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तीन बच्चों वाले बयान के मायने: मोहन भागवत प्रजनन दर को लेकर क्यों चिंतित, टीएफआर घटने का देश पर क्या होगा असर?
Mon, 02 Dec 2024 04:45 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Mon, 02 Dec 2024 04:45 PM IST
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सार
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1990-92 से 2019-21 तक महिलाओं की कुल प्रजनन दर
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
देश में जनसंख्या को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। बहस के केंद्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान है जिसमें उन्होंने प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट या टीएफआर) में गिरावट को लेकर चिंता जताई है। संघ प्रमुख ने आधुनिक जनसंख्या विज्ञान का हवाला देते हुए बताया कि जब किसी समाज की प्रजनन दर 2.1 से नीचे चली जाती है तो वह समाज धीरे-धीरे पृथ्वी से लुप्त होने की कगार पर होता है। भागवत ने आगे कहा कि दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने की आवश्यकता है।आरएसएस प्रमुख के इस बयान पर सियासत भी शुरू हो गई है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने कहा कि भागवत का बयान दिखाता है कि आरएसएस दिग्भ्रमित हो गया है। भागवत के बयान पर कटाक्ष करते हुए एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि आरएसएस प्रमुख अधिक बच्चे पैदा करने वालों को क्या देंगे।
आइये जानते हैं कि आखिर मोहन भागवत ने प्रजनन दर को लेकर क्या बयान दिया है? देश में प्रजनन दर के आंकड़े क्या कहते हैं? प्रजनन दर में कैसे बदलाव हुआ है? टीएफआर घटने का असर क्या हो सकता है?
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत (फाइल)
- फोटो :
सोशल मीडिया
मोहन भागवत ने जनसंख्या को लेकर क्या बयान दिया है?
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि भारत की घटती जनसंख्या एक चिंताजनक मुद्दा है। नागपुर में 'कठाले कुल' सम्मेलन को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आधुनिक जनसंख्या विज्ञान के अनुसार, जब किसी समाज की प्रजनन दर (टीएफआर) 2.1 से कम हो जाती है तो वह खत्म होने की कगार पर होता है।
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि समाज के अस्तित्व में बने रहने के लिए प्रजनन दर तीन या चार से अधिक होनी चाहिए। भागवत ने कहा कि जनसंख्या में गिरावट चिंता का विषय है। आधुनिक जनसंख्या विज्ञान कहता है कि जब किसी समाज की प्रजनन दर 2.1 से नीचे चली जाती है, तो वह समाज पृथ्वी से लुप्त हो जाता है। बिना किसी संकट के भी समाज नष्ट हो जाता है। इस तरह, कई भाषाएं और समाज लुप्त हो गए हैं। हमारे देश की जनसंख्या नीति 1998 या 2002 में तय की गई थी और इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि किसी समाज की प्रजनन दर 2.1 से कम नहीं होनी चाहिए। हमें दो या तीन से अधिक बच्चों की आवश्यकता है; यही जनसंख्या विज्ञान कहता है। समाज के अस्तित्व के लिए यह संख्या महत्वपूर्ण है।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि भारत की घटती जनसंख्या एक चिंताजनक मुद्दा है। नागपुर में 'कठाले कुल' सम्मेलन को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आधुनिक जनसंख्या विज्ञान के अनुसार, जब किसी समाज की प्रजनन दर (टीएफआर) 2.1 से कम हो जाती है तो वह खत्म होने की कगार पर होता है।
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि समाज के अस्तित्व में बने रहने के लिए प्रजनन दर तीन या चार से अधिक होनी चाहिए। भागवत ने कहा कि जनसंख्या में गिरावट चिंता का विषय है। आधुनिक जनसंख्या विज्ञान कहता है कि जब किसी समाज की प्रजनन दर 2.1 से नीचे चली जाती है, तो वह समाज पृथ्वी से लुप्त हो जाता है। बिना किसी संकट के भी समाज नष्ट हो जाता है। इस तरह, कई भाषाएं और समाज लुप्त हो गए हैं। हमारे देश की जनसंख्या नीति 1998 या 2002 में तय की गई थी और इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि किसी समाज की प्रजनन दर 2.1 से कम नहीं होनी चाहिए। हमें दो या तीन से अधिक बच्चों की आवश्यकता है; यही जनसंख्या विज्ञान कहता है। समाज के अस्तित्व के लिए यह संख्या महत्वपूर्ण है।
असदुद्दीन ओवैसी, एआईएमआईएम प्रमुख
- फोटो :
ANI
