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Mamata's Visit To Mumbai: शिवसेना-एनसीपी नेताओं से ममता के मुलाकात के क्या मायने, टीएमसी के लिए कांग्रेस का विकल्प बनना कितना आसान?

Tue, 30 Nov 2021 04:27 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 30 Nov 2021 04:27 PM IST
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सार
संविधान में बदलाव करके पार्टी अपनी महत्वाकांक्षा को व्यवहारिक रूप देने की कोशिश कर रही है। नई कार्य समिति में हिंदी भाषी क्षेत्रों के नेताओं को भी शामिल किया जाएगा। हालांकि, 'वीटो पावर' ममता के पास ही रहेगा।
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mamata's visit to maharashtra what is the meaning of mamata's meeting with uddhav thackeray and ncp veteran sharad pawar, how easy it is for tmc to become an alternative to congress?
सोनिया गांधी और ममता बनर्जी - फोटो : एएनआई

विस्तार

कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच बन रही दूरियों ने विपक्षी एकता को तार-तार कर दिया है। दोनों पार्टियों के बीच जारी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। राष्ट्रीय स्तर पर पैठ बनाने की तृणमूल कांग्रेस की कोशिश कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी लगातार कांग्रेस की अनदेखी कर रही है। विपक्ष की बैठकें हों या कांग्रेस के नेतृत्व वाले दलों से दूरी, तृणमूल ने अपनी मंशा साफ कर दी है, कांग्रेस के हाथों में विपक्ष का नेतृत्व उन्हें स्वीकार्य नहीं है। इसलिए  संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार को घेरने के लिए रणनीति तय करने के मकसद से कांग्रेस ने विपक्षी दलों की जो बैठक बुलाई थी, टीएमसी ने उसमें हिस्सा नहीं लिया और न ही वो केंद्र सरकार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस समेत दूसरी पार्टियों के साथ शामिल हुई।


ममता लगातार दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं से मिल रही हैं और पासा फेंक रही हैं। वह हाल ही में दिल्ली में थी। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस नेताओं से दूरी बनाए रखी। 24 नवंबर को जब उनकी पीएम मोदी से मुलाकात हुई थी, उसके बाद जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या वे सोनिया गांधी से भी मुलाकात करेंगी, तो जवाब आया 'इस बार मैंने केवल प्रधानमंत्री से समय मांगा था। मैं जब भी दिल्ली आऊं तो सोनिया गांधी से मिलूं, जरूरी तो नहीं'। वैसे ममता और सोनिया के बीच मधुर संबंध रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में दोनों पक्षों के संबंधों में तनाव आ गया है। सोनिया और ममता की आखिरी मुलाकात जुलाई में हुई थी।

 

ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)
ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)
क्या है वजह
कांग्रेस दोनों दलों में बढ़ी दूरियों की वजह ममता की राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने और विपक्ष की नेता बनने की महत्वाकांक्षा है। साथ ही बड़ी संख्या में कांग्रेसी नेताओं का टीएमसी में जाना भी इस दूरी की वजह बनी है। दोनों पार्टियों के बीच बढ़ती दूरी पर भाजपा के उपाध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा 'अब सोनिया गांधी का समय पूरा हो चुका है और अब ममता विपक्ष को लीड करना चाहती हैं। ममता भी विपक्ष की नेता बनना चाहती हैं'। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस के लिए कांग्रेस का विकल्प बनना कितना आसान है?

ठाकरे-पवार से मिलेंगी ममता
ममता मंगलवार से तीन दिन के लिए मुंबई दौरे पर हैं। पहले उनका कार्यक्रम  राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और एनसीपी प्रमुख शरद पवार से मुलाकात का था। लेकिन शिवसेना का कहना है कि स्वास्थ्य कारणों से मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात नहीं कर पाएंगें। मंगलवार को उनका आदित्य ठाकरे से मिलने का कार्यक्रम है। वे शरद पवार से भी मिलेंगी। जाहिर है इन नेताओं से बातचीत में मुख्य मुद्दा यही होगा कि 2024 के नाव में भाजपा का मुकाबला कैसे किया जाए। 

