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CAPF: केंद्रीय बलों में फौज वाले कानून लागू, अदालत ने माना सीएपीएफ 'संघ के सशस्त्र बल'; फिर भी पेंशन नहीं

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 17 May 2024 04:24 PM IST
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सार
केंद्र सरकार, कई मामलों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को सशस्त्र बल मानने को तैयार नहीं होती। सीएपीएफ में पुरानी पेंशन का मुद्दा भी इसी चक्कर में फंसा हुआ था। एक जनवरी 2004 के बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में भर्ती हुए सभी कर्मियों को पुरानी पेंशन के दायरे से बाहर कर  उन्हें 'एनपीएस' में शामिल कर दिया गया। इसी तर्ज पर सीएपीएफ जवानों को सिविल कर्मचारी मानकर उन्हें एनपीएस दे दिया। 
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Military laws apply to central forces court accepts CAPFs as armed forces of the Union still no pension
CAPF - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में भारतीय सेना के कानून लागू होते हैं, फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल है। इन बलों के लिए जो सर्विस रूल्स तैयार किए गए हैं, उनका आधार भी फौज है। इन सारी बातों के होते हुए भी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'पुरानी पेंशन' से वंचित किया गया है। खास बात तो ये है कि दिल्ली उच्च न्यायालय भी यह मान चुका है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीएपीएफ', 'भारत संघ के सशस्त्र बल' हैं। अदालत ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही। यानी सीएपीएफ, पुरानी पेंशन की हकदार है। 



एलाइंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन एवं पूर्व एडीजी एचआर सिंह कहते हैं, ये दुर्भाग्य है कि अदालत से जीती हुई लड़ाई को केंद्र सरकार, हार में बदलने की मंशा रखती है। सरकार से सुप्रीम कोर्ट में स्टे ले लिया। अभी ये मामला खत्म नहीं हुआ है। लोकसभा चुनाव के विभिन्न चरणों में ओपीएस का मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट में ढाई महीने बाद इस केस में जवाब फाइल होंगे। सीएपीएफ में पुरानी पेंशन बहाली की लड़ाई जारी रहेगी। लोकसभा चुनाव में चार जून के नतीजों के बाद ओपीएस का आंदोलन तेजी से आगे बढ़ेगा। ओपीएस के लिए संघर्ष कर रहे केंद्रीय कर्मचारी संगठनों ने भी 'सीएपीएफ' में पुरानी पेंशन बहाली को अपना समर्थन दिया है। 


'केंद्रीय बल', 'संघ के सशस्त्र बल' हैं ...  
बता दें कि केंद्र सरकार, कई मामलों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को सशस्त्र बल मानने को तैयार नहीं होती। सीएपीएफ में पुरानी पेंशन का मुद्दा भी इसी चक्कर में फंसा हुआ था। एक जनवरी 2004 के बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में भर्ती हुए सभी कर्मियों को पुरानी पेंशन के दायरे से बाहर कर  उन्हें 'एनपीएस' में शामिल कर दिया गया। इसी तर्ज पर सीएपीएफ जवानों को सिविल कर्मचारी मानकर उन्हें एनपीएस दे दिया। 

तब सरकार का मानना था कि देश में सेना, नेवी और वायु सेना ही 'सशस्त्र बल' हैं। बीएसएफ एक्ट 1968 में भी कहा गया है कि इस बल का गठन 'भारत संघ के सशस्त्र बल' के रूप में हुआ है। इसी तरह सीएपीएफ के बाकी बलों का गठन भी भारत संघ के सशस्त्र बलों के रूप में हुआ है। कोर्ट ने माना है कि 'सीएपीएफ' भी भारत के सशस्त्र बलों में शामिल हैं। इस लिहाज से उन पर 'एनपीएस' लागू नहीं होता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 6 अगस्त 2004 को जारी पत्र में घोषित किया गया है कि गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत केंद्रीय बल, 'संघ के सशस्त्र बल' हैं। 

