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Hindi News ›   India News ›   Meghalaya Election: Congress wins 21, NPP 19 and  BJP wins 2 seats in Meghalaya Assembly Elections

मेघालय में नहीं चला PM मोदी का जादू, कांग्रेस के वादों पर भी लोगों ने नहीं जताया भरोसा

Sat, 03 Mar 2018 08:55 PM IST
रीता तिवारी, अमर उजाला, शिलांग
रीता तिवारी, अमर उजाला, शिलांग Updated Sat, 03 Mar 2018 08:55 PM IST
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Meghalaya Election: Congress wins 21, NPP 19 and  BJP wins 2 seats in Meghalaya Assembly Elections
- फोटो : PTI

पूर्वोत्तर का स्कॉटलैंड कहे जाने वाले मेघालय में न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू चला और न ही दस साल से यहां राज कर रही कांग्रेस के वादों पर लोगों ने भरोसा जताया। यह सही है कि हर बार की तरह इस बार भी कांग्रेस यहां सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है। लेकिन गारो, खासी व जयंतिया पहाड़ियों में बंटे इस पर्वतीय राज्य के लोगों ने अबकी भी विधानसभा चुनावों में दशकों पुरानी एक पंरपरा को कायम रखा है। वह है कि किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं देना। 

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राज्य में त्रिशंकु विधानसभा का इतिहास लगभग इस राज्य के गठन जितना ही पुराना रहा है। यहां सरकारों के गठन में अक्सर जोड़-तोड़ और खरीद-फरोख्त की ही अहम भूमिका रही है। इसके साथ ही यहां सरकार के गठन में क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों की भूमिका भी निर्णायक रही है। इस बार के चुनावी नतीजे भी अपवाद नहीं हैं।
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राज्य के गठन के बाद वर्ष 1972 में हुए पहले विधानसभा चुनावों में यहां आल पार्टी हिल लीडर्स कांफ्रेंस को 32 सीटें मिली थीं। उन चुनावों में कांग्रेस को नौ सीटें मिली थीं। उसके बाद तो हर चुनाव में इतिहास खुद को दोहराता रहा है। यहां हर बार कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरती रही है। लेकिन उसे स्थानीय दलों या निर्दलीयों की सहायता से ही सरकार बनानी पड़ती है।
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 किसी अकेली पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की वजह से ही यह राज्य लंबे अरसे तक राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है। बीते दस साल से कांग्रेस की अगुवाई में सरकार चलने से यहां राजनीतिक स्थिरता का माहौल बना था। लेकिन चुनावी नतीजों ने एक बार फिर इस राज्य को अनिश्चितता की ओर धकेल दिया है।

ईसाई-बहुल राज्य में बीफ बैन की राजनीति भाजपा को पड़ी भारी

Meghalaya Election: Congress wins 21, NPP 19 and  BJP wins 2 seats in Meghalaya Assembly Elections
कांग्रेस
वर्ष 1978 के विधानसभा चुनावों में यहां कांग्रेस को 20 सीटें मिली थीं। 1983 में भी उसकी सीटें जस की तस रहीं। वर्ष 1988 के चुनावों में उसकी सीटों में तीन का इजाफा हुआ लेकिन पार्टी बहुमत के जादूई आंकड़े 31 से काफी दूर रही। 

इस पार्टी को वर्ष 1993 में 24 सीटें मिलीं और 1998 में 25 सीटें।  पांच साल बाद 2003 में कांग्रेस की सीटें घट कर 22 रह गईं। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को 25 सीटें मिलीं और 2013 में 29 सीटें। वर्ष 2013 में अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बावजूद पार्टी बहुमत से दो सीटें दूर रह गईं।

भाजपा ने अबकी यहां कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते दिसंबर में ही एक जनसभा के जरिए राज्य में भाजपा का चुनाव अभियान शुरू किया था। उसके बाद वे बीते महीने भी यहां दौरे पर आए और भाजपा के सत्ता में आने पर राज्य की तस्वीर बदलने के वादे किए। 

लेकिन पड़ोसी त्रिपुरा की तरह यहां वोटरों पर उनके वादों का कोई खास असर नहीं हुआ। उनके अलावा अमित शाह से लेकर अरुण जेटली तक दर्जनों नेताओं ने राज्य में चुनाव प्रचार किया। लेकिन इस ईसाई-बहुल राज्य में शायद बीफ बैन की राजनीति भाजपा के लिए भारी साबित हुई।
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