छोटे से राहुल गांधी और कंधे पर पहाड़ सा बोझ, ये हैं उनके सामने बड़ी चुनौतियां
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क्या आप जानते हैं राहुल गांधी के बारे में ये पांच बातें?
पोस्टर का नारा-अतीत की नींव पर भविष्य की चुनौती- बार-बार अपनी ओर खींच रहा था। तय मुहूर्त पर पार्टी के उपाध्यक्ष छोटे से राहुल गांधी कंधे पर पहाड़ सा बोझ उठाने के लिए तैयार थे। वह समय भी आया।
परंपरा भी पूरी हुई और मां तथा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पदभार ग्रहण करके कांग्रेस अध्यक्ष बन गए हैं। लेकिन सवाल एक ही है।
क्या राहुल गांधी यह जिम्मेदारी निभा पाएंगे?
महिला कांग्रेस की फायर ब्रांड सुष्मिता देव को इसमें कोई संदेह नहीं है। सुष्मिता देव को राहुल गांधी में मोदी का विकल्प नजर आ रहा है। रेणुका चौधरी को भी अपने नेता पर पूरा भरोसा है।
कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी से लेकर, मोहन प्रकाश, भूपेन्द्र हुड्डा, पृथ्वीराज चौह्वाण, दीपेन्द्र हुड्डा, अजय माकन, रणदीप सुरजेवाला सबकी अपेक्षाएं पूरी तरह से जीवंत हैं। गुलाम नबी आजाद को भी राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस आगे बढ़ती हुई नजर आ रही है।
वह साफ कहते हैं कि राहुल गांधी ने अकेले ही गुजरात में अपना नेतृत्व दिखाया है। उनके नेतृत्व से परेशान होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गाली देने जैसे स्तर पर उतरना पड़ा। सुष्मिता देव भी कहती हैं कि गुजरात में राजनीतिक सूझ-बूझ का राहुल गांधी ने जो परिचय दिया, उसके बाद क्या शक बचता है।
बिलकुल अलग तरह का बोझ
राहुल गांधी के कंधे का बोझ अब तक के सभी कांग्रेस अध्यक्षों से अलहदा है। यहां तक कि अपनी मां सोनिया गांधी के बोझ से भी। सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार संभाला था तब कांग्रेस बाहरी ताकतों की बजाय अपने भीतर के कांग्रेसियों से जूझ रही थी। तब कांग्रेस के पास पार्टी छोड़कर गए नेताओं को वापस लाने, बिखरी ताकत इकट्ठा करने की चुनौती थी।
यहां तक कि सोनिया गांधी को अध्यक्ष पद के लिए खुद अपनी ही पार्टी के नेता जितेन्द्र प्रसाद से चुनौती भी मिली थी। आज राहुल गांधी के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। पूरी कांग्रेस एक है।
राहुल गांधी उसके नेता है और उन्हें इतनी सशक्त पृष्ठभूमि देने वाली पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। इस तरह पार्टी के भीतर भले ही कोई चुनौती न हो लेकिन पार्टी के बाहर स्थिति विकट है।
पहाड़ सी चुनौती
राहुल गांधी की चुनौती पहाड़ सी है। उनके सामने भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह नाम के दो दिग्गज नेता हैं। मोदी और शाह दोनों जमीन से उठकर शीर्ष शिखर पर हैं। 18 राज्यों में भाजपा की सरकार है।
केन्द्र में 1989 के बाद पहली कोई पूर्ण बहुमत की सरकार है। दोनों ही नेताओं की छवि पर बहुसंख्यक समाज के मर्म को छूने वाले राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का प्रकाश है। दोनों हर राजनीतिक दांव-पेंच में माहिर और कुशल वक्ता भी हैं। भाजपा के पास राजनीतिक दल के रूप में सबसे अधिक सदस्य हैं। धनबल, सत्ता के बल से पार्टी ओत-प्रोत है। इसके बरअक्स राहुल गांधी को कांग्रेस का आधार खड़ा करना है।
राज्यों में क्षत्रप तैयार करने हैं। पार्टी को युवा नेतृत्व और उसका भरोसा देना है। विपक्षी दलों की मान्यता हासिल करके संसद और सड़क पर उनकी धुरी बनकर राजनीतिक पहचान बनानी है। राहुल को यह चुनौती ऐसे समय में पूरी करनी है, जब पार्टी के पास जन नेताओं की संख्या इक्का-दुक्का ही है।
