लॉकडाउन के चलते कई प्राइवेट ब्लड बैंक हुए बंद, थैलेसीमिया के मरीज हो रहे परेशान
- रेड क्रॉस से बढ़ी रक्त की मांग, 125 यूनिट से बढ़कर 250 यूनिट ब्लड रोज उपलब्ध करा रहा है
- कोरोना संक्रमण के डर के कारण रक्तदान करने नहीं आ रहे लोग, कई प्राइवेट ब्लड बैंक बंद
- केजीएमयू रक्तदाताओं को विशेष स्मृति चिन्ह देकर कर रहा सम्मानित
विस्तार
लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल में इस समय प्रतिदिन 40 से 50 लोग रक्तदान करने आ रहे हैं जबकि रक्त की आवश्यकता 175 यूनिट के आसपास बनी हुई है। अब तक अस्पताल अपने बैंक से मांग और आपूर्ति के बीच के इस अंतर को पूरा कर रहा था, लेकिन अब उसके लिए भी इस कमी को पूरा करना मुश्किल हो गया है।
वहीं दिल्ली के रेड क्रॉस को रक्तदान की अपनी क्षमता को बढ़ाकर दोगुना करना पड़ा है क्योंकि कई बड़े अस्पतालों में अब रक्त की कमी हो गई है।
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) की ब्लड ट्रांसफ्यूजन डिपार्टमेंट की प्रमुख डॉक्टर तूलिका चंद्रा ने अमर उजाला को बताया कि उनके यहां रक्तदाताओं में भारी कमी दर्ज की गई है। कोरोना काल के पूर्व उनके यहां रोजाना औसतन 250-275 के करीब लोग रक्तदान करते थे, जो इस समय घटकर केवल 40-50 लोगों तक सीमित रह गए हैं।
सामान्य परिस्थितियों में अस्पताल लगभग 250 यूनिट रक्त प्रतिदिन उपलब्ध करवाता था, लेकिन कोरोना काल में सर्जरी इत्यादि टलने से रक्त की मांग में कुछ कमी हुई है। अब यह लगभग 175 यूनिट के आसपास बनी हुई है।
सबसे ज्यादा रक्त बच्चों के जन्म के समय महिलाओं को देना पड़ रहा है। अस्पताल से थैलेसीमिया के लगभग 100 पीड़ित जुड़े हुए हैं जिन्हें वह लगातार रक्त उपलब्ध करवाता है। लेकिन अब उन्हें भी अपने साथ डोनर लाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
खून देने वालों के लिए अस्पताल की तरफ से विशेष पास भी दिया जा रहा है, ताकि लोगों को रक्तदान करने के लिए आने-जाने में कोई परेशानी न हो। अस्पताल रक्तदाताओं को विशेष स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित भी कर रहा है कि उन्होंने कोरोना काल में रक्तदान कर किसी के जीवन को बचाने का काम किया।
रक्त की मांग और आपूर्ति के बीच का भारी अंतर अब तक अस्पताल के पास उपलब्ध ब्लड बैंक के माध्यम से किया जा रहा था। लेकिन यह लगातार खत्म हो रहा है। मजबूरन अस्पताल अब मरीजों से अपने साथ डोनर लाने के लिए कह कर रहा है।
उत्तर प्रदेश में रोजाना औसतन 12000 यूनिट रक्त की आवश्यकता पड़ती है, जो स्थाई और अन्य रक्तदाताओं के माध्यम से पूरा किया जाता है। अस्पतालों के अलावा विभिन्न प्राइवेट संस्थाएं भी इसमें अपना सहयोग करती हैं।
रेड क्रॉस ने क्षमता बढ़ाई
इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की प्रमुख डॉक्टर वनश्री सिंह ने अमर उजाला को बताया कि कोरोना काल की शुरुआत में उनके यहां रक्तदाताओं की संख्या में भारी कमी आई थी।
सोसाइटी अपने रक्तदान शिविर भी नहीं लगा पा रही थी, लेकिन उनके लगातार उत्साहवर्धन से अब लोग रक्तदान करने आ रहे हैं। वे रोजाना एक से दो कैंप लगा रही हैं, जिससे पर्याप्त मात्रा में रक्त उपलब्ध हो पा रहा है।
वनश्री सिंह के मुताबिक इस समय रेड क्रॉस रोजाना 250 यूनिट के लगभग रक्त उपलब्ध करवा रहा है। रक्त लेने वालों में थैलेसीमिया के स्थाई मरीजों के अलावा एम्स, सफदरजंग अस्पताल, लेडी हार्डिंग और कई प्राइवेट अस्पताल के मरीज भी शामिल हैं।
दिल्ली में लगभग 2400 थैलेसीमिया के मरीज
राजधानी दिल्ली में लगभग 2400 थैलेसीमिया के मरीज हैं। इनके रक्त में हीमोग्लोबीन का स्तर 9.5 प्वाइंट से कम होने पर (या डॉक्टर की सलाह पर) दोबारा चढ़ाया जाता है।
लेकिन कोरोना काल में प्रतिबंधों के कारण गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा या अन्य जगहों के मरीज दिल्ली नहीं आ पा रहे हैं। उन्हें उनकी जगहों पर ही रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जा रही है।
प्रतिवर्ष सात से 10 हजार थैलेसीमिया ग्रस्त बच्चे पैदा होते हैं जिन्हें आजीवन रक्तदान पर ही निर्भर करना पड़ता है, क्योंकि इनका रक्त हवा से ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा ग्रहण नहीं कर पाता। पूरे भारत में लगभग 2.5 लाख लोग थैलेसीमिया से पीड़ित हैं।
एक बार किया गया रक्तदान सामान्य पैकिंग में 42 दिन से लेकर विशेष पैकिंग के साथ एक वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। रक्तदान के बाद कोई भी सामान्य व्यक्ति तीन महीने के बाद दोबारा रक्तदान कर सकता है, जबकि शरीर में यह लगभग 36 दिन में दोबारा बन जाता है।
वहीं प्लाज्मा के लिए हफ्ते या दस दिन में दो बार प्लाज्मा दान किया जा सकता है। इसका उपयोग किसी रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होने के बाद उस बीमारी से संबंधित रोगी के उपचार में किया जाता है।