फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   memoirs of Manglesh Dabral and Girdhar Rathi vith late Vishnu Khare

कवि विष्णु खरे के निधन पर मंगलेश डबराल और गिरधर राठी के संस्मरण

Wed, 19 Sep 2018 07:40 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 19 Sep 2018 07:40 PM IST
विज्ञापन
memoirs of Manglesh Dabral and Girdhar Rathi vith late Vishnu Khare

हिंदी काव्य जगत के दैदीप्यमान सितारे हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे का निधन हिंदी जगत में उदासी का माहौल लेकर आया है। अपनी रचनात्मकता और अंदाज के लिए प्रसिद्ध विष्णु खरे का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि जो उनसे एक बार मिल लेता था वह उन्हें फिर कभी भूल नहीं पाता था। अमर उजाला डॉट कॉम आपके लिए लेकर आया है हिंदी कवि मंगलेश डबराल और कवि व अनुवादक गिरधर राठी की विष्णु खरे के साथ स्मृतियां...

विज्ञापन

वे हिंदी के आखिरी मूर्तिभंजक थे : मंगलेश डबराल

memoirs of Manglesh Dabral and Girdhar Rathi vith late Vishnu Khare

विष्णु खरे एक मूल्यवान कवि, चौकन्ने आलोचक,गंभीर विचारक और खुद के विचारों पर अडिग रहने वाले इंसान थे। उनका जाना एक बड़ी त्रासदी है। उन्होंने जितना काम किया, जितनी विधाओं में किया, उसे देखकर आप विस्मय में पड़ जा सकते हैं। एक जबरदस्त रचनात्मक ऊर्जा थी उनमें।

अपने विचारों पर वह इस तरह अडिग रहते थे कि उनकी छवि एक गुस्सैल आदमी की हो गई थी। इस वजह से कई लोगों की नाराजगी भी मोल ली उन्होंने। लेकिन वे ऐसे नहीं थे। जिन्होंने उन्हें करीब से देखा है, वे जानते हैं कि उनमें एक सहज हास्य बोध था। वे मिलनसार थे और लोगों की भावनाओं की कद्र भी करते थे।

यही वजह है कि जब वे अस्पताल में भर्ती हुए तो फेसबुक पर उनकी सलामती की दुआएं करने वालों की बाढ़ सी आ गई। मुझे याद है, बहुत पहले उनका काव्य संकलन आया था - ‘एक गैर रूमानी समय में’।

तब उनकी कविताओं ने हिंदी कविता जगत में सार्थक हस्तक्षेप किया था। बाद में तो उन्होंने हिंदी कविता का स्वभाव ही बदल दिया। मैं तो यही कहूंगा कि वे कबीर, निराला और मुक्तिबोध के बाद हिंदी के आखिरी मूर्तिभंजक थे, जो अपने शब्दों के साथ हमेशा हम लोगों के बीच रहेंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन

अलग से कवि थे, अलग सी थी दुनिया : गिरधर राठी 

memoirs of Manglesh Dabral and Girdhar Rathi vith late Vishnu Khare

एक पुराने, पारिवारिक मित्र के जाने पर जो खालीपन आता है, उसे भरना तो हमेशा मुश्किल होता है। विष्णु खरे जी से मेरा परिचय 1965 के आस-पास का है। उनकी एक कविता थी, 'खुद अपनी आंख से।' उसपर मैंने एक लंबी और गहरी आलोचना लिखी थी। जब वह छपी तो उन्होंने बुरा नहीं माना था।

मुस्कुरा कर कहा था कि 'चलो किसी ने तो मेरी रचनाधर्मिता को समझा।' बाद में मैं जब प्रतिपक्ष में आया तो वे उसमें लिखते रहे। दोस्ती तब की है। न जाने कितनी शामें, कितनी रातें हम लोगों ने साथ-साथ बिताई होंगी।

अनगिनत बैठकों में साथ-साथ हिस्सा लिया। साथ-साथ कविताएं पढ़ीं। एक बात यहां यह भी याद रखने की है कि वे हिंदी में शायद इकलौते आदमी थे जो इतनी भाषाएं जानते थे - चेक, जर्मन, अंग्रेजी, ऊर्दू, हिंदी, मराठी और शायद बांग्ला भी। संगीत में गहरी दिलचस्पी थी और बड़े जानकार भी थे ।

फिल्मों के बारे में भी उन्हें बहुत जानकारी थी। उनके अनुवाद को देखें, वह अलग किस्म का लगेगा आपको। उनकी कविताओं को देखें, वह भी अलग लगेगा। उनकी ऊर्जा कभी कम नहीं होती थी। हां, वह स्वभाव से ऐसे व्यक्ति नहीं थे, जो आसानी से हर किसी के साथ घुल-मिल जाएं।

उनकी टिप्पणियां सख्त होती थीं। लेकिन जहां तक उनकी रचनाधर्मिता की बात है, वे निरंतर काम करते रहे और कभी भी एक विधा में टिककर नहीं। वे एक किस्म की रचनात्मक दुनिया में अपना संसार बसाते थे और बाद में दूसरी ओर निकल जाते थे। आज बेशक वे नहीं रहे, लेकिन उनकी याद तो हमारे दिल में हमेशा बसी रहेगी।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed