से विधायक हैं। केपी सिंह पिछोर से सीट से लगातार छह चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने 1993, 1998, 2003, 2008, 2013 और 2018 के विधानसभा चुनाव में पिछोर सीट पर कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की है। इस बार पार्टी ने उन्हें पिछोर की जगह शिवपुरी से चुनाव मैदान में उतारा है। पार्टी जिले के कद्दावर नेता के जरिए इस सीट पर अपनी हार का क्रम तोड़ने की उम्मीद कर रही है।
दूसरी ओर शिवपुरी सीट से विधायक यशोधरा राजे सिंधिया पहले ही चुनाव नहीं लड़ने का एलान कर चुकीं हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि भाजपा यहां से केंद्रीय मंत्री और यशोधरा के भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया को टिकट दे सकती है। सिंधिया और केपी सिंह की तकरार और दोस्ती दोनों इस क्षेत्र में चर्चा में रही है। सिंधिया के अलावा इस सीट से भाजपा की ओर से देवेंद्र जैन, धैर्यवर्धन शर्मा, रामजी व्यास, राजू बाथम जैसे नाम भी चर्चा में रहे हैं। ऐसे में इस सीट पर भाजपा किसे उम्मीदवार बनाएगी यह देखना भी दिलचस्प होगा।
शिवपुरी जिले का सियासी समीकरण क्या है?
शिवपुरी जिले की बात करें तो जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें करैरा, पोहरी, शिवपुरी, पिछोर और कोलारस हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में इनमें से करैरा, पोहरी और पिछोर सीट पर कांग्रेस को जीत मिली थी। वहीं, शिवपुरी और कोलारस से भाजपा के उम्मीदवार जीते थे। 2013 में भी जिले में नतीजा कांग्रेस के पक्ष में तीन-दो रहा था। तब कांग्रेस ने करैरा, पिछोर और कोलारस सीट पर जीत दर्ज की थी। वहीं, पोहरी और शिवपुरी सीट भाजपा के खाते में गईं थीं। वहीं, 2008 के विधानसभा चुनाव में पिछोर सीट को छोड़कर बाकी चार सीटें भाजपा के खाते में गईं थीं। पिछोर सीट पर कांग्रेस के केपी सिंह जीतने में सफल रहे थे। जिन्हें इस बार पार्टी ने शिवपुरी भेजा है।
शिवपुरी जिले की बात करें तो जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें करैरा, पोहरी, शिवपुरी, पिछोर और कोलारस हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में इनमें से करैरा, पोहरी और पिछोर सीट पर कांग्रेस को जीत मिली थी। वहीं, शिवपुरी और कोलारस से भाजपा के उम्मीदवार जीते थे। 2013 में भी जिले में नतीजा कांग्रेस के पक्ष में तीन-दो रहा था। तब कांग्रेस ने करैरा, पिछोर और कोलारस सीट पर जीत दर्ज की थी। वहीं, पोहरी और शिवपुरी सीट भाजपा के खाते में गईं थीं। वहीं, 2008 के विधानसभा चुनाव में पिछोर सीट को छोड़कर बाकी चार सीटें भाजपा के खाते में गईं थीं। पिछोर सीट पर कांग्रेस के केपी सिंह जीतने में सफल रहे थे। जिन्हें इस बार पार्टी ने शिवपुरी भेजा है।
शिवपुरी सीट का चुनावी इतिहास क्या है?
मध्य प्रदेश राज्य का गठन होने के बाद में 1957 में यहां पहले चुनाव हुए। तब से अब तक इस सीट पर कुल 14 चुनाव हुए हैं। 1957 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित थी। इसके बाद से यह सामान्य सीट हो गई। 1957 और 1962 में यहां से कांग्रेस को जीत मिली। 1967 और 1972 में इस सीट से भारतीय जनसंघ जीतने में सफल रहा। 1977 की जनता लहर में यहां से जनता पार्टी को जीत मिली।
1980 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर इस सीट पर कांग्रेस का उम्मीदवार जीतने में सफल रहा। 1985 में भी यहां कांग्रेस के गणेश राम गौतम लगातार दूसरी बार जीते। 1990 में शिवपुरी सीट से निर्दलीय सुशील बहादुर अस्थाना को जीत मिली। अस्थाना पहले यहां से भारतीय जनसंघ के टिकट पर जीत दर्ज कर चुके थे।
1993 में भाजपा ने यहां से देवेंद्र कुमार जैन को टिकट दिया। उन्होंने भाजपा को पहली बार इस सीट पर जीत दिलाई। अगले चुनाव में इस सीट से यशोधरा राजे सिंधिया को भाजपा ने मैदान में उतारा। सिंधिया तब से यह सीट यशोधरा का गढ़ रही है। यशोधरा यहां से 1998, 2003, 2013 और 2018 में चुनाव जीतने में सफल रहीं हैं। 2008 में भी यहां से भाजपा के माखन लाल राठौड़ जीते थे।
2004 के लोकसभा चुनाव में शिवपुरी विधायक यशोधरा को भाजपा ने ग्वालियर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बना दिया। यशोधरा चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गईं। इसके बाद हुए शिवपुरी विधानसभा सीट पर उप-चुनाव हुए। इस उपचुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। यानी, 2006 के उप-चुनाव को छोड़कर इस सीट पर पिछले 30 साल से भाजपा का कब्जा है।
मध्य प्रदेश राज्य का गठन होने के बाद में 1957 में यहां पहले चुनाव हुए। तब से अब तक इस सीट पर कुल 14 चुनाव हुए हैं। 1957 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित थी। इसके बाद से यह सामान्य सीट हो गई। 1957 और 1962 में यहां से कांग्रेस को जीत मिली। 1967 और 1972 में इस सीट से भारतीय जनसंघ जीतने में सफल रहा। 1977 की जनता लहर में यहां से जनता पार्टी को जीत मिली।
1980 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर इस सीट पर कांग्रेस का उम्मीदवार जीतने में सफल रहा। 1985 में भी यहां कांग्रेस के गणेश राम गौतम लगातार दूसरी बार जीते। 1990 में शिवपुरी सीट से निर्दलीय सुशील बहादुर अस्थाना को जीत मिली। अस्थाना पहले यहां से भारतीय जनसंघ के टिकट पर जीत दर्ज कर चुके थे।
1993 में भाजपा ने यहां से देवेंद्र कुमार जैन को टिकट दिया। उन्होंने भाजपा को पहली बार इस सीट पर जीत दिलाई। अगले चुनाव में इस सीट से यशोधरा राजे सिंधिया को भाजपा ने मैदान में उतारा। सिंधिया तब से यह सीट यशोधरा का गढ़ रही है। यशोधरा यहां से 1998, 2003, 2013 और 2018 में चुनाव जीतने में सफल रहीं हैं। 2008 में भी यहां से भाजपा के माखन लाल राठौड़ जीते थे।
2004 के लोकसभा चुनाव में शिवपुरी विधायक यशोधरा को भाजपा ने ग्वालियर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बना दिया। यशोधरा चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गईं। इसके बाद हुए शिवपुरी विधानसभा सीट पर उप-चुनाव हुए। इस उपचुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। यानी, 2006 के उप-चुनाव को छोड़कर इस सीट पर पिछले 30 साल से भाजपा का कब्जा है।