ये बैठकें क्यों महत्वपूर्ण होने जा रही हैं?
शिवसेना और एनसीपी कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की सरकार चला रही है। जानकार बताते हैं कि ममता जब इन दोनों नेताओं से मिलेंगी तो संदेश साफ हो जाएगा कि टीएमसी कांग्रेस, लेफ्ट को छोड़कर विपक्षी दलों के लगातार संपर्क में है और कांग्रेस को किनारे किया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार गौतम लहरी मानते हैं इस तरह वे कांग्रेस के खिलाफ और अपने पक्ष में माहौल बना रही हैं ताकि उन्हें विपक्ष के नेता के तौर पर दूसरी विपक्षी ताकतों का साथ मिल जाए।  कहा जा रहा है कि ममता विपक्ष के नेता के तौर पर खुद को जिस तरह स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं, वे इन नेताओं से मुलाकात के दौरान अपने लिए समर्थन मांगेंगीं। अपनी यात्रा के दौरान वे कुछ उद्योगपतियों से भी मिलेंगीं।
 

मुकुल संगमा
मुकुल संगमा
कैसे बिगड़े टीएमसी-कांग्रेस के रिश्ते?
पिछले साल तक, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच संबंध बहुत सौहार्दपूर्ण नहीं थे, लेकिन ठीक-ठाक थे। लेकिन जैसे ही पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने भाजपा को हराया, तेजी से हालात बदलने लगे। कई राजनीतिक पंडितों ने कहा कि विपक्ष को ममता के रूप में मोदी से मुकाबला करने के लिए एक चेहरा मिल गया है। इस बीच कांग्रेस के कई बड़े नेता तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। जिसमें भारतीय महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सुष्मिता देव के और गोवा के पूर्व सीएम लुइजिन्हो फलेरियो शामिल हैं।

दोनों को टीएमसी ने पश्चिम बंगाल से राज्यसभा भेजा। कांग्रेस के कीर्ति आजाद और राहुल गांधी के करीबी रहे लेकिन दो साल पहले पार्टी छोड़ चुके अशोक तंवर भी हाल ही में टीएमसी में शामिल हुए हैं। पार्टी को ताजा झटका मेघालय से लगा है। मेघालय के पूर्व सीएम मुकुल संगमा समेत कांग्रेस के 12 विधायकों ने टीएमसी का दामन थाम लिया। 
 

गोवा में टीएमसी के नेता
गोवा में टीएमसी के नेता - फोटो : ANI
पार्टी संविधान बदलने की तैयारी 
टीएमसी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी को भाजपा के खिलाफ मुख्यी चेहरा बनाने और कई राज्यों में अपनी विस्तार की योजना पर तेजी से अमल शुरू कर दिया है। पार्टी का लक्ष्य आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी को 2024 के लिए विपक्ष के मुख्य चेहरे के रूप में पेश करना है। सूत्रों के मुताबिक इसके लिए पार्टी के संविधान में बदलाव करने की तैयारी हो रही है। पार्टी कार्य समिति के ढांचे में कुछ बदलाव किया जाएगा।

अभी कार्यसमिति में फिलहाल 21 सदस्य हैं। सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर विचार हो रहा है, क्योंकि पार्टी मेघालय, त्रिपुरा, गोवा और असम में अपना संगठन मजबूत कर रही है। पार्टी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओब्रायन ने मीडिया से कहा, ‘पार्टी का डीएनए नहीं बदलेगा, लेकिन पार्टी के संविधान में कुछ चीजें बदल जाएंगी। हमने इस पर चर्चा की है और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी इस पर अंतिम फैसला लेंगीं’।

हिंदी पट्टी के नेता भी होंगे शामिल
बताया जा रहा है कि नवगठित कार्य समिति में हिंदी भाषी क्षेत्रों के नेताओं को भी शामिल किया जाएगा जो पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों में एक है। चूंकि तृणमूल का लक्ष्य आने वाले दिनों में राष्ट्रव्यापी पार्टी बनना है, इसलिए कार्यसमिति में उन  राज्यों से भी अधिक सदस्यों को शामिल किया जाएगा जहां पार्टी अपना विस्तार कर रही है। इसी योजना के तहत पार्टी की अगली कार्यसमिति की बैठक दिल्ली में हो सकती है। 
 
 

सुब्रमण्यम स्वामी और ममता बनर्जