लॉकडाउन में इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ने से बच्चों पर मंडराने लगा साइबर बुलिंग का खतरा
- लॉकडाउन की वजह से इंटरनेट पर बच्चों की निर्भरता बढ़ी
- इंटरनेट के माध्यम से स्कूल की पढ़ाई से लेकर दोस्तों से बातचीत
- 13-18 साल के आयु वाले बच्चों में साइबर बुलिंग का खतरा ज्यादा
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कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए लॉकडाउन का सहारा लिया गया लेकिन इस बीच लोगों की निर्भरता इंटरनेट पर ज्यादा बढ़ गई। यही नहीं बच्चों में भी ऑनलाइन रहने का वक्त ज्यादा बढ़ गया। क्योंकि अब स्कूलों की पढ़ाई भी इंटरनेट के माध्यम से की जा रही है, इसलिए बच्चे ज्यादा समय यहां बिताते हैं।
सामान्य जीवन में मां-बाप अपने बच्चों को हर घड़ी सावधान रहने की सीख देता है। इस सिलसिले में बच्चों को कई सारी चीजें सिखाई जाती हैं, जैसे- अनजान लोगों से बात नहीं करना, किसी की बातों में नहीं आना है या फिर दूसरों की दी गई चीजों को ना खाना। लेकिन सोशल मीडिया पर अपना आचरण कैसे रखना है, ये किसी ने सिखाया ही नहीं।
सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने से पहले या ऑनलाइन गेम खेलते वक्त बच्चों को नहीं बताया जाता है कि इंटरनेट पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं। लॉकडाउन में घर में बंद होने की वजह से बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हो गए हैं लेकिन उन पर एक साइबर बुलिंग नाम के अनजाने खतरे का डर भी मंडराने लगा है।
जापान में पिछले दिनों साइबर बुलिंग के कारण ही हन्ना किमुरा की आत्महत्या चर्चा में रही है, लेकिन सरकारें अभी तक इसे रोक पाने में विफल रही हैं। एक सर्वे के मुताबिक 10 फीसदी बच्चों ने साइबर बुलिंह का अनुभव किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जो काम बिना इंटरनेट के हो सकता है उसके लिए भी इंटरनेट की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है।
लॉकडाउन की वजह से स्कूल बंद हैं और बच्चों को पढ़ाई ऑनलाइन करनी पड़ रही है। पढ़ाई से लेकर दोस्तों से बातचीत के लिए भी इंटरनेट का सहारा लेना पड़ रहा है। इंटरनेट ने किसी को नहीं छोड़ा है, जहां बड़े लोग इंटरनेट पर अक्सर फ्रॉ़ड और गलत जानकारी का शिकार होते हैं, वहीं बच्चों पर कई खतरे मंडरा रहे होते हैं।
इस समय बच्चों पर सबसे बड़ा खतरा ऑनलाइन बुलिंग का है, जिसका मतलब है इंटरनेट के जरिए धमकी या उत्पीड़न का सामना करना। छोटे या मध्यम आयु वर्ग के बच्चे जानकारी और तरीकों के अभाव में ऐसे खतरों में आसानी से पड़ सकते हैं। इसलिए बच्चों में साइबर बुलिंग का खतरा ज्यादा दिखाई दे रहा है।
साइबर बुलिंग को समझें
आसान भाषा में साइबर बुलिंग समझना हो तो ये कहा जा सकता है कि अभद्र भाषा, चित्रों और धमकियों से इंटरनेट पर किसी को परेशान करना साइबर बुलिंग की श्रेणी में आता है। ये कई तरह का हो सकता है जैसे किसी को ट्रोल करना, किसी दूसरे की पहचान का इस्तेमाल करना, किसी की निजी फोटो या बात को सार्वजनिक करना या फिर अश्लील फोटो या वीडियो भेजना। मौटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि किसी भी तरह से ऑनलाइन परेशान किए जाने को साइबर बुलिंग कहा जाता है।
छोटे बच्चों के दिमाग पर बुरा प्रभाव
लॉकडाउन के बीच जिस तरह से बच्चे सोशल मीडिया पर समय बिता रहे हैं, उससे साफ है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर हो रही बातों का उन पर काफी असर पड़ रहा है। बच्चे दोस्तों से होने वाली बातचीत वैसे भी माता-पिता को नहीं बताते, फिर ऑनलाइन माध्यमों पर हो रही बातों को वे बताएं, ये उम्मीद कैसे की जा सकती है? हाल ही में इंस्टाग्राम पर ‘बॉयज लॉकर रूम’ नाम के एक ग्रुप में हुई आपत्तिजनक चैट के कुछ मैसेज वायरल हुए थे, जिसके बाद बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार को लेकर काफी बहस हुई थी।
क्या कहता है सर्वे?
