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Manmohan Singh: दिल्ली की इस सीट से पहला चुनाव लड़े थे मनमोहन सिंह, हार के बाद लौटाए 7 लाख रुपए; पढ़ें किस्सा
Thu, 26 Dec 2024 11:23 PM IST
शुभम कुमार
डिजिटल ब्यूरो
डिजिटल ब्यूरो
Published by: शुभम कुमार
Updated Thu, 26 Dec 2024 11:23 PM IST
सार
पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने चुनाव लड़ने के लिए दक्षिणी दिल्ली की लोकसभा सीट चुनी थी। यहां पर मुस्लिम और सिखों को मिलाकर आबादी 50 प्रतिशत के करीब थी। ये सोचकर मनमोहन सिंह को लगा कि यही सीट सबसे मुफीद है, वे चुनाव जीत जाएंगे, लेकिन भाजपा ने मनमोहन सिंह के सामने दिल्ली के वरिष्ठ नेता वीके मल्होत्रा को उतारा था, जिससे उनकी राह में मुश्किलें आईं थीं।
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पूर्व पीएम मनमोहन सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का गुरुवार रात निधन हो गया है। पूर्व पीएम को तबीयत बिगड़ने के बाद देर शाम दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। 92 वर्षीय सिंह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। गुरुवार को उन्हें सांस लेने में तकलीफ और बेचैनी के बाद एम्स में भर्ती कराया गया था। मनमोहन सिंह 2 बार देश के प्रधानमंत्री रहे। वे लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे थे। इससे पहले भी उन्हें कई बार स्वास्थ्य कारणों से अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका था।
जब लिया चुनाव लड़ने का फैसला
मनमोहन सिंह करीब 33 साल राज्यसभा के सांसद रहे हैं। जब वे पीएम थे, तब भी राज्यसभा के ही सदस्य थे। आमतौर पर लोग प्रधानमंत्री रहते हुए लोकसभा से चुनकर आते है। लेकिन मनमोहन सिंह ने केवल एक ही बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था। आइए, जानते हैं उस चुनाव की पूरी कहानी। मनमोहन सिंह नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री थे। वित्त मंत्रालय को मनमोहन सिंह ने अच्छे से चलाया। बड़े-बड़े नेता उनकी तारीफों के पुल बांधते थे। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के रिश्ते तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पीएम नरसिम्हा राव से अच्छे थे। 1999 का लोकसभा चुनाव आ गया था। तब पूर्व पीएम मनमोहन को लगा कि बड़े नेता उनके पक्ष में हैं, उनका काम भी अच्छा रहा है। इसलिए यह चुनावी राजनीति में उतरने का सही वक्त है। उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने का मन बना लिया था।
चुनाव लड़ने के लिए चुनी थी दक्षिण दिल्ली की सीट
मनमोहन सिंह ने चुनाव लड़ने के लिए दक्षिणी दिल्ली की लोकसभा सीट चुनी। यहां पर मुस्लिम और सिखों को मिलाकर आबादी 50 प्रतिशत के करीब थी। ये सोचकर मनमोहन सिंह को लगा कि यही सीट सबसे मुफीद है, वे चुनाव जीत जाएंगे। भाजपा ने मनमोहन सिंह के सामने भाजपा के दिल्ली के वरिष्ठ नेता वीके मल्होत्रा को उतारा था। मनमोहन सिंह की तरह उनकी राष्ट्रव्यापी पहचान नहीं थी। मल्होत्रा ने जनसंघ से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। लेकिन मनमोहन सिंह चुनाव करीब 30 हजार वोटों से हार गए थे। इस दौरान बीजेपी के विजय मल्होत्रा को 261230 वोट मिले। जबकि मनमोहन को 231231 वोट मिले थे।मनमोहन के लिए ये चुनावी हार एक धक्के की तरह थी। उनको लगने लगा कि उनका चुनावी करियर शुरू होने के साथ ही खत्म हो गया। मगर ऐसा नहीं हुआ। मनमोहन अपनी राज्यसभा सीट पर बने रहे।
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चंदा नहीं लेना चाहते थे मनमोहन
उस दौरान पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस पार्टी से 20 लाख रुपये मिले थे। तब उनके पास कई फाइनैंसरों ने आने की कोशिश की, लेकिन वे दूर ही रहे। मनमोहन को लगा कि पैसे की क्या जरूरत है, पार्टी के कार्यकर्ता आराम से चुनाव जीतवा देंगे। चंदा लेना मनमोहन के उसूलों के खिलाफ था। तभी एक नेता ने आकर मनमोहन से कहा कि हम चुनाव हार रहे हैं। कार्यकर्ता साथ नहीं हैं, वे पैसे मांग रहे हैं। हमें चुनावी कार्यालय खोलना है, लोगों के खाने-पीने का इंतजाम करना है. बिना पैसे के ये सब नहीं हो सकता। मनमोहन सिंह ने थोड़ा गौर करने के बाद सालों से चली आ रही व्यवस्था को अपना लिया। उन्होंने चुनाव के लिए चंदा इकट्ठा किया। फाइनेंसरों से भी मिले। तब कहीं जाकर उनका चुनाव उठा। चुनाव होने के बाद मनमोहन ने पार्टी फंड से बचे 7 लाख रुपये वापस लौटा दिए।
कांग्रेस कमेटी की मीटिंग रद्द
