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मोदी के तीन साल: विदेश दौरे तो बहुत किए, पर मिला क्या?

Wed, 24 May 2017 04:29 PM IST
amarujala.com-Presented by- आनंद
amarujala.com-Presented by- आनंद Updated Wed, 24 May 2017 04:29 PM IST
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Modi's three years: did many foreign tours, but what got it?
विदेश नीति के मामले में पिछले तीन सालों में जो मोदी सरकार की सब से बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, वही सरकार की नाकामी की ओर भी इशारा करती है। चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते, विदेशी नीति के स्तर पर सफल रहे या विफल? ये एक अहम सवाल है। मई के महीने में इसका नजारा दो अलग-अलग मौकों पर देखने को मिला। एक ओर जहां हेग में भारत ने पाकिस्तान को "चारो खाने चित" कर दिया, दूसरा ओर बीजिंग में जहां चीन के नेतृत्व में "वन बेल्ट, वन रोड" विशाल प्रोजेक्ट पर हुई दो दिन की बैठक, जिसका भारत ने बहिष्कार किया।
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राजनयिक रहे राजीव डोगरा कहते हैं, "एक तो कुलभूषण जाधव के मामले में पाकिस्तान के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में जाना एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ और दूसरा चीन के नेतृत्व में हुई 'वन बेल्ट, वन रोड' कॉन्फ्रेंस का संप्रभुता के सवाल पर बहिष्कार करना।"
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डोगरा के अनुसार मोदी की नीति थोड़ी अलग है। मोदी ने भारत के हितों की सुरक्षा पर अधिक काम किया है। जेएनयू के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह भारत और चीन के रिश्तों पर गहरी नजर रखते हैं। उनके अनुसार चीन से रिश्ते बिगड़े हैं और इसे प्रधानमंत्री की उपलब्धियों की श्रेणी में रखना सही नहीं होगा।
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चीन और पाकिस्तान के साथ रोलर-कोस्टर राइड जैसे रिश्ते

Modi's three years: did many foreign tours, but what got it?
वे कहते हैं, "चीन और पाकिस्तान, दोनों के साथ आप देखें, तो हमारे रिश्ते पिछले कुछ दिनों से रोलर-कोस्टर राइड की तरह से चल रहे हैं। कभी तो एक दूसरे से गले मिलते हैं, तो कभी एक दूसरे से नाराज हो जाते हैं।" प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "पिछले डेढ़-दो साल से चीन से भी रिश्ते उलझे हुए हैं। उसमें भारत के लिए सब से बड़ा मुद्दा इसकी न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप की सदस्यता का है।

मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र के टेरर लिस्ट में लाने का है। 'चीन-पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर' के पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुजरने पर भारत का ऐतराज भी एक मुद्दा है, क्योंकि भारत उसे अपना एक अटूट हिस्सा मानता है" चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना बड़ी है। नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान समेत दर्जनों देशों ने बीजिंग की "वन बेल्ट वन रोड" सभा में शिरकत की।

कांग्रेस पार्टी के मणिशंकर अय्यर उन लोगों में से हैं, जो मोदी की पाकिस्तान और चीन की पॉलिसी को नाकाम समझते हैं। उनके अनुसार भारत अलग-थलग हो गया है। मणिशंकर अय्यर कहते हैं, "कांफ्रेंस में 68 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इतने सारे देश इसमें शामिल हुए। हम हो गए हैं अलग-थलग, क्योंकि चीन सारी दुनिया को समेट कर ले आया है। इसे सफल कैसे कह सकते हैं?"
 

उपलब्धियां

Modi's three years: did many foreign tours, but what got it?
राहुल मिश्रा भारत के विदेश मंत्रालय में एक सलाहकार हैं। उनके अनुसार मोदी की उपलब्धि अमरीका और जापान से दोस्ती में मजबूती आई है। राहुल कहते हैं, "मुझे लगता है कि अमरीका और जापान के साथ जो हमारे सम्बंध बेहतर हुए हैं और गुणात्मक सुधार आए हैं, वो मोदी सरकार की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।" विदेशी मामलों के जानकर अतुल भारद्वाज कहते हैं कि "स्पष्टता" मोदी सरकार की विदेश नीति की एक बड़ी उपलब्धि है, जिसके कारण अमरीका से रिश्ते पहले से काफी मजबूत हुए हैं।

राहुल कहते हैं, "इस सरकार की नीति में स्पष्टता है। मोदी सरकार गुट निरपेक्षता के चक्कर में नहीं पड़ी है।" भारत के सॉफ्टर पावर को मजबूत करने की दिशा में प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश में काफी काम किया है। संयुक्त राष्ट्र से 2015 में विश्व योग दिवस की घोषणा कराना मोदी सरकार की एक उपलब्धि के तौर पर देखा गया है। भारत की छवि बेहतर करने में प्रवासी भारतीयों की मदद लेना भी मोदी की रणनीति का हिस्सा रहा है। लेकिन कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर कहते हैं, "मोदी का नाम मिटटी में है चीन में।


आमिर खान का नाम शिखर तक पहुंच चुका है। उनकी फिल्म दंगल ने चीन को दिखाया है कि हिंदुस्तान कर क्या सकता है।" ये भी एक अजीब इत्तेफाक है कि मई के जिस हफ्ते में चीन अपनी राजधानी में कांफ्रेंस करके और दुनिया भर के नेताओं को इकठ्ठा करके अपनी आर्थिक, कूटनीतिक शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था, उसी समय बॉलीवुड हिट दंगल ने चीन के लोगों का दिल जीत लिया था। फिल्म की कामयाबी ये साबित कर चुकी है कि अगर चीन के पास आर्थिक पावर है, अमरीका के पास सैन्य शक्ति है, तो भारत के पास सॉफ्ट पावर है।

नाकामियां

Modi's three years: did many foreign tours, but what got it?
नरेंद्र मोदी के समर्थक और विरोधी सभी इस बात पर सहमत हैं कि उनकी विदेश नीति में सब से बड़ी नाकामी पाकिस्तान और चीन से रिश्ते में सुधार लाने में नाकामी है। आम चुनाव में भारी जीत के बाद शपथ ग्रहण समारोह में मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ समेत पड़ोसी देश के सभी नेताओं को बुलाकर एक नया जोश पैदा किया था। इसके बाद, एक-एक करके कई देशों का दौरा करके भारत के प्रोफाइल को विश्वभर में बेहतर करने की कोशिश की थी।

ऐसा लगने लगा था कि मोदी ने विदेश नीति में एक नई जान फूंक दी है। लेकिन इसका कोई हासिल हुआ? स्वर्ण सिंह कहते हैं कि मोदी के दौरों के कुछ फायदे नजर आने वाले हैं। कुछ नजर नहीं आने वाले हैं। स्वर्ण सिंह कहते हैं, "मुझे लगता है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हाइपर एक्शन आया है।

भारत की विजिबिलिटी बढ़ी है" लेकिन इस जोश और इस रफ्तार के बावजूद भारत अपने दो सब से अहम पड़ोसी चीन और पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने में नाकाम रहा है। मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि मोदी की विदेश नीति उस समय तक सफल नहीं कहलाएगी जब तक कि पाकिस्तान और चीन के साथ रिश्ते बेहतर न हों।
 
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