कवि विष्णु खरे के निधन पर मंगलेश डबराल और गिरधर राठी के संस्मरण
हिंदी काव्य जगत के दैदीप्यमान सितारे हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे का निधन हिंदी जगत में उदासी का माहौल लेकर आया है। अपनी रचनात्मकता और अंदाज के लिए प्रसिद्ध विष्णु खरे का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि जो उनसे एक बार मिल लेता था वह उन्हें फिर कभी भूल नहीं पाता था। अमर उजाला डॉट कॉम आपके लिए लेकर आया है हिंदी कवि मंगलेश डबराल और कवि व अनुवादक गिरधर राठी की विष्णु खरे के साथ स्मृतियां...
वे हिंदी के आखिरी मूर्तिभंजक थे : मंगलेश डबराल
विष्णु खरे एक मूल्यवान कवि, चौकन्ने आलोचक,गंभीर विचारक और खुद के विचारों पर अडिग रहने वाले इंसान थे। उनका जाना एक बड़ी त्रासदी है। उन्होंने जितना काम किया, जितनी विधाओं में किया, उसे देखकर आप विस्मय में पड़ जा सकते हैं। एक जबरदस्त रचनात्मक ऊर्जा थी उनमें।
अपने विचारों पर वह इस तरह अडिग रहते थे कि उनकी छवि एक गुस्सैल आदमी की हो गई थी। इस वजह से कई लोगों की नाराजगी भी मोल ली उन्होंने। लेकिन वे ऐसे नहीं थे। जिन्होंने उन्हें करीब से देखा है, वे जानते हैं कि उनमें एक सहज हास्य बोध था। वे मिलनसार थे और लोगों की भावनाओं की कद्र भी करते थे।
यही वजह है कि जब वे अस्पताल में भर्ती हुए तो फेसबुक पर उनकी सलामती की दुआएं करने वालों की बाढ़ सी आ गई। मुझे याद है, बहुत पहले उनका काव्य संकलन आया था - ‘एक गैर रूमानी समय में’।
तब उनकी कविताओं ने हिंदी कविता जगत में सार्थक हस्तक्षेप किया था। बाद में तो उन्होंने हिंदी कविता का स्वभाव ही बदल दिया। मैं तो यही कहूंगा कि वे कबीर, निराला और मुक्तिबोध के बाद हिंदी के आखिरी मूर्तिभंजक थे, जो अपने शब्दों के साथ हमेशा हम लोगों के बीच रहेंगे।
अलग से कवि थे, अलग सी थी दुनिया : गिरधर राठी
एक पुराने, पारिवारिक मित्र के जाने पर जो खालीपन आता है, उसे भरना तो हमेशा मुश्किल होता है। विष्णु खरे जी से मेरा परिचय 1965 के आस-पास का है। उनकी एक कविता थी, 'खुद अपनी आंख से।' उसपर मैंने एक लंबी और गहरी आलोचना लिखी थी। जब वह छपी तो उन्होंने बुरा नहीं माना था।
मुस्कुरा कर कहा था कि 'चलो किसी ने तो मेरी रचनाधर्मिता को समझा।' बाद में मैं जब प्रतिपक्ष में आया तो वे उसमें लिखते रहे। दोस्ती तब की है। न जाने कितनी शामें, कितनी रातें हम लोगों ने साथ-साथ बिताई होंगी।
अनगिनत बैठकों में साथ-साथ हिस्सा लिया। साथ-साथ कविताएं पढ़ीं। एक बात यहां यह भी याद रखने की है कि वे हिंदी में शायद इकलौते आदमी थे जो इतनी भाषाएं जानते थे - चेक, जर्मन, अंग्रेजी, ऊर्दू, हिंदी, मराठी और शायद बांग्ला भी। संगीत में गहरी दिलचस्पी थी और बड़े जानकार भी थे ।
फिल्मों के बारे में भी उन्हें बहुत जानकारी थी। उनके अनुवाद को देखें, वह अलग किस्म का लगेगा आपको। उनकी कविताओं को देखें, वह भी अलग लगेगा। उनकी ऊर्जा कभी कम नहीं होती थी। हां, वह स्वभाव से ऐसे व्यक्ति नहीं थे, जो आसानी से हर किसी के साथ घुल-मिल जाएं।
उनकी टिप्पणियां सख्त होती थीं। लेकिन जहां तक उनकी रचनाधर्मिता की बात है, वे निरंतर काम करते रहे और कभी भी एक विधा में टिककर नहीं। वे एक किस्म की रचनात्मक दुनिया में अपना संसार बसाते थे और बाद में दूसरी ओर निकल जाते थे। आज बेशक वे नहीं रहे, लेकिन उनकी याद तो हमारे दिल में हमेशा बसी रहेगी।