‘पत्रकारों का काम तथ्य और सत्य को खड़ा करना’, गलत रिपोर्टिंग से हो सकता है एक और संघर्ष
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विश्व शांति में मीडिया एवं पत्रकारिता की भूमिका को लेकर पुणे की एमआइटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी और पुणे श्रमजीवी पत्रकार संघ के संयुक्त प्रयास से देश का पहला मीडिया एवं पत्रकारिता सम्मेलन एमआईटी परिसर लोनी स्थित विश्व शांति गुंबद के प्रांगण में आयोजित किया गया। इसमें डिजिटल मीडिया के जरिए फेक न्यूज फैलने वाली समस्याओं और प्रतिबंधात्मक उपायों, विवादात्मक पत्रकारिता में पत्रकार की भूमिका तथा भारतीय पत्रकारिता का उज्ज्वल इतिहास समेत कई विषयों के सत्रों पर खुलकर चर्चा की गई।
दो दिन तक चले इस राष्ट्रीय सम्मेलन में दिल्ली, मुंबई, नागपुर, पुणे समेत देश के अनेक जाने माने मीडिया कर्मियों ने हिस्सा लिया और देश के विभिन्न मीडिया शिक्षण संस्थानों के करीब डेढ़ हजार छात्रों के साथ सीधा संवाद किया।
कई वरिष्ठ पत्रकारों ने लिया हिस्सा
सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में देश के जाने-माने पत्रकारों ने डिजिटल मीडिया से अफवाहों के प्रसार की समस्या और प्रतिबंधात्मक उपाय, विवादास्पद जोखिम भरे संघर्ष क्षेत्रों में पत्रकारिता की चुनौतियां और पत्रकार की भूमिका तथा भारतीय पत्रकारिता का उज्ज्वल इतिहास पूर्व स्थिति और अपेक्षाएं, झूठी और पैसा लेकर लिखी जाने वाली खबरों की बढ़ती समस्या, मीडिया में स्वनियमन की जरूरत आदि विषयों पर खुलकर चर्चा हुई। उद्घाटन सत्र में मीडिया की नैतिकता विषय पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी, एमके वेणु, शिरीन सेठी, कोलकाता प्रेस क्लब के स्नेहाशीष सूर आदि ने संबोधित किया।
सवाल पूछना बंद नहीं हों
सभी सत्रों का संचालन लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार आरएन भास्कर ने किया। वेणु ने कहा कि तमाम दबावों के बावजूद पत्रकारों को सवाल पूछना बंद नहीं करना चाहिए। सूर का कहना था कि मीडिया न्यूज रूम में जितने ज्यादा से ज्यादा पत्रकार व्यवसायिक नैतिकता से परिपूर्ण होंगे प्रबंधन का दबाव उतना ही कम होगा। वहीं कुलकर्णी ने इस पर चिंता जाहिर की कि पत्रकारों से पत्रकारिता से इतर काम भी लिए जाने का चलन काफी बढ़ गया है। इस मौके पर सूर द्वारा महात्मा गांधी पर लिखी गई किताब- ए रिपोर्टर एंड एडिटर का विमोचन भी किया गया।
अफवाहें एक खोखला गौरव पैदा करती हैं
डिजिटल मीडिया से अफवाहों का फैलाव समस्या और प्रतिबंधात्मक उपाय विषय पर आयोजित सत्र में जयंत मयंकर, जगती करण, माधूरी दंताले, विजय सातोकर, डॉ. राजपूत, नितिन ब्रह्मे, श्रीकांत साबळे, सिरिन सेठी, प्रतिभा चंद्रन ने अपनी राय रखी। नितिन ब्रह्मे ने कहा, पत्रकारिता में सबसे महत्वपूर्ण सूत्र होते है, वहीं व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया जैसे ग्रूप के जरिए फेक न्यूज का फैलाव बड़े पैमाने पर होता है, ऐसी खबरें समाज में चंद पलों में फैलने से इसे रोका जाना जरूरी है। इस तथ्य को उजागर करना महत्वपूर्ण है कि प्रशासनिक तंत्र का एक हिस्सा अफवाहें फैलाने में शामिल है। ये अफवाहें एक खोखला गौरव पैदा करती हैं, जो खतरनाक है, क्योंकि इससे अफवाह फैलाने वालों को एक एजेंडा सेट करने और बढ़ावा देने में मदद मिलती है।
डिजिटलाइजेशन ने सभी को पत्रकार बनाया
डॉ. बालसिंह राजपूत का कहना था कि डिजिटलीकरण ने सभी को एक पत्रकार बना दिया है, और इस तरह से हमारा समाज लोकतंत्रात्मक हुआ है। मीडिया हाईजीन सीखना चाहिए, और अपने बच्चों को भी यही सिखाना चाहिए, और जितनी संभव हो उतनी जागरूकता फैलाना चाहिए। इसी तरह, 'तथ्यात्मक वेबसाइटों' को भी उन पर भरोसा करने से पहले सत्यापित किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया एक प्रचार मंच होने की बात भी उन्होंने कही। जगती करण ने कहा, डिजिटल का मुख्य लाभ यह है कि हम कम राशि खर्च कर सच्ची और अच्छी खबरें परोस सकते हैं, ऐसी खबरें परोसते समय हम पर किसी का दबाव नहीं होगा।
नो न्यूज इज बेटर न्यूज