मोहन भागवत के बयान पर सियासत क्या हो रही?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। भागवत के बयान पर तंज कसते हुए एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाया कि क्या आरएसएस प्रमुख अधिक बच्चे पैदा करने वालों को 1,500 रुपये देंगे। ओवैसी ने कहा, 'मैं मोहन भागवत से पूछना चाहता हूं कि वे अधिक बच्चे पैदा करने वालों को क्या देंगे? क्या वे अधिक बच्चे पैदा करने वालों के बैंक खातों में 1,500 रुपये देंगे? क्या वे इसके लिए कोई योजना लाएंगे?...जब मोहन भागवत अपने किसी करीबी को सीएम बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें इसके लिए कोई योजना लानी चाहिए।'
वहीं कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने आरएसएस प्रमुख के बयान पर तीखा हमला करते हुए कहा कि संघ परिवार भ्रमित लग रहा है। उन्होंने कहा, 'संघ परिवार भ्रमित लग रहा है। एक तरफ, भाजपा नेता आरोप लगाते हैं कि मुसलमान अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं, उनकी जनसंख्या बढ़ रही है और इसे दो बच्चों की सीमा के साथ रोका जाना चाहिए। दूसरी तरफ मोहन भागवत कह रहे हैं कि जनसंख्या कम नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह हमारी सभ्यता और विरासत के लिए हानिकारक है।'
भागवत के बयान पर विपक्ष नेताओं की आलोचनाओं के बीच भाजपा ने उनका बचाव किया है। पार्टी के सांसद दिनेश शर्मा ने कहा कि संघ प्रमुख ने यह बात भारत के विकास के सिलसिले में कही है। भारत को बुजुर्गों वाला देश नहीं बनना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। भागवत के बयान पर तंज कसते हुए एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाया कि क्या आरएसएस प्रमुख अधिक बच्चे पैदा करने वालों को 1,500 रुपये देंगे। ओवैसी ने कहा, 'मैं मोहन भागवत से पूछना चाहता हूं कि वे अधिक बच्चे पैदा करने वालों को क्या देंगे? क्या वे अधिक बच्चे पैदा करने वालों के बैंक खातों में 1,500 रुपये देंगे? क्या वे इसके लिए कोई योजना लाएंगे?...जब मोहन भागवत अपने किसी करीबी को सीएम बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें इसके लिए कोई योजना लानी चाहिए।'
वहीं कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने आरएसएस प्रमुख के बयान पर तीखा हमला करते हुए कहा कि संघ परिवार भ्रमित लग रहा है। उन्होंने कहा, 'संघ परिवार भ्रमित लग रहा है। एक तरफ, भाजपा नेता आरोप लगाते हैं कि मुसलमान अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं, उनकी जनसंख्या बढ़ रही है और इसे दो बच्चों की सीमा के साथ रोका जाना चाहिए। दूसरी तरफ मोहन भागवत कह रहे हैं कि जनसंख्या कम नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह हमारी सभ्यता और विरासत के लिए हानिकारक है।'
भागवत के बयान पर विपक्ष नेताओं की आलोचनाओं के बीच भाजपा ने उनका बचाव किया है। पार्टी के सांसद दिनेश शर्मा ने कहा कि संघ प्रमुख ने यह बात भारत के विकास के सिलसिले में कही है। भारत को बुजुर्गों वाला देश नहीं बनना चाहिए।
प्रजनन दर के साल-दर-साल के आंकड़े क्या कहते हैं?
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग हर तीन साल में एक व्यापक राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे या एनएफएचएस) आयोजित करता है। एनएफएचएस अब तक पांच बार आयोजित किया जा चुका है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2019-21 के दौरान 5वां एनएफएचएस आयोजित किया था। साल 2019-21 के दौरान आयोजित एनएफएचएस-5 के अनुसार, देश में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में कमी आई है। 2015-16 में आयोजित एनएफएचएस-4 के निष्कर्षों के अनुसार, देश में कुल प्रजनन दर या टीएफआर प्रति महिला 2.2 बच्चे थी। 5वें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार यह दर घटकर 2.0 बच्चों पर आ गई है।
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग हर तीन साल में एक व्यापक राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे या एनएफएचएस) आयोजित करता है। एनएफएचएस अब तक पांच बार आयोजित किया जा चुका है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2019-21 के दौरान 5वां एनएफएचएस आयोजित किया था। साल 2019-21 के दौरान आयोजित एनएफएचएस-5 के अनुसार, देश में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में कमी आई है। 2015-16 में आयोजित एनएफएचएस-4 के निष्कर्षों के अनुसार, देश में कुल प्रजनन दर या टीएफआर प्रति महिला 2.2 बच्चे थी। 5वें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार यह दर घटकर 2.0 बच्चों पर आ गई है।
राज्यों में टीएफआर का क्या हाल है?