बाल सहायता संगठन चाइल्ड राइट्स एंड यू के दिल्ली में किए गए सर्वे के मुताबिक 630 बच्चों में से 9.2 फीसदी बच्चों ने अपने जीवन में कभी ना कभी साइबर बुलिंग का अनुभव किया है। सर्वे में कहा गया है कि इनमें से 50 फीसदी बच्चों ने अपने मां-बाप और किसी बड़े को इसके बारे में नहीं बताया है।
सर्वे में एक और बात कही गई है कि जितना ज्यादा समय बच्चे ऑनलाइन होकर बिताते हैं, उतना ही ज्यादा साइबर बुलिंग होने का खतरा बढ़ जाता है। सर्वे के मुताबिक तीन घंटे से ज्यादा इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 13 से 18 साल की उम्र के बच्चों में साइबर बुलिंग का खतरा ज्यादा बना रहता है।
चार घंटे इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में यह संख्या छह फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी तक थी। चाइल्ड राइट्स एंड यू की स्टडी में शामिल बच्चों में दस में से चार लड़कों ने अपनी मॉर्फ्ड यानी बदली तस्वीर या वीडियो देखी। इनमें से आधे बच्चों ने कभी पुलिस में इस बात की शिकायत नहीं की।
बुलिंग से बचने के लिए किन बातों का ध्यान रखें
सोशल मीडिया के माहौल में बच्चे एक दूसरे को देखकर सीख ले रहे हैं और आज के दौर में सोशल मीडिया पर बहस और ट्रोलिंग अपने चरम पर है। कुछ लोग फेक अकाउंट्स बनाकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं और दूसरों को बुली करते हैं। ऐसे मामलों में माता-पिता नजर नहीं रख पाते। इसलिए बच्चों को गलत शब्द ना बोलने और बुली ना करने की सीख देनी चाहिए। साथ ही गलत आदतों से बचाना जरूरी है।
माता-पिता को बच्चों के व्यवहार में हो रहे बदलाव के लक्षण पहचानने होंगे जो बुली करने या होने पर सामने आते हैं। इसके अलावा माता-पिता बच्चों को साइबर बुलिंग के कानून के बारे में बताएं कि इसके क्या और कैसे परिणाम को सकते हैं।
इस समय इंटरनेट जिंदगी का अहम हिस्सा है और हर काम के लिए इसका इस्तेमाल जरूरी होता जा रहा है। हालांकि ये सब वर्चुअल दुनिया का एक हिस्सा हो सकता है लेकिन इसमें भी सामान्य जीवन वाले नियम हैं। इसलिए जरूरी है कि बच्चों को शुरुआत से ही सही शिक्षा दी जाए ताकि मिले ताकि वे एक जिम्मेदार इंटरनेट यूजर बन सकें।
बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर नियम तय करें
मनोचिकित्सक कहते हैं कि माता-पिता को इंटरनेट के इस्तेमाल पर कुछ नियम बनाने की जरूरत है, लेकिन ये ध्यान रखें कि बच्चों को उन नियमों के पीछे का कारण समझाएं। अगर आप उनके सोशल मीडिया पर नजर रखते हैं, तो ध्यान रखें कि ये बात बच्चों को पता हो। यदि उन्हें मालूम होगा कि उनके अभिभावक सब जानते हैं तो वे ऐसे मामले में भटकेंगे नहीं।
जनरेशन गेप की वजह से माता-पिता से बुलिंग पर बात संभव नहीं
साइबर बुलिंग पर काम करने वाले मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि आज बच्चे जिस टेक्नोलॉजी से भरे माहौल में बड़े हो रहे हैं, वैसा माहौल उनके माता-पिता ने अपने बचपन में नहीं देखा। इसलिए ऑनलाइन रहने पर सही आदतें क्या हैं, क्या शेयर करना चाहिए, क्या नहीं, क्या और कैसे बात करनी चाहिए, किन वेबसाइट्स पर जाना चाहिए और किन पर नहीं, जैसे विषयों पर माता-पिता से बच्चों की बात नहीं होती।
क्या हैं देश में इंटरनेट के सबसे बड़े जोखिम
माइक्रोसॉफ्ट की ओर से किए गए एक शोध में भारत में इंटरनेट के सबसे बड़े जोखिम अवांछित संपर्क, नफरत की भाषा, ट्रोल करना और कठोर व्यवहार बताए गए हैं। इस शोध में 13 साल से लेकर 74 साल तक के इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों से बातचीत की गई।
शोध में पता चला कि करीब 79 फीसदी लोगों को इंटरनेट पर इनमें से किसी एक जोखिम का सामना दो या उससे ज्यादा बार करना पड़ा है। लगभग 98 फीसदी लोगों को इन जोखिमों की वजह से किसी न किसी तरह की तकलीफ भी हुई। शोधकर्ताओं को पता चला कि दोषी व्यक्ति से परिचय होने और उससे जोखिम के बढ़ने में पक्का संबंध है। 45 फीसदी लोग ऐसे थे जो दोषी व्यक्ति से वास्तविक जीवन में मिले हैं। इसके विपरीत 55 फीसदी लोग दोषी से कभी नहीं मिले थे।
अगर तुलना की जाए तो युवा लड़कियों को लड़कों के मुकाबले ज्यादा जोखिम महसूस होता है। वे युवा जिनका जन्म 1981 से लेकर 1996 के बीच हुआ था, सबसे ज्यादा जोखिम का सामना करते पाए गए हैं। इन सबके अलावा माइक्रोसॉफ्ट ने डिजिटल सिविलिटी इंडेक्स का ताजा संस्करण भी जारी किया जो कि इंटरनेट पर सभ्य व्यवहार का आकलन करता है।
भारत में इस सूचकांक में एक साल में 12 अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है और अब ये 71 प्रतिशत पर है। सूचकांक पर जिस देश का स्कोर जितना ऊंचा होता है वहां इंटरनेट पर सभ्य व्यवहार में उतनी ही गिरावट हुई है।