मीलिंद खांडेकर ने बताया, देश में जनतंत्र सबसे बडी चीज है। इसलिए सोशल मीडिया का समाज पर काफी बड़ा परिणाम दिखाई देता है। यहां पर अनगिनत डिजिटल मीडिया पोर्टल्स होने से सरकार के लिए अपनी सामग्री को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, मीडिया प्लेटफार्म्स की इतनी बड़ी विविधता लोकतंत्र के लिए स्वस्थ है। विजय सातोकर ने बताया कि डिजिटल माध्यम ऐसी चीज है, जो केवल चार मिनट में ही सारी दुनिया में काफी कुछ फैला सकते हैं, जिसका असर अच्छा या बुरा हो सकता है। जयंत मयंकर ने बताया कि नो न्यूज इज बेटर न्यूज है। वहीं समाज में सभी घटना के लिए मीडिया को जिम्मेदार ठहराना गलत होगा।
अफवाह फैलाने के सौ तरीके
शिरीन सेठी ने कहा कि अफवाह फैलाने के सौ तरीके हैं। यहां तक कि संपादन किसी कहानी के परिप्रेक्ष्य को बदल सकता है। प्रौद्योगिकी भी त्रुटियों का परिचय दे सकती है। इसलिए, मजबूत सिद्धांतों के साथ एक अच्छी तरह से पढ़े जाने वाले, सतर्क मानव से ज्यादा मजबूत कुछ भी नहीं था। अगर हम सटीक समाचार चाहते हैं तो हमारे लिए नैतिक होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। सत्र को संचालित करने वाले आरएन भास्कर ने कहा, जहां भी व्यक्तिवाद है वहां अफवाह या निजी पक्षपात की गुंजाइश होगी। इसलिए, पत्रकारों को निष्पक्षता के अपने मूल सिद्धांत से चिपके रहना चाहिए।
वॉर जोन में एक पत्रकार अपनी लड़ाई में अकेला
जोखिम से भरे संघर्ष क्षेत्रों में पत्रकारिता की चुनौतियां और पत्रकार की भूमिका विषय पर हुए सत्र में अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री ने बताया कि रिपोर्टिंग दो प्रकार की होती है, स्थाई और अस्थाई। विवादात्मक जोन में रिपोर्टिंग करने वाला सबकी नजरों में होता है। पत्रकारों का काम ही होता है कि वह तथ्य और सत्य को जानना या खड़ा करना। साथ ही, उन्होंने कहा कि वॉर जोन में एक पत्रकार अपनी लड़ाई में अकेला है। उन्हें एक तरफ संघर्ष में शारीरिक रूप से चोटिल होने का खतरा है, तो दूसरी ओर सटीक रिपोर्टिंग की उनकी बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि गलत रिपोर्टिंग से एक और ‘संघर्ष’ पैदा हो सकता है।
जान का जोखिम रहता है
वहीं इस विषय पर पैनल में शामिल राखी बख्शी का कहना था कि विवादात्मक पत्रकारिता करते समय पत्रकारों के सामने कई बार कठिन परिस्थितियां आती हैं, ऐसे समय वह अपनी जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करता है। कार्तिक लोखंडे का कहना है कि नक्सली इलाकों में रिपोर्टिंग करते समय आप अपनी जान जोखिम में डालकर खबरों को जूझना पड़ता है।
स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी, आंबेडकर की पत्रकारिता का योगदान
भारतीय पत्रकारिता का उज्ज्वल इतिहास, पूर्व स्थिति और अपेक्षाएं विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह का कहना था कि महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, आगरकर और डॉ. आंबेडकर की पत्रकारिता ने देश में हलचल मचा दी थी। वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पांडे का कहना था कि स्वतंत्रता पूर्व तिलक, आगरकर, गोखले ने पत्रकारिता को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था। स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी, आंबेडकर की पत्रकारिता का सबसे बड़ा योगदान था। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में लोकपाल बिल पास करने के लिए आंदोलन हुआ था। वहीं, अब सोशल मीडिया आया है, जिसमें अच्छी खबरे देने से लोकतंत्र मजबूत बनेगा।
साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि देश और मानवता के खिलाफ पत्रकारिता न हो, पत्रकार सरकार के खिलाफ लिखे न कि राष्ट्र के खिलाफ। वहीं देहरादून से आए उत्तराखंड सरकार के मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट ने अपने पत्रकारीय जीवन के अनके अनुभव साझा करते हुए सरकार और मीडिया के रिश्तों पर बात की।टीवी पत्रकार पल्लवी जोशी ने माना कि मौजूदा दौर में मीडिया को आत्मनिरीक्षण की जरूरत है।
मीडिया भी नैतिक भूमिका भूला
पैनल में शामिल वरिष्ठ पत्रकार और पुणे श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष प्रसाद कुलकर्णी ने कहा कि बदलते दौर में पत्रकारिता की भूमिका में भी बड़े बदलाव आ चुके हैं। इस बदलावों के चलते मीडिया भी नैतिक भूमिका भूल चुका है। पहले पत्रकार केवल अपने काम पर ही फोकस रहता था, लेकिन बढ़ते सोशल मीडिया के चलते अब जल्दबाजी में खबरों को प्रकाशित करना पड़ता है। वहीं उन्होंने अपील करते हुए कहा कि ऐसी पत्रकारिता न करें, जो जनतंत्र के खिलाफ हो और प्रेस की गरिमा को बनाए रखें।