इस बीच, कर्नाटक के बेलगावी में चल रही कांग्रेस वर्किंग कमेटी मीटिंग रद्द कर दी गई है। साथ ही 27 दिसंबर को होने वाले सभी प्रोग्राम भी कैंसिल कर दिए गए हैं। राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे बेलगावी से दिल्ली रवाना हो गए हैं। मनमोहन सिंह 3 अप्रैल को राज्यसभा से रिटायर हुए थे। वे 1991 में पहली बार असम से राज्यसभा पहुंचे थे। तब से करीब 33 साल तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे। छठी और आखिरी बार वे 2019 में राजस्थान से राज्यसभा सांसद बने थे। मनमोहन सिंह के रिटायरमेंट पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें खत भी लिखा था। अपनी चिट्ठी में खड़गे ने लिखा था कि- अब आप सक्रिय राजनीति में नहीं होंगे, लेकिन आपकी आवाज जनता के लिए लगातार उठती रहेगी। संसद को आपके ज्ञान और अनुभव की कमी खलेगी।
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जब लिया चुनाव लड़ने का फैसला
मनमोहन सिंह करीब 33 साल राज्यसभा के सांसद रहे हैं। जब वे पीएम थे, तब भी राज्यसभा के ही सदस्य थे। आमतौर पर लोग प्रधानमंत्री रहते हुए लोकसभा से चुनकर आते है। लेकिन मनमोहन सिंह ने केवल एक ही बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था। आइए, जानते हैं उस चुनाव की पूरी कहानी। मनमोहन सिंह नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री थे। वित्त मंत्रालय को मनमोहन सिंह ने अच्छे से चलाया। बड़े-बड़े नेता उनकी तारीफों के पुल बांधते थे। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के रिश्ते तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पीएम नरसिम्हा राव से अच्छे थे। 1999 का लोकसभा चुनाव आ गया था। तब पूर्व पीएम मनमोहन को लगा कि बड़े नेता उनके पक्ष में हैं, उनका काम भी अच्छा रहा है। इसलिए यह चुनावी राजनीति में उतरने का सही वक्त है। उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने का मन बना लिया था।
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चुनाव लड़ने के लिए चुनी थी दक्षिण दिल्ली की सीट
मनमोहन सिंह ने चुनाव लड़ने के लिए दक्षिणी दिल्ली की लोकसभा सीट चुनी। यहां पर मुस्लिम और सिखों को मिलाकर आबादी 50 प्रतिशत के करीब थी। ये सोचकर मनमोहन सिंह को लगा कि यही सीट सबसे मुफीद है, वे चुनाव जीत जाएंगे। भाजपा ने मनमोहन सिंह के सामने भाजपा के दिल्ली के वरिष्ठ नेता वीके मल्होत्रा को उतारा था। मनमोहन सिंह की तरह उनकी राष्ट्रव्यापी पहचान नहीं थी। मल्होत्रा ने जनसंघ से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। लेकिन मनमोहन सिंह चुनाव करीब 30 हजार वोटों से हार गए थे। इस दौरान बीजेपी के विजय मल्होत्रा को 261230 वोट मिले। जबकि मनमोहन को 231231 वोट मिले थे।मनमोहन के लिए ये चुनावी हार एक धक्के की तरह थी। उनको लगने लगा कि उनका चुनावी करियर शुरू होने के साथ ही खत्म हो गया। मगर ऐसा नहीं हुआ। मनमोहन अपनी राज्यसभा सीट पर बने रहे।
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चंदा नहीं लेना चाहते थे मनमोहन
उस दौरान पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस पार्टी से 20 लाख रुपये मिले थे। तब उनके पास कई फाइनैंसरों ने आने की कोशिश की, लेकिन वे दूर ही रहे। मनमोहन को लगा कि पैसे की क्या जरूरत है, पार्टी के कार्यकर्ता आराम से चुनाव जीतवा देंगे। चंदा लेना मनमोहन के उसूलों के खिलाफ था। तभी एक नेता ने आकर मनमोहन से कहा कि हम चुनाव हार रहे हैं। कार्यकर्ता साथ नहीं हैं, वे पैसे मांग रहे हैं। हमें चुनावी कार्यालय खोलना है, लोगों के खाने-पीने का इंतजाम करना है. बिना पैसे के ये सब नहीं हो सकता। मनमोहन सिंह ने थोड़ा गौर करने के बाद सालों से चली आ रही व्यवस्था को अपना लिया। उन्होंने चुनाव के लिए चंदा इकट्ठा किया। फाइनेंसरों से भी मिले। तब कहीं जाकर उनका चुनाव उठा। चुनाव होने के बाद मनमोहन ने पार्टी फंड से बचे 7 लाख रुपये वापस लौटा दिए।
कांग्रेस कमेटी की मीटिंग रद्द
इस बीच, कर्नाटक के बेलगावी में चल रही कांग्रेस वर्किंग कमेटी मीटिंग रद्द कर दी गई है। साथ ही 27 दिसंबर को होने वाले सभी प्रोग्राम भी कैंसिल कर दिए गए हैं। राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे बेलगावी से दिल्ली रवाना हो गए हैं। मनमोहन सिंह 3 अप्रैल को राज्यसभा से रिटायर हुए थे। वे 1991 में पहली बार असम से राज्यसभा पहुंचे थे। तब से करीब 33 साल तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे। छठी और आखिरी बार वे 2019 में राजस्थान से राज्यसभा सांसद बने थे। मनमोहन सिंह के रिटायरमेंट पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें खत भी लिखा था। अपनी चिट्ठी में खड़गे ने लिखा था कि- अब आप सक्रिय राजनीति में नहीं होंगे, लेकिन आपकी आवाज जनता के लिए लगातार उठती रहेगी। संसद को आपके ज्ञान और अनुभव की कमी खलेगी।