बलों में कोर्ट मार्शल का भी प्रावधान ... 
सीएपीएफ के जवानों और अधिकारियों का कहना है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में फौजी महकमे वाले सभी कानून लागू होते हैं। सरकार खुद मान चुकी है कि ये बल तो भारत संघ के सशस्त्र बल हैं। इन्हें अलाउंस भी सशस्त्र बलों की तर्ज पर मिलते हैं। इन बलों में कोर्ट मार्शल का भी प्रावधान है। इस मामले में सरकार दोहरा मापदंड अपना रही है। अगर इन्हें सिविलियन मानते हैं तो आर्मी की तर्ज पर बाकी प्रावधान क्यों हैं। फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल है। जो सर्विस रूल्स हैं, वे भी सैन्य बलों की तर्ज पर बने हैं। अब इन्हें सिविलियन फोर्स मान रहे हैं तो ऐसे में ये बल अपनी सर्विस का निष्पादन कैसे करेंगे। इन बलों को शपथ दिलाई गई थी कि इन्हें जल, थल और वायु में जहां भी भेजा जाएगा, ये वहीं पर काम करेंगे। सिविल महकमे के कर्मी तो ऐसी शपथ नहीं लेते हैं। 

कोर्ट ने माना था 'भारत संघ के सशस्त्र बल' ... 
सीएपीएफ के 11 लाख जवानों/अफसरों ने गत वर्ष 'पुरानी पेंशन' बहाली के लिए दिल्ली हाईकोर्ट से अपने हक की लड़ाई जीती थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया। इस मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले लिया। जब केंद्र सरकार ने स्टे लिया, तभी यह बात साफ हो गई थी कि सरकार सीएपीएफ को पुरानी पेंशन के दायरे में नहीं लाना चाहती। हैरानी की बात तो ये है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले साल 11 जनवरी को दिए अपने एक अहम फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना था। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताती है। अदालत ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। अब इस मामले की सुनवाई अगस्त में होगी। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि पांच अगस्त से जो सप्ताह शुरु हो रहा है, उसमें केस को लिस्ट करें। याचिकाकर्ता 'विशेष अनुमति याचिका' (एसएलपी) में संशोधन भी कर सकते हैं। कोई नया दस्तावेज जोड़ सकते हैं। सर्वोच्च अदालत में याचिकाकर्ताओं की तरफ से जवाब फाइल किया जाएगा। 

दूसरे केंद्रीय संगठनों का मिला समर्थन ... 
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में ओपीएस लागू कराने के लिए अब दूसरे कर्मचारी संगठनों का समर्थन मिल रहा है। नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्शन (एनजेसीए) के पदाधिकारियों की बैठक में भी इस मुद्दे पर बात हुई है। गत वर्ष दिल्ली के रामलीला मैदान में केंद्र एवं राज्यों के सरकारी कर्मियों की एक विशाल रैली आयोजित करने वाले नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम (एनएमओपीएस) के अध्यक्ष विजय कुमार बंधु ने भी सीएपीएफ में ओपीएस लागू करने की मांग की है। वे लोकसभा चुनाव के दौरान भी इस मुद्दे को उठा रहे हैं। कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स ने भी सीएपीएफ सहित सभी केंद्रीय एवं राज्य सरकार के कर्मियों को ओपीएस के दायरे में लाने के लिए रैली आयोजित की थी। ऑल इंडिया एनपीएस इम्पलाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत पटेल ने भी सीएपीएफ के लिए ओपीएस की मांग का समर्थन किया है। एलाइंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन एवं पूर्व एडीजी एचआर सिंह और महासचिव रणबीर सिंह ने कहा, इस मामले में रणनीति बनाई जा रही है। आंदोलन को नए तरीके से धार दी जाएगी। ओपीएस बहाली, केंद्रीय बलों का हक है।

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