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मिलिए 5 राजनीतिक गुरुओं से जिनका नाम लेकर हो रही है भारत में राजनीति

Mon, 04 Sep 2017 06:48 PM IST
amarujala.com- Written by: पूजा मेहरोत्रा
amarujala.com- Written by: पूजा मेहरोत्रा Updated Mon, 04 Sep 2017 06:48 PM IST
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Meet 5 political gurus whose name is taking up in Indian politics
महात्मा गांधी

जब पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है, हम उन गुरुओं को याद कर रहे हैं जिन्होंने अनूठे विचारों से देश ही नहीं दुनिया की राजनीति को बदल कर रख दिया। ये वो गुरू हैं जिन्होंने सिर्फ राजनीति में ही नहीं आम लोगों में भी जीवन को भी नई दिशा दी है।

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जिन वर्गों ने कभी आंख ऊपर उठा कर देखने की नहीं सोची आज वे इन्हीं राजनीतिक गुरुओं के दिखाए रास्ते और नक्शे कदम पर चलते हुए, अपने अधिकारों को समझने लगे हैं।अब वे अपने हक और हकूक की बात करते हैं और अपनी बेहतरी के लिए हर मुमकिन कदम उटाने को तैयार रहते हैं...ये हैं वो पांच राजनीतिक चेहरे जिन्होंने देश- दुनिया की राजनीति को नया रंग दिया
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मोहनदास करमचंद गांधी

स्वतंत्रता आंदोलन के पहले सेनानियों में से एक गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक शिष्य मोहनदास करमचंद गांधी ने ना सिर्फ देश, बल्कि दुनिया की राजनीति को बदलकर रख दिया। उन्होंने सत्य और अहिंसा का ऐसा हथियार राजनीतिक को दिया, जिसकी मुरीद पूरी दुनिया बन गई।

गैरबराबरी, छुआछूत और अशिक्षा को समाज के लिए गांधी बेहद नुकसानदायक मानते थे। उनका मकसद समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित आम आदमी के आंसूं को पोंछना था, जिसे वे दरिद्र नारायण कहते थे।गांधी को आप राजनीति ही नहीं, समाजनीति, अर्थनीति और संस्कृति नीति के सबसे बड़े गुरु कह सकते हैं, जिनकी वजह से दुनिया के तमाम शांति प्रेमी, समानतावादी उनके शिष्य हैं।

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गांधी ने 1909 में हिंद स्वराज लिखकर देश के भावी शासन की रूपरेखा पेश की थी, जिसमें ऊंच-नीच और बड़े-छोटे का कोई भेदभाव नहीं था। स्वच्छता को वे आजादी से भी ज्यादा जरूरी मानते थे। गांधी ने संग्रह का भी विरोध किया। इसलिए आज दुनिया की पूरी राजनीति जब भी संकट में होती है, उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेती दिखती है।

भीमराव अंबेडकर

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B. R. Ambedkar

बचपन से ही छुआछूत और गैरबराबरी का दंश झेलते रहे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने दुनिया को समानता और कानून के शासन का पाठ दिया। महार जाति में पैदा अंबेडकर को हिंदू समाज में स्थित छुआछूत से इतनी घृणा हुई कि उन्होंने हिंदू समाज से अलग होने का फैसला तक कर लिया। अंबेडकर ने दलित जातियों में आत्मस्वाभिमान का भाव भरा। उनका कहना था कि जब तक दलित तो शिक्षा और स्वच्छता के हथियार से लैस नहीं होंगे,तब तक उनकी बात नहीं सुनी जाएगी।

कानून में डॉक्टरेट के डिग्रीधारी अंबेडकर ने अंग्रेजों द्वारा दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र के विचार को स्वीकार कर लिया। लेकिन गांधी जी अंग्रेजों की इस चाल को समझ गए। इसके बाद उन्होंने अंबेडकर को मनाया और हिंदू समाज से छुआछूत हटाने को लेकर अंबेडकर को भरोसा दिया। इसके बाद गांधी जी के साथ उनका 1934 का सुप्रसिद्ध पूना पैक्ट हुआ और अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग से वे पीछे हटे।

