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श्रम मंत्रालय ने मौजूदा कानूनों को लेकर नहीं मानी संसदीय समिति की सलाह, राहुल गांधी ने भी किया था विरोध

Tue, 18 Aug 2020 08:08 AM IST
संजीव कुमार झा डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Tue, 18 Aug 2020 08:08 AM IST
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Ministry of Labour and Employment did not accept the advice of the Parliamentary Committee on the existing laws, Rahul Gandhi also opposed this bill
Labor Law - फोटो : social media

श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार अब जल्द ही अहम फैसला लेने जा रही है। मई में केंद्र सरकार ने राज्यों को यह अधिकार दे दिया था कि वे अपनी परिस्थितियों एवं संसाधनों के अनुसार श्रम कानूनों में बदलाव कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें किसी  संशोधन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

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श्रम मामलों के लिए बनी संसद की स्थाई समिति ने भी श्रम कानूनों में बदलावों को लेकर सुझाव दिया है। समिति के अनुसार इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड के मामले में केंद्र सरकार जल्दबाजी में कोई फैसला न ले। राज्यों को स्थायी तौर से ऐसा अधिकार न दिया जाए, जिससे वे मनमर्जीपूर्वक श्रम कानूनों में बदलाव कर सकें। समिति ने आगे कहा कि यह श्रमिकों के हित में नहीं है।राज्यों को इस तरह का अधिकार देना अनुचित है।
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कांग्रेस पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इस मामले में सरकार पर निशाना साधा था। सरकारी सूत्रों के अनुसार, श्रम मंत्रालय जल्द ही इस मामले में कैबिनेट नोट जारी कर सकता है और इसके जरिए जो मंजूरी ली जाएगी उसमें इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड भी शामिल है।
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बता दें कि मई के दौरान जब कोरोना के चलते देश में लॉकडाउन लगा था, तब केंद्र सरकार ने श्रम कानूनों में ढील दी थी।इसका फायदा उठाकर उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे कई राज्यों ने तेजी के साथ अपने श्रम कानूनों में भारी बदलाव कर दिए।

उत्तरप्रदेश में श्रम कानूनों के कई प्रावधानों को तीन साल के लिए खत्म कर दिया गया। संसदीय समिति की रिपोर्ट को न मानने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह बताया गया है कि भाजपा शासित प्रदेशों में से अधिकांश ने अपने मन मुताबिक इस श्रम कानूनों में बदलाव कर नई व्यवस्था लागू कर दी थी।

इन बदलाव का श्रमिक संगठनों और विपक्षी दलों ने यह कहते हुए विरोध किया था कि इससे श्रमिकों के हित प्रभावित होंगे। राहुल गांधी ने कहा था कि श्रम कानून में बदलाव श्रमिकों के शोषण और उनकी आवाज दबाने का बहाना नहीं हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि मूलभूत सिद्धांतों पर कोई समझौता नहीं हो सकता। श्रम कानूनों में बदलाव के बाद श्रमिकों को न्यूनतम वेतन मिलने का अधिकार खत्म हो जाता है। श्रमिकों को लेकर बुनियादी सुरक्षा तथा कल्याणकारी मानकों की अनुपस्थिति बनी रहती है और इससे इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट खत्म होता है।

श्रमिकों को अपनी मांगों के लिए यूनियन का गठन करने जैसे अधिकार भी नहीं मिलते। श्रम कानूनों में बदलाव के बाद कुछ राज्यों में मजदूरों के लिए रोजाना 12 घंटे का श्रम तय कर दिया गया। हालांकि बाद में अदालत के हस्तक्षेप से यह फैसला वापस हुआ। मध्यप्रदेश सरकार ने भी श्रम कानूनों में बदलाव कर दिया। एमपी ने 11 तरह के उद्योगों को मध्यप्रदेश इंडस्ट्रियल रिलेशंस एक्ट 1961 से छूट दे दी। इतना ही नहीं, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, 2000 के तहत इंडस्ट्री को कई प्रावधानों से अगले 1,000 दिनों के लिए छूट दे दी गई है। इनमें कई ऐसे प्रावधान भी थे, जो कामगार के पक्ष में नहीं थे।

किसी कर्मी को निलंबित करने के लिए सरकार की मंजूरी लेना अब जरूरत नहीं रह गया था। केंद्रीय श्रम मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, अब सरकार इस मामले में पीछे नहीं हटेगी। नए कानूनों को स्थायी रूप देने की सारी तैयारियां हो चुकी हैं।इस मामले में अब कैबिनेट नोट कभी भी जारी हो सकता है। इसमें जो लेबर कोड शामिल हैं, उनमें इंडस्ट्रियल रिलेशनशिप और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी शामिल है।


इन्हें लेकर श्रम मंत्रालय पहले ही कानून मंत्रालय को रिवाइज्ड ड्राफ्ट भेज चुका है।अभी सरकार कुछ नए बदलावों पर विचार कर रही है।इनमें स्थायी, अस्थाई, शॉर्ट टर्म व लॉंग टर्म रोजगार जैसी बातें शामिल हैं। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड के मामले में स्थाई समिति के जिस सुझाव को खारिज किया है, उसकी अध्यक्षता बीजेडी सांसद  भर्तृहरि महताब कर रहे हैं। उन्होंने नियम 280 के अंगर्गत द इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2019 पर अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को सौंपी थी।

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