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मंजिलें और भी हैं : बाल कुपोषण दूर करने वाला इंजीनियर

Wed, 22 May 2019 08:52 PM IST
अमर शर्मा महेश आरवी
महेश आरवी Published by: अमर शर्मा Updated Wed, 22 May 2019 08:52 PM IST
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manzilein aur bhi hain : mahesh aarvi an Engineer fighting against Child Malnutrition
महेश आरवी - फोटो : Amar Ujala
मैं कर्नाटक में रहने वाला एक बायोटेक इंजीनियर हूं। वह 2009 की बात है। तब मैं बंगलूरू के पीईएस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में फाइनल ईयर का छात्र था। मैं फॉरेंसिक साइंस में लघु शोध करने की तैयारी कर ही रहा था कि उसी दौरान कुपोषण पर कई सारी रिपोर्टें मैंने पढ़ीं। मैंने पढ़ा कि देश के 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जो राष्ट्रीय शर्म है। कहां तो मैं इंजीनियरिंग का छात्र था और कहां फाइनल ईयर में मेरे जीवन का फोकस अचानक बदल रहा था। मैं जान रहा था कि भीषण गरीबी, अशिक्षा, कम उम्र में शादी, दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, साफ-सफाई के प्रति जागरूकता की कमी तथा पोषक आहारों के प्रति पहुंच न होना कुपोषण के कारण हैं। मुझे लगा कि इंजीनियर बनकर मैं तो अपने जीवन का लक्ष्य पूरा कर लूंगा। लेकिन इसके बजाय अगर मैं बाल कुपोषण दूर करने की दिशा में काम करूं, तो इससे देश के असंख्य बच्चे लाभान्वित होंगे।
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कुपोषण की काट ढूंढते हुए मुझे स्पिरुलिना के बारे में पता चला। यह नीले-हरे रंग का शैवाल है, जिसे डाइट सप्लीमेंट के तौर पर लिया जाता है। मैं इस क्षेत्र में काम करने के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक रास्ता निकल आया। सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएफटीआरआई) में, जो खाद्य के क्षेत्र में देश का प्रतिष्ठित शोध संस्थान है, मुझे शोध करने का अवसर मिल गया। वहां छह महीने के शोध के दौरान मुझे पता चला कि मात्र एक ग्राम स्पिरुलिना में एक किलोग्राम फल या सब्जी के बराबर की पोषण क्षमता है। स्पिरुलिना की इस पोषण क्षमता के कारण ही अंतरिक्ष यात्रियों को इसे पूरक खाद्य (डाइट सप्लीमेंट) के तौर पर दिया जाता है।
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शोध कार्य समाप्त होने के बाद मैंने स्पिरुलिना फाउंडेशन नाम से एक संस्था का गठन किया और अपने घर के पिछवाड़े स्पिरुलिना उगाने लगा। इसे ताजा और खारे पानी, दोनों में उगाया जा सकता है। दूसरी वनस्पतियों की तरह इसे् भी सूर्य की रोशनी में प्रकाश संश्लेषण विधि से उगाया जाता है। यह बिल्कुल प्राकृतिक होता है। मैं साल में करीब डेढ़ टन स्पिरुलिना उगाता हूं। स्पिरुलिना की लागत बहुत ज्यादा नहीं आती, क्योंकि यह अधिक जगह नहीं घेरता। एक्वेरियम में भी इसे उगाया जा सकता है।
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मेरी कुल आठ लोगों की टीम है। हम स्पिरुलिना को सुखाकर पीस लेते हैं, फिर इसके कैप्सूल बनाते हैं। कुपोषित बच्चों को हम ये कैप्सूल मुफ्त में देते हैं, जबकि अन्य लोगों को 120 कैप्सूल तीन सौ रुपये में बेचते हैं। तीन महीने तक अगर रोज एक ग्राम स्पिरुलिना का सेवन किया जाए, तो कुपोषण खत्म हो जाता है। मेरा लक्ष्य मुनाफा कमाना नहीं है। 2010 में मैंने तमकुर जिले के एक अनाथालय में स्पिरुलिना के कैप्सूल बांटकर अपनी परियोजना की शुरुआत की थी। तीन महीने बाद वहां के बच्चों का हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ गया था। 


एक साल बाद राज्य के महिला और बाल विकास मंत्रालय ने मेरे काम को सराहा, तो तुमकुर, हासन और रायचूर जिलों में इस कार्यक्रम को विस्तार देने में सरकार ने मेरी मदद ली। राज्य के ये तीनों जिले कुपषण के मामले में कुख्यात हैं। उसके बाद कम से कम बीस संस्थाओं ने, जिनमें एनजीओ से लेकर कॉरपोरेट हाउस तक हैं, स्पिरुलिना उत्पादन बढ़ाने में मुझे आर्थिक मदद दी। अभी तक मैंने देश के 250 शहरों और गांवों में स्पिरुलिना के साठ लाख कैप्सूल बांटे हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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