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कांग्रेस की किश्ती वहीं डूबी जहां पानी बहुत कम था
शशिधर पाठक
Updated Wed, 26 Apr 2017 06:54 PM IST
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Ajay Makan
- फोटो : PTI
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कांग्रेस की किश्ती वहीं डूबी जहां पानी बहुत कम था। यह कहावत कांग्रेस पर बहुत सटीक बैठती है। दिल्ली एमसीडी चुनाव में एक बार फिर पार्टी की अंर्तकलह ने उसके मंसूबों ने फारी फेर दिया। शीला और अजय माकन गुट के दाव-प्रतिदांव में पार्टी नंबर दो का दर्जा पाने चूक गई। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी की इसी गुटबाजी ने पूरी कांग्रेस की दशा खराब कर रखी है।
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पार्टी के एक राष्ट्रीय महाससचिव ने कहा कि हम दिल्ली में एमसीडी चुनाव के नतीजों का विश्लेषण कर रहे हैं। सूत्र का कहना है कि अब यह कोई छिपी बात नहीं है कि दिल्ली प्रदेश कांग्रेस में भारी घमासान है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। माकन ने भी जवाबी तेवर अपनाते हुए बिना समय गंवाएं एमसीडी चुनाव के हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है।
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शीला खेमे ने बढ़ाई परेशानी
एमसीडी चुनाव में टिकट वितरण, अजय माकन के व्यवहार, कामकाज के तरीके को आधार बनाते हुए शीला गुट ने चुनाव प्रक्रिया दौरान ही तेवर कड़े कर दिए थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री डा. अशोक वालिया ने जहां नाराजगी जताई, वहीं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने भी पार्टी छोड़ दी। अंबरीश गौतम पहले ही कांग्रेस को अलविदा कहकर भाजपा में शामिल हो गए थे। अरविंदर सिंह लवली के साथ-साथ अमित मलिक और प्रदेश महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष बरखा ने बागी तेवर अपना लिए। सभी अब भाजपा नेता बन चुके हैं। माकन गुट के अनुसार यह सभी शीला गुट के लोग थे और संदीप दीक्षित भी लगातार मोर्चा खोले हुए हैं। पार्टी के प्रचार के दौरान भी कांग्रेस दो धड़े में बंटी रही। माना जा रहा है कि सिके पीछे कहीं न कहीं अजय माकन का तानाशाही भरा व्यवहार भी जिम्मेदार है।
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माकन-शीला में पुरानी रार
अजय माकन और शीला दीक्षित में काफी पहले से नहीं बन रही है। हालांकि अजय माकन शीला सरकार में मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष रहे हैं, लेकिन न बन पाने के कारण ही उन्हें पहले मन मोहन सरकार में जगह दी गई थी और बाद में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर मीडिया विभाग का प्रमुख बना दिया गया था। यह विभाग भी कांग्रेस के कद्दावर नेता जनार्दन द्विवेदी से लेकर दिया गया था।
माकन कांग्रेस उपाध्यक्ष के प्यारे
अजय माकन को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का भरपूर विश्वास प्राप्त है। पार्टी के अंदरखाने में माना जाता है कि राहुल गांधी के वीटो लगाने पर ही अरविंदर सिंह लवली से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद लेकर माकन को दिया गया था। लवली को शीला दीक्षित की सलाह पर ही प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लवली शीला सरकार में आखिरी समय समय तक मंत्री थे और शीला गुट के ही माने जाते थे। वहीं अजय माकन पुराने खानदानी कांग्रेस परिवार से आते हैं।
शीला का खानदानी रिश्ता
शीला दीक्षित का कांग्रेस से बहुत पुराना नाता है। पं. उमाशंकर दीक्षित की बहू शीला दीक्षित कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की विश्वासपात्रों में गिनी जाती हैं। यही वजह रही की शीला दीक्षित को न केवल दिल्ली की कमान सौंपी गई थी बल्कि उनके सामने राजधानी में जो भी राजनेता खड़ा हुआ, उसका कद छोटा हो गया। चौधरी प्रेम सिंह, राम बाबू शर्मा सरीखे तमाम नेताओं ने इसकी कीमत चुकाई। शीला दीक्षित कांग्रेस अपना हमेशा से अपना एक रुतबा रखती हैं और कांग्रेस अध्यक्ष उनके सम्मान में कभी कोई कसर नहीं छोड़ती।
रस्सी की ऐठन न गई
रस्सी जल गई, पर ऐठन न गई। यही स्थिति कांग्रेस पार्टी की है। कांग्रेस पार्टी का भले ही जनता के बीच में जनाधार घट रहा है, लेकिन नेताओं के आपसी अहं का टकराव बढ़ता जा रहा है। पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को दिल्ली में एमसीडी चुनाव से काफी उम्मीदें थी। विधानसभा के उपचुनाव में जहां आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई वहीं कांग्रेस प्रत्याशी को उससे करीब तीन गुना वोट मिले थे। इसे कांग्रेस एमसीडी चुनाव में ठीक-ठाक सीटे आने की उम्मीद कर रही थी, लेकिन आपसी गुटबाजी ने बीच चुनाव प्रचार के दौरान ही उम्मीदों पर पानी फेर दिया। यहां तक की बीच चुनाव में ही नेताओं ने बगावत तेज कर दी।