बड़ी लापरवाही: 'बूढ़ी लाइनों' पर लोड बढ़ाकर होता है मरीजों की जान से खिलवाड़, इसलिए लगती है शार्ट सर्किट से आग
- अस्पतालों के पुराने जर्जर हो चुके भवनों में अभी भी पुराने बिजली के तारों पर चलती हैं व्यवस्थाएं
- केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कराई जांच तो हुआ खुलासा।
विस्तार
दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के आईसीयू में बुधवार को आग लगने से मरीजों की जान आफत में पड़ गई। इससे पहले कानपुर कार्डियोलॉजी हॉस्पिटल के आईसीयू में आग लगने से मरीजों की जान जोखिम में पड़ चुकी है। मुंबई के सनराइज हॉस्पिटल में भी आग लगने से छह मरीजों की जान चली गई थी। जबकि महाराष्ट्र के ही भंडारा जिले के सरकारी अस्पताल में आग लगी, तो 10 बच्चों की मौत हो गई।
दरअसल इन अस्पतालों में आग लगने की जो शुरुआती प्रमुख वजह सामने आई है, वह है शॉर्ट सर्किट। लेकिन शॉर्ट सर्किट क्यों होता है इसकी वजह जानने के लिए जब देश के चिकित्सा संस्थानों ने अपने स्तर पर बनाई कमेटी और फायर विभाग ने जांच की, तो पता चला कि अस्पताल की बिल्डिंग बहुत पुरानी है। बिजली का लोड और बिजली की वायरिंग भी उतनी ही पुरानी है। जबकि अत्याधुनिक सुविधाओं समेत एयर कंडीशनर और तमाम उपकरण उसी पुरानी लाइन पर जुड़ते चले गए और लोड बढ़ता गया। नतीजतन शॉर्ट सर्किट होता रहा और अस्पतालों में आग लगती रही। हालांकि कई अस्पतालों में आग लगने की वजह का वाजिब कारण भी नहीं पता चल सका।
चंडीगढ़ पीजीआई में अकसर आग लगने के मामले सामने आते रहे थे। यूपीए सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे गुलाम नबी आजाद की अध्यक्षता वाली गवर्निंग बॉडी ने जब लगातार आग लगने वाली घटनाओं की जांच कराई, तो पता चला कि न सिर्फ पीजीआई बल्कि एम्स समेत कई केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत आने वाले चिकित्सा संस्थानों में पुरानी बिजली की वायरिंग और कम लोड वाले फीडर पर ज्यादा लोड डाला जाता रहा और बिजली के शार्ट सर्किट होते रहे। नतीजतन मरीजों की जान आफत में पड़ती रही। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने तत्कालीन अस्पताल निदेशकों से व्यवस्थाएं दुरुस्त करने को कहा था, लेकिन अभी भी हालात नहीं सुधरे। यही वजह रही कि पुराने कारणों के चलते एम्स में लगातार आग लगने की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे बीते कुछ सालों में देश के ज्यादातर बड़े राज्यों के बड़े सरकारी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज समेत मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में खूब आग लगती रही है। इस दौरान न सिर्फ मरीजों की जान गई बल्कि अस्पतालों के दस्तावेजों समेत मरीजों की जांच से संबंधित बहुत से सैंपल तक नष्ट हो गए। बीते कुछ महीनों में कोलकाता के मेडिकल कॉलेज के अलावा यहां के एसएसकेएम अस्पताल में भी बड़ी आग लग चुकी है। झारखंड के रिम्स में भी बड़ी आग लग चुकी है, जबकि उड़ीसा के सरकारी मेडिकल कॉलेज में भी आग लग चुकी है।
महाराष्ट्र के सरकारी अस्पताल में आग लगने की बड़ी वारदातें हुईं। इन राज्यों में आग लगने के बाद प्रदेश के फायर विभाग और स्वास्थ्य विभाग ने अपने स्तर पर जांच कराई। शुरुआती दौर में शार्ट सर्किट की वजह से आग लगने की बात सामने आई लेकिन जब डिटेल में इस पूरे मामले में जांच की गई तो पता चला अस्पतालों की बिल्डिंग पुरानी है और यहां भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की कराई गई जांच के मुताबिक बात सामने आई कि पुरानी वायरिंग पर लोड ज्यादा बढ़ाया जाता रहा। नतीजतन शॉर्ट सर्किट होता रहा और आग लगती रही।
मॉल में कैसे खुल गया अस्पताल
महाराष्ट्र इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉ. आनंद भाऊराव देशमुख कहते हैं कि सरकार में बैठे लोगों की मिलीभगत से ही ऐसी घटनाएं ज्यादा होती हैं। उन्होंने मुंबई के सनराइज हॉस्पिटल में लगी आग का हवाला देते हुए कहा कि किसी मॉल में भी अस्पताल खोला जा सकता है क्या। लेकिन मुंबई में तो मॉल के भीतर अस्पताल चल रहा था। उन्होंने सीधे तौर पर जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित महकमे पर आरोप लगाते हुए कहा कि जब यह आंख बंद करके अस्पतालों को एनओसी देते रहेंगे तो ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।
डॉक्टर देशमुख का कहना है कि अस्पतालों में समय-समय पर बिजली के बढ़ते हुए लोड की जांच की जानी चाहिए। इसके अलावा अस्पतालों के भवन की भी जांच की जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश प्रोविंशियल मेडिकल सर्विसेज के डॉ अशोक यादव कहते हैं की स्वास्थ्य महकमे के नकारापन की वजह से ही मरीजों की जान आफत में पढ़ती है। उनका कहना है जब स्वास्थ्य विभाग बगैर मौके पर जाए अस्पतालों को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करता रहेगा तो ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।