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सांसदों को भी रास नहीं आ रहा विधायिका में न्यायपालिका का हस्तक्षेप, चर्चा का सुझाव

Sat, 14 May 2016 08:38 AM IST
राघवेंद्र नारायण मिश्र/ अमर उजाला,नई दिल्ली
राघवेंद्र नारायण मिश्र/ अमर उजाला,नई दिल्ली Updated Sat, 14 May 2016 08:38 AM IST
सार

  • मानसून सत्र में समाधान खोजने का दिया सुझाव
  • संसद में विस्तार से चर्चा पर सांसदों का जोर

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member of parliament wants debate on intervention of the judiciary in the legislature
- फोटो : PTI

विस्तार

 विधायिका के कामकाज में न्यायपालिका के बढ़ते दखल पर सांसदों ने सवाल खड़े किए हैं। राज्यसभा में दलगत सीमाओं से इतर सांसदों ने इस स्थिति पर अपनी चिंताओं को साझा किया। ऊपरी सदन के 53 सदस्यों की विदाई के मौके पर भाषण के क्रम में सदस्यों ने न्यायपालिका के बढ़ रहे हस्तक्षेप का समाधान खोजने पर सहमति जताई। मानसून सत्र में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा का सुझाव भी सामने आया। सांसदों ने कहा कि न्यायपालिका और विधायिका के कार्यों के बीच संवैधानिक व्यवस्था के तहत स्पष्ट रेखा खींची हुई है। इसका अतिक्रमण लोकतंत्र के लिए उचित नहीं।

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सपा के रामगोपाल यादव ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताते हुए कहा न्यायपालिका का अतिक्रमण बढ़ रहा है और इस मुद्दे पर हमें सोचना पड़ेगा। संसद के पास कानून बनाने का काम है। संसद बजट बनाती है। अगर न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ता है तो इसका क्या औचित्य रह जाएगा। रामगोपाल ने कहा कि अगले मानसून सत्र में इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। संसद और विधायिका की अपनी गरिमा है। न्यायपालिका का कार्य क्षेत्र भी पारिभाषित है। दोनों अलग-अलग संवैधानिक शक्तियां हैं। एक शक्ति दूसरे की सीमा का अतिक्रमण नहीं करें इसलिए संविधान ने एक रेखा भी खींची है।
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बसपा की मायावती ने कहा कि हमें अपने गिरेबां में झांककर देखने की जरूरत है। आज सवाल खड़ा हुआ है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ रहा है। हमें सोचना होगा कि दूसरी शक्तियां क्यों फायदा उठा रही हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कुछ मुद्दों पर साथ चलना होगा। इस मुद्दे पर एकजुटता जरूरी है। जीएसटी बिल पारित होना चाहिए था। यह क्यों नहीं हो पाया। अर्थव्यवस्था के लिए जो जरूरी काम है उसे चर्चा के बाद पूरा किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार को आश्वस्त किया कि जब सरकार जीएसटी बिल लेकर आएगी तो उनकी पार्टी बिल का समर्थन करेगी।
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शिरोमणि अकाली दल के सुखदेव सिंह ढींढसा ने भी न्यायपालिका के बढ़ते हस्तक्षेप पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि सभी दलों को मिलकर न्यायपालिका में सुधार पर चर्चा करनी चाहिए। अगले सत्र में सिर्फ इस मुद्दे पर अलग से एक हफ्ते की विशेष चर्चा जरूरी है। इससे पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी न्यायपालिका द्वारा विधायिका के कामकाज में हस्तक्षेप पर गंभीर ऐतराज जताया। वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान जेटली ने कहा था कि राजनीतिक मामलों का निपटारा राजनेताओं द्वारा ही किया जाना चाहिए। हस्तक्षेप के बाद अब संसद के पास सिर्फ बजट बनाने और टैक्स लगाने का काम ही रह गया है। न्यायपालिका को यह काम भी अपने पास ले लेना चाहिए।

रो पड़ी कनकलता
सांसदों की विदाई मौके पर कई बार भावुक क्षण सामने आए। सपा की कनकलता सिंह इस क्रम में रो पड़ीं। उन्होंने अपने पिता पूर्व सांसद स्व. मोहन सिंह को याद किया तो उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने साथियों के परिवार का भी ध्यान रखते हैं। उन्होंने संसद में आने का मौका दिया। उन्होंने सहयोग के लिए सभी वरिष्ठों का आभार प्रकट किया।


शेरो-शायरी गूंजती रही
विदाई के क्रम में हुए भाषणों में शेरो-शायरी गूंजती रही। सभापति हामिद अंसारी ने कहा कि ‘चले जाओगे, आ गले से लगाएं।’ चंदन मित्रा ने फैज अहमद फैज की पंक्तियां सुनाईं कि ‘गरीबों की हिमायत सीखी’। फिर कहा, ‘हो रहा जुदा रास्ता मगर कभी अलविदा न कहना।’ तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर ने मुकेश का गीत दोहराया, ‘ओ जाने वालों हो सके तो लौटके आना।’ भाजपा के तरुण विजय ने कहा, ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे कि जब हम दोस्त बन जाएं को शर्मिंदा न हों।’  केसी त्यागी बोले कि ‘कुछ कार कम कर दिए गुजरे जिधर से हम।’

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