साल 2021 में सरकार की ओर से हुए पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे या NFHS-5) में जनसंख्या की स्थिति सामने आई थी। इसके मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार समेत केवल पांच राज्य ऐसे हैं जहां कुल प्रजनन दर 2.1 से ज्यादा है। बिहार में प्रजनन दर सबसे ज्यादा 2.98 है, दूसरे नंबर पर मेघालय में 2.91 का टीएफआर है। तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है जहां TFR 2.35 है। झारखंड में 2.26 तो मणिपुर में 2.17 का टीएफआर है। देश में कुल प्रजनन दर (यानी टीएफआर) 2 हो गई है। किसी देश की मौजूदा आबादी को बनाए रखने के लिए प्रतिस्थापन की दर 2.1 होनी चाहिए। यानी, आबादी बढ़ने की रफ्तार उसके प्रतिस्थापन स्तर से भी कम हो गई है।
साल 2021 में सरकार की ओर से हुए पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे या NFHS-5) में जनसंख्या की स्थिति सामने आई थी। इसके मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार समेत केवल पांच राज्य ऐसे हैं जहां कुल प्रजनन दर 2.1 से ज्यादा है। बिहार में प्रजनन दर सबसे ज्यादा 2.98 है, दूसरे नंबर पर मेघालय में 2.91 का टीएफआर है। तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है जहां TFR 2.35 है। झारखंड में 2.26 तो मणिपुर में 2.17 का टीएफआर है। देश में कुल प्रजनन दर (यानी टीएफआर) 2 हो गई है। किसी देश की मौजूदा आबादी को बनाए रखने के लिए प्रतिस्थापन की दर 2.1 होनी चाहिए। यानी, आबादी बढ़ने की रफ्तार उसके प्रतिस्थापन स्तर से भी कम हो गई है।
| राज्य/यूटी | 1992-93 | 1998-99 | 2005-06 | 2015-16 | 2019-21 |
| आंध्र प्रदेश | 2.6 | 2.3 | 1.8 | 1.8 | 1.7 |
| अरुणाचल प्रदेश | 4.3 | 2.5 | 3 | 2.1 | 1.8 |
| असम | 3.5 | 2.3 | 2.4 | 2.2 | 1.9 |
| बिहार | 4 | 3.5 | 4 | 3.4 | 3 |
| दिल्ली | 3 | 2.4 | 2.1 | 1.8 | 1.6 |
| गोवा | 1.9 | 1.8 | 1.8 | 1.7 | 1.3 |
| गुजरात | 3 | 2.7 | 2.4 | 2 | 1.9 |
| हरियाणा | 4 | 2.9 | 2.7 | 2.1 | 1.9 |
| हिमाचल प्रदेश | 3 | 2.1 | 1.9 | 1.9 | 1.7 |
| जम्मू-कश्मीर | 3.1 | 2.7 | 2.4 | 2 | 1.4 |
| कर्नाटक | 2.9 | 2.1 | 2.1 | 1.8 | 1.7 |
| केरल | 2 | 2 | 1.9 | 1.6 | 1.8 |
| मध्य प्रदेश | 3.9 | 3.3 | 3.1 | 2.3 | 2 |
| महाराष्ट्र | 2.9 | 2.5 | 2.1 | 1.9 | 1.7 |
| मणिपुर | 2.8 | 3 | 2.8 | 2.6 | 2.2 |
| मेघालय | 3.7 | 4.6 | 3.8 | 3 | 2.9 |
| मिजोरम | 2.3 | 2.9 | 2.9 | 2.3 | 1.9 |
| नगालैंड | 3.3 | 3.8 | 3.7 | 2.7 | 1.7 |
| ओडिशा | 2.9 | 2.5 | 2.4 | 2.1 | 1.8 |
| पंजाब | 2.9 | 2.2 | 2 | 1.6 | 1.6 |
| राजस्थान | 3.6 | 3.8 | 3.2 | 2.4 | 2 |
| सिक्किम | 2.8 | 2 | - | 1.2 | 1.1 |
| तमिलनाडु | 2.5 | 2.2 | 1.8 | 1.7 | 1.8 |
| त्रिपुरा | 2.7 | 2.2 | - | 1.7 | 1.7 |
| उत्तर प्रदेश | 4.8 | 4 | 3.8 | 2.7 | 2.4 |
| पश्चिम बंगाल | 2.9 | 2.3 | 2.3 | 1.8 | 1.6 |
| छत्तीसगढ़ | - | - | 2.6 | 2.2 | 1.8 |
| झारखंड | - | - | 3.3 | 2.6 | 2.3 |
| उत्तराखंड | - | - | - | 2.1 | 1.9 |
| तेलंगाना | - | - | - | 1.8 | 1.8 |
| अंडमान निकोबार (यूटी) | - | - | - | 1.4 | 1.3 |
| चंडीगढ़ (यूटी) | - | - | - | 1.6 | 1.4 |
| दादरा नगर हवेली और दमन दीव | - | - | - | 2.1 | 1.8 |
| लक्षद्वीप (यूटी) | - | - | - | 1.8 | 1.4 |
| पुडुचेरी (यूटी) | - | - | - | 1.7 | 1.5 |
| लद्दाख (यूटी) | - | - | - | - | 1.3 |
| कुल | 3.4 | 2.9 | 2.7 | 2.2 | 2 |
तो क्या आने वाले समय में देश की आबादी कम होने वाली है?
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर रहे एआर नंदा कहते हैं कि सभी राज्यों में प्रजनन दर घट रही है। लेकिन, हमारी जनसंख्या का आकार काफी बड़ा है। जैसे चलती गाड़ी पर ब्रेक लगाने से वो तुरंत नहीं रुकती, उसे रुकने में थोड़ा वक्त लगता है। वैसे ही जनसंख्या का मोमेंटम तुरंत नहीं रुकेगा। आने वाले 20-30 साल तक हमारी आबादी बढ़ेगी। अभी ये करीब 140 करोड़ है। अगले 20-30 साल में जब ये 160 या 170 करोड़ हो जाएगी। उस वक्त हमारा ग्रोथ रेट शून्य हो जाएगा। उसके बाद ये माइनस में आएगा। यानी उसकी बाद जनसंख्या में कमी आनी शुरू होगी।
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर रहे एआर नंदा कहते हैं कि सभी राज्यों में प्रजनन दर घट रही है। लेकिन, हमारी जनसंख्या का आकार काफी बड़ा है। जैसे चलती गाड़ी पर ब्रेक लगाने से वो तुरंत नहीं रुकती, उसे रुकने में थोड़ा वक्त लगता है। वैसे ही जनसंख्या का मोमेंटम तुरंत नहीं रुकेगा। आने वाले 20-30 साल तक हमारी आबादी बढ़ेगी। अभी ये करीब 140 करोड़ है। अगले 20-30 साल में जब ये 160 या 170 करोड़ हो जाएगी। उस वक्त हमारा ग्रोथ रेट शून्य हो जाएगा। उसके बाद ये माइनस में आएगा। यानी उसकी बाद जनसंख्या में कमी आनी शुरू होगी।
मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ने की बात की जाती है उसका क्या?
बीते तीन दशक में NFHS के पांच सर्वे आए हैं। 1992-93 में आए पहले सर्वे से अब आए पांचवें सर्वे के दौरान मुस्लिमों में प्रजनन दर में सबसे ज्यादा कमी आई है। 1992-93 में मुस्लिम महिलाओं में TFR 4.41 था। जो नए सर्वे में घटकर 2.36 रह गया है। हालांकि, अभी ये ये सभी धर्मों में सबसे ज्यादा है। वहीं, हिन्दू महिलाओं में इसी दौरान TFR 3.30 से घटकर 1.94 हो चुका है।
पिछली बार के मुकाबले सिख और जैन समुदाय की प्रजनन दर में इजाफा हुआ है। 2015-16 में सिख समुदाय में प्रजनन दर 1.58 थी जो अब बढ़कर 1.60 हो गई है। वहीं, जैन समुदाय में प्रजजन दर 1.20 से बढ़कर 1.60 हो गई है।
ए आर नंदा कहते हैं मेरा हमेशा से मानना है कि जनसंख्या धर्म के आधार पर नहीं बढ़ती घटती है। ज्यादातर प्रजनन दर कम पढ़ी-लिखी और अनपढ़ आबादी में होती है। गरीब और अति गरीब हिन्दू आबादियों में प्रजजन दर और गरीब मुस्लिम आबादी में प्रजनन दर करीब-करीब एक ही रहती रही है। ऐसा हमेशा से दिखाई देता रहा हैमुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ने की बात की जाती है उसका क्या?
