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Research: दवाओं के बोझ से दबे जा रहे भारत समेत कई देश, बढ़ रहा कर्ज, शोध में उजागर हुई वैश्विक असमानता

Wed, 03 Sep 2025 07:34 AM IST
बशु जैन अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: बशु जैन Updated Wed, 03 Sep 2025 07:34 AM IST
सार

अंतरराष्ट्रीय शोध से सामने आया है कि कमजोर और मध्यम आय वाले देशों को अमीर देशों की तुलना में समान दवाओं के लिए कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। इसका सीधा असर गरीब देशों की घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, क्योंकि वहां दवाओं का बोझ सीधे लोगों की जेब पर आता है।

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Many countries including India being burdened by burden of medicines, global inequality exposed in research
दवाएं - फोटो : Freepik.com

विस्तार

स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को लेकर दुनिया पहले से ही गहरी खाई में बंटी हई है। ऐसे में दवाओं की बढ़ती कीमतें हालात को और कठिन बना रही हैं।
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एक अंतरराष्ट्रीय शोध से सामने आया है कि कमजोर और मध्यम आय वाले देशों को अमीर देशों की तुलना में समान दवाओं के लिए कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। इसका सीधा असर गरीब देशों की घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, क्योंकि वहां दवाओं का बोझ सीधे लोगों की जेब पर आता है। यह अध्ययन अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने किया है और इसके नतीजे जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) हेल्थ फोरम में प्रकाशित हुए हैं।

शोध में बताया गया है कि भले ही अमीर देशों में दवाओं की अंकित कीमत (स्टिकर प्राइस) ऊंची लगती हो, लेकिन वहां की आय और सरकार की सब्सिडी व्यवस्था को देखते हुए ये अपेक्षाकृत सस्ती पड़ती हैं। दूसरी ओर गरीब और मध्यम आय वाले देशों में कीमतें कागजों पर कम जरूर दिखती हैं, लेकिन लोगों की कम आय और सरकारी सब्सिडी की कमी के कारण यह दवाएं असल में कहीं ज्यादा महंगी साबित होती हैं।
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गरीब देशों में दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल इसलिए
  • संक्रामक रोगों का दबाव : टीबी, मलेरिया, डेंगू और एचआईवी जैसी बीमारियां अब भी व्यापक हैं। स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी: समय पर जांच और इलाज नहीं मिल पाने से मरीज देर से अस्पताल पहुंचते हैं और उन्हें लंबा दवा कोर्स लेना पड़ता है।
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  • सस्ती जेनेरिक दवाओं पर निर्भरता दवाओं की गुणवत्ता और आपूर्ति में असमानता के कारण लोग कई बार बार-बार दवा बदलने को मजबूर होते हैं। बीमा कवरेज की कमी अधिकांश गरीब देशों में स्वास्थ्य बीमा बेहद सीमित है, जिससे हर छोटे-बड़े इलाज का बोझ सीधे परिवार पर पड़ता है।
मानसिक और हृदय रोग की दवाएं सबसे महंगी
शोध में पाया गया कि मानसिक और हृदय रोगों की दवाएं सबसे महंगी साबित हो रही हैं, जबकि हेपेटाइटिस बी और सी की दवाएं अपेक्षाकृत सस्ती हैं। 1-एमोक्सिसिलिन, आइबुप्रोफेन और साल्बुटामोल जैसी दवाएं कई देशों में न्यूनतम मजदूरी के केवल एक दिन की कमाई से भी कम कीमत पर मिल गई।
दूसरी ओर, कैंसर की दवा पैक्लिटैक्सेल गरीब देशों के मरीजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई। इसे खरीदने के लिए औसतन 40 दिन की न्यूनतम मजदूरी खर्च करनी पड़ रही है।


भारत के घरेलू बजट पर असर
भारत में घरेलू बजट का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य संबंधी खर्च में चला जाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (नेशनल हेल्थ अकाउंट्स) के ताजा आकलन बताते हैं कि भारत में लगभग 55 फीसदी स्वास्थ्य खर्च सीधे लोगों की जेब से होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह बोझ और भी ज्यादा है, क्योंकि वहां स्वास्थ्य बीमा कवरेज बहुत सीमित है और सरकारी अस्पतालों तक पहुंच कठिन है।
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