गुजरात की एक बानगी
संसद भवन परिसर में सुष्मिता ने बताया। गुजरात में कांग्रेस के पक्ष में हवा बनाना आसान नहीं था। सितंबर 2017 में इसके संकेत भी नहीं दिखाई दे रहे थे। अक्टूबर 2017 में कई बार के दौरे के दौरान कांग्रेस की युवा शक्ति ने इसका बीजरोपण शुरू किया।
सुष्मिता बताती हैं कि जनता भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से बुरी तरह नाराज थी, लेकिन खुलकर बोल नहीं रही थी। विरोध को सड़क पर लेकर आने के लिए कोई तैयार नहीं था। लेकिन जैसे ही राहुल गांधी ने खुलकर बोलना शुरू किया, सब कुछ बदलता चला गया। राहुल ने यहां जनता की नब्ज टटोली। राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया। हर जगह उन्होंने असली मुद्दे को उठाया।
स्थानीय और गुजरात के विकास के मुद्दे पर टिके रहे। यह सब राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व में हुआ। वह भाजपा के तमाम बड़े चेहरों के खिलाफ खड़े हुए और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का पैर का पसीना सिर पर चढ़ गया।
क्या कमाल कर पाएंगे राहुल?
यह लाख टके का सवाल है। सीधा-सपाट भाषण देने वाले राहुल गांधी क्या यह कमाल कर पाएंगे? पार्टी के सामने भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल की चुनौती के सामने क्या वह कांग्रेस को खड़ी कर पाएंगे? वह भी तब जब पूरे उत्तर भारत में पंजाब और दिल्ली को छोड़कर हर राज्य में भाजपा का शासन है।
हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आने हैं। लोकसभा में कांग्रेस के पास विपक्ष का दर्जा पाने लायक भी संख्या बल नहीं है और राज्यसभा में भाजपा की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में इस सवाल का जवाब आने वाला समय बेहतर देगा।
हालांकि एक बड़े टीवी पत्रकार का मानना है कि मोदी-शाह की छवि से लड़ने के लिए राहुल गांधी पर्याप्त नहीं हैं। संसद भवन परिसर में समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का भी मानना है कि मोदी और शाह की चुनौती काफी बड़ी है। अमर सिंह के अनुसार आने वाला समय मोदी-शाह की जोड़ी का है। भाजपा का है। कांग्रेस के साथ अस्तित्व बचाने की चुनौती बनी रहेगी। इसका सामना राहुल गांधी नहीं कर पाएंगे।
मुश्किल है राह
राहुल गांधी उस दौर में कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं, जब क्षेत्रीय दलों की ताकत काफी सिकुड़ चुकी है। लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव की राजनीति अपने वजूद को तलाश रही है। दक्षिण में जय ललिता जैसी नेता नहीं हैं और डीएमके प्रमुख अवसान की तरफ हैं।
वामदल भी अपना आधार खोते जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी का लोकसभा में पांच सांसदों का प्रतिनिधित्व है। उ.प्र. विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। बसपा की भी यही स्थिति है। लोकसभा में उसका प्रतिनिधित्व शून्य है, वहीं उ.प्र. विधानसभा चुनाव में पार्टी कोई असर नहीं दिखा सकी।
कहा जा सकता है कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा को भौतिकतावाद के समय में भाजपा के राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का सामना करना पड़ रहा है। विपक्षी एकता और उसकी तरफ जन आकर्षण काफी कमजोर दशा में है। कुल मिलाकर बहुत कठिन है डगर पनघट की।