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MHA: RSS के कार्यक्रमों में जाने पर सरकारी कर्मियों पर रोक हटाने के मामले में आया अपडेट; आदेश वेबसाइट पर अपलोड
Wed, 31 Jul 2024 10:45 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: पवन पांडेय
Updated Wed, 31 Jul 2024 10:45 PM IST
सार
MHA: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) का आदेश पोस्ट किया है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी पर प्रतिबंध को हटा दिया गया है।
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गृह मंत्रालय
- फोटो : ANI
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विस्तार
केंद्रीय गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर पोस्ट किए गए डीओपीटी आदेश के अनुसार, 9 जुलाई के कार्यालय ज्ञापन का सार्वजनिक प्रदर्शन मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार हुआ है, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार के विभाग और गृह मंत्रालय को इसे अपनी आधिकारिक वेबसाइटों के होम पेज पर डालना चाहिए। बता दें कि डीओपीटी के आदेश में कहा गया है, कि 30 नवंबर 1966, 25 जुलाई 1970 और 28 अक्टूबर 1980 के विवादित ओएम (कार्यालय ज्ञापन) से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उल्लेख हटाने का निर्णय लिया गया है।
बैन पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी
वहीं अपनी टिप्पणी में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा था कि केंद्र को यह समझने में लगभग पांच दशक लग गए कि आरएसएस जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध संगठन को सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधित संगठनों की सूची में गलत तरीके से रखा गया था।
सेवानिवृत्त कर्मचारी ने दायर की थी रिट याचिका
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की यह टिप्पणी 25 जुलाई को सेवानिवृत्त केंद्रीय सरकारी कर्मचारी पुरुषोत्तम गुप्ता की रिट याचिका का निपटारा करते हुए आई थी। सरकारी कर्मचारी पुरुषोत्तम गुप्ता ने पिछले साल 19 सितंबर को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमों के साथ-साथ केंद्र के कार्यालय ज्ञापनों को चुनौती दी थी, जो सरकारी कर्मचारियों को आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने से रोक रहे थे।
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'केंद्र को अपनी गलती का एहसास होने में लगे पांच साल'
इस पर न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और गजेंद्र सिंह की पीठ ने कहा, अदालत इस बात पर अफसोस जताती है कि केंद्र सरकार को अपनी गलती का एहसास होने में लगभग पांच दशक लग गए; यह स्वीकार करने में कि आरएसएस जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध संगठन को देश के प्रतिबंधित संगठनों में गलत तरीके से रखा गया था और उसे वहां से हटाना जरूरी है।
'केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की आकांक्षाएं कम हो गईं'
हाईकोर्ट ने कहा, इसलिए, इस प्रतिबंध के कारण इन पांच दशकों में कई तरह से देश की सेवा करने की कई केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की आकांक्षाएं कम हो गईं, जो तब हटाई गईं जब इसे वर्तमान कार्यवाही के माध्यम से इस अदालत के संज्ञान में लाया गया। अदालत ने कहा कि वह यह मानने के लिए बाध्य है कि संभवतः प्रासंगिक समय पर कभी भी कोई ऐसी सामग्री, अध्ययन, सर्वेक्षण या रिपोर्ट नहीं थी, जिससे सत्तारूढ़ दल यह निष्कर्ष निकाले कि भारत के सांप्रदायिक ताने-बाने और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के लिए आरएसएस की अराजनीतिक/गैर-राजनीतिक गतिविधियों में भी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी और सहभागिता पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
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बैन पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी
वहीं अपनी टिप्पणी में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा था कि केंद्र को यह समझने में लगभग पांच दशक लग गए कि आरएसएस जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध संगठन को सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधित संगठनों की सूची में गलत तरीके से रखा गया था।
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सेवानिवृत्त कर्मचारी ने दायर की थी रिट याचिका
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की यह टिप्पणी 25 जुलाई को सेवानिवृत्त केंद्रीय सरकारी कर्मचारी पुरुषोत्तम गुप्ता की रिट याचिका का निपटारा करते हुए आई थी। सरकारी कर्मचारी पुरुषोत्तम गुप्ता ने पिछले साल 19 सितंबर को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमों के साथ-साथ केंद्र के कार्यालय ज्ञापनों को चुनौती दी थी, जो सरकारी कर्मचारियों को आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने से रोक रहे थे।
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'केंद्र को अपनी गलती का एहसास होने में लगे पांच साल'
इस पर न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और गजेंद्र सिंह की पीठ ने कहा, अदालत इस बात पर अफसोस जताती है कि केंद्र सरकार को अपनी गलती का एहसास होने में लगभग पांच दशक लग गए; यह स्वीकार करने में कि आरएसएस जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध संगठन को देश के प्रतिबंधित संगठनों में गलत तरीके से रखा गया था और उसे वहां से हटाना जरूरी है।
'केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की आकांक्षाएं कम हो गईं'
हाईकोर्ट ने कहा, इसलिए, इस प्रतिबंध के कारण इन पांच दशकों में कई तरह से देश की सेवा करने की कई केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की आकांक्षाएं कम हो गईं, जो तब हटाई गईं जब इसे वर्तमान कार्यवाही के माध्यम से इस अदालत के संज्ञान में लाया गया। अदालत ने कहा कि वह यह मानने के लिए बाध्य है कि संभवतः प्रासंगिक समय पर कभी भी कोई ऐसी सामग्री, अध्ययन, सर्वेक्षण या रिपोर्ट नहीं थी, जिससे सत्तारूढ़ दल यह निष्कर्ष निकाले कि भारत के सांप्रदायिक ताने-बाने और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के लिए आरएसएस की अराजनीतिक/गैर-राजनीतिक गतिविधियों में भी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी और सहभागिता पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।