अंबेडकर की ही प्रेरणा थी कि गांधी जी ने अस्पृश्यता यानी छुआछूत के खिलाफ अभियान छेड़ा और आजादी के आंदोलन का हथियार बनाया। अंबेडकर के अनुयायियों की संख्या आज भी काफी है। अंबेडकर ने आजादी के बाद भारत को जो संविधान दिया, उसमें भी हर भारतीय नागरिक को बराबरी का दर्जा दिया गया है। रामविलास पासवान, रामदास अठावले और प्रकाश अंबेडकर जैसे राजनेता उन्हीं के सिद्धांतों पर आज भी राजनीति कर रहे हैं।

राममनोहर लोहिया

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Ram Manohar Lohia

भारतीय राजनीति के चिर विद्रोही राम मनोहर लोहिया बेशक गांधी के शिष्य थे, लेकिन उनकी दृष्टि जर्मनी में अध्ययन के दौरान समाजवादी सोच के तहत विकसित हुई थी। पिछली सदी के दूसरे दशक के सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री सोंबार्ट के शिष्य लोहिया ने देश में बराबरी वाले समाज का सपना देखा।

सिद्धांतों की राजनीति की मजबूत नींव उन्होंने रखी। जब उनकी ही पार्टी की केरल की सरकार ने पिछली सदी के पचास के दशक में आंदोलनरत किसानों पर गोली चलाई तो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव के नाते अपनी ही सरकार को इस्तीफा देने का उन्होंने आदेश दे दिया।

लोहिया ने समाजवादियों को “सुधरो या टूट जाओ” का नारा दिया था। बराबरी का समाज को बनाने के लिए उन्होंने लोकसभा में “तीन आना बनाम पच्चीस हजार रुपए” की मशहूर बहस शुरू की। तब एक भारतीय आम आदमी बमुश्किल तीन आना रोजाना खर्च कर पाता था, जबकि प्रधानमंत्री पर तब पच्चीस हजार रोजाना का खर्च था।

संसद और विधानसभाओं में शून्यकाल की शुरूआत हो या गैरकांग्रेसवाद का नारा, सब लोहिया ने दिया था। आज भी समाजवादी धारा की पूरी राजनीति लोहिया का ही नाम जपती है। लालू यादव हों या मुलायम सिंह यादव या फिर नीतीश कुमार, देवेगौड़ा हों या फिर नवीन पटनायक, सब घोषित तौर पर समाजवाद और लोहिया की राह पर चलने का दावा करते नहीं थकते।

दीनदयाल उपाध्याय

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Deendayal Upadhyaya

राजनीति सिर्फ सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कार्य भी है, यह सोच पहली बार भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संगठन जनसंघ के महासचिव दीनदयाल उपाध्याय ने दी थी। उन्होंने राष्ट्र की मौजूदा अवधारणा भूभाग और जनसंख्या से बाहर को बताया। उनका कहना था कि चित्ति यानी मन का विराट रूप राष्ट्र है।

आज जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिकल्पना की खूब चर्चा होती है, उसे दीनदयाल उपाध्याय चित्ति यानी आत्मा का विस्तार मानते थे। उन्होंने एकात्म मानववाद का सिद्धांत भी दिया। जिसके मुताबिक चाहे बड़ा हो या छोटा, इंसान हो या जानवर, सबकी आत्मा एक रूप है। इसलिए किसी को भी परेशान करने या कष्ट देने का अधिकार किसी को नहीं है।

एकात्म मानव दर्शन में हाशिए पर पड़े इंसान का आंसू पोंछना रहा है। उनका मानना था कि समाज के अंतिम छोर पर स्थित व्यक्ति का विकास होना चाहिए। केंद्र की मौजूदा भारतीय जनता पार्टी की सरकार उनके ही विचारों पर चलती है। केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारों की अंत्योदय योजनाएं दरअसल दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांत पर ही आधारित है।

कांशीराम

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Kanshi Ram - फोटो : BBC

पुणे में नौकरी करते हुए वामसेफ नामक संगठन बनाया। बहुजन वर्ग को आगे लाने और उनके उद्धार के लिए बहुजन एकता का दर्शन दिया। लेकिन जब चुनावी सफलता नहीं मिली तो अगड़े वर्ग का साथ लिया।

1993 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके यूपी का चुनाव लड़ा और इतिहास बदल दिया। कांशीराम की ही देन है कि भारतीय समाज में पिछड़ा और दलित रहा दलित तबका अब अपने अधिकारों के लिए उठ खड़ा होने में हिचक नहीं दिखाता।

अब उसे अपनी ताकत का आभास है और वह इसके लिए खुद को कांशीराम का कर्जदार मानता है।

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