बीते तीन दशक में NFHS के पांच सर्वे आए हैं। 1992-93 में आए पहले सर्वे से अब आए पांचवें सर्वे के दौरान मुस्लिमों में प्रजनन दर में सबसे ज्यादा कमी आई है। 1992-93 में मुस्लिम महिलाओं में TFR 4.41 था। जो नए सर्वे में घटकर 2.36 रह गया है। हालांकि, अभी ये ये सभी धर्मों में सबसे ज्यादा है। वहीं, हिन्दू महिलाओं में इसी दौरान TFR 3.30 से घटकर 1.94 हो चुका है।
पिछली बार के मुकाबले सिख और जैन समुदाय की प्रजनन दर में इजाफा हुआ है। 2015-16 में सिख समुदाय में प्रजनन दर 1.58 थी जो अब बढ़कर 1.60 हो गई है। वहीं, जैन समुदाय में प्रजजन दर 1.20 से बढ़कर 1.60 हो गई है।
नंदा कहते हैं मेरा हमेशा से मानना है कि जनसंख्या धर्म के आधार पर नहीं बढ़ती घटती है। ज्यादातर प्रजनन दर कम पढ़ी-लिखी और अनपढ़ आबादी में होती है। गरीब और अति गरीब हिन्दू आबादियों में प्रजजन दर और गरीब मुस्लिम आबादी में प्रजनन दर करीब-करीब एक ही रहती रही है। ऐसा हमेशा से दिखाई देता रहा है।
बीते तीन दशक में NFHS के पांच सर्वे आए हैं। 1992-93 में आए पहले सर्वे से अब आए पांचवें सर्वे के दौरान मुस्लिमों में प्रजनन दर में सबसे ज्यादा कमी आई है। 1992-93 में मुस्लिम महिलाओं में TFR 4.41 था। जो नए सर्वे में घटकर 2.36 रह गया है। हालांकि, अभी ये ये सभी धर्मों में सबसे ज्यादा है। वहीं, हिन्दू महिलाओं में इसी दौरान TFR 3.30 से घटकर 1.94 हो चुका है।
पिछली बार के मुकाबले सिख और जैन समुदाय की प्रजनन दर में इजाफा हुआ है। 2015-16 में सिख समुदाय में प्रजनन दर 1.58 थी जो अब बढ़कर 1.60 हो गई है। वहीं, जैन समुदाय में प्रजजन दर 1.20 से बढ़कर 1.60 हो गई है।
ए आर नंदा कहते हैं मेरा हमेशा से मानना है कि जनसंख्या धर्म के आधार पर नहीं बढ़ती घटती है। ज्यादातर प्रजनन दर कम पढ़ी-लिखी और अनपढ़ आबादी में होती है। गरीब और अति गरीब हिन्दू आबादियों में प्रजजन दर और गरीब मुस्लिम आबादी में प्रजनन दर करीब-करीब एक ही रहती रही है। ऐसा हमेशा से दिखाई देता रहा हैमुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ने की बात की जाती है उसका क्या?
बीते तीन दशक में NFHS के पांच सर्वे आए हैं। 1992-93 में आए पहले सर्वे से अब आए पांचवें सर्वे के दौरान मुस्लिमों में प्रजनन दर में सबसे ज्यादा कमी आई है। 1992-93 में मुस्लिम महिलाओं में TFR 4.41 था। जो नए सर्वे में घटकर 2.36 रह गया है। हालांकि, अभी ये ये सभी धर्मों में सबसे ज्यादा है। वहीं, हिन्दू महिलाओं में इसी दौरान TFR 3.30 से घटकर 1.94 हो चुका है।
पिछली बार के मुकाबले सिख और जैन समुदाय की प्रजनन दर में इजाफा हुआ है। 2015-16 में सिख समुदाय में प्रजनन दर 1.58 थी जो अब बढ़कर 1.60 हो गई है। वहीं, जैन समुदाय में प्रजजन दर 1.20 से बढ़कर 1.60 हो गई है।
नंदा कहते हैं मेरा हमेशा से मानना है कि जनसंख्या धर्म के आधार पर नहीं बढ़ती घटती है। ज्यादातर प्रजनन दर कम पढ़ी-लिखी और अनपढ़ आबादी में होती है। गरीब और अति गरीब हिन्दू आबादियों में प्रजजन दर और गरीब मुस्लिम आबादी में प्रजनन दर करीब-करीब एक ही रहती रही है। ऐसा हमेशा से दिखाई देता रहा है।
टीएफआर घटने का असर क्या हो सकता है?
एआर नंदा ने अमर उजाला से कहा कि आजकल लोग ज्यादा बच्चे नहीं पैदा करना चाहते हैं और सबको अपना-अपना प्रजनन अधिकार है। अल्पसंख्यक वर्ग के लोग भी सावधान हो गए हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से मुश्किल होती है। इसलिए टीएफआर घट रही है। यह समस्या 20-30 साल में हमारे देश में भी होगी। कुछ राज्यों में पहले हो जाएगा जिनमें केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, हिमाचल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा शामिल हैं। बाकी जहां टीएफआर ज्यादा है वहां भी यह घट रहा है। इसलिए अच्छी पढ़ाई और कौशल विकास करके मानव संसाधन को बढ़ने देना चाहिए। सबको शिक्षा जरूरी करनी चाहिए और जल्दी शादी नहीं होने देना चाहिए। मानव संसाधन हमारी पूंजी है जिसे जनसांख्यकीय लाभांश भी बोलते हैं।
टीएफआर घटने के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू हैं। सकारात्मक यह है कि कम बच्चे अच्छे से पढ़ाई-लिखाई करेंगे। लेकिन टीएफआर ज्यादा घटने से बूढ़ी आबादी की समस्या होगी। चीन, जापान और पूर्वी यूरोप के देशों में बूढ़ी आबादी की समस्या जो हुई है वो 20-30 साल के बाद हमारे देश में भी हो सकती है। टीएफआर इस स्तर से घट जाएगा तो समस्या होगी। बुजुर्ग ज्यादा हो जाएंगे इनकी संख्या 20 फीसदी या 25 फीसदी तक हो सकती है। वहीं आर्थिक रूप से लाभकारी वर्ग कहे जाने वाला युवा वर्ग धीरे-धीरे कम हो जाएगा। बच्चे कम होंगे तो बाल लिंगानुपात भी कम होगा। कुछ देश अब ज्यादा बच्चे करने के लिए प्रोत्साहन दे रहे हैं लेकिन हमारे देश में यह स्थिति नहीं है। उधर दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर हम जो पाबंदियां लगाते हैं उसे हटाना चाहिए और बहुत जगह हट भी गया है।
एआर नंदा ने अमर उजाला से कहा कि आजकल लोग ज्यादा बच्चे नहीं पैदा करना चाहते हैं और सबको अपना-अपना प्रजनन अधिकार है। अल्पसंख्यक वर्ग के लोग भी सावधान हो गए हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से मुश्किल होती है। इसलिए टीएफआर घट रही है। यह समस्या 20-30 साल में हमारे देश में भी होगी। कुछ राज्यों में पहले हो जाएगा जिनमें केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, हिमाचल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा शामिल हैं। बाकी जहां टीएफआर ज्यादा है वहां भी यह घट रहा है। इसलिए अच्छी पढ़ाई और कौशल विकास करके मानव संसाधन को बढ़ने देना चाहिए। सबको शिक्षा जरूरी करनी चाहिए और जल्दी शादी नहीं होने देना चाहिए। मानव संसाधन हमारी पूंजी है जिसे जनसांख्यकीय लाभांश भी बोलते हैं।
टीएफआर घटने के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू हैं। सकारात्मक यह है कि कम बच्चे अच्छे से पढ़ाई-लिखाई करेंगे। लेकिन टीएफआर ज्यादा घटने से बूढ़ी आबादी की समस्या होगी। चीन, जापान और पूर्वी यूरोप के देशों में बूढ़ी आबादी की समस्या जो हुई है वो 20-30 साल के बाद हमारे देश में भी हो सकती है। टीएफआर इस स्तर से घट जाएगा तो समस्या होगी। बुजुर्ग ज्यादा हो जाएंगे इनकी संख्या 20 फीसदी या 25 फीसदी तक हो सकती है। वहीं आर्थिक रूप से लाभकारी वर्ग कहे जाने वाला युवा वर्ग धीरे-धीरे कम हो जाएगा। बच्चे कम होंगे तो बाल लिंगानुपात भी कम होगा। कुछ देश अब ज्यादा बच्चे करने के लिए प्रोत्साहन दे रहे हैं लेकिन हमारे देश में यह स्थिति नहीं है। उधर दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर हम जो पाबंदियां लगाते हैं उसे हटाना चाहिए और बहुत जगह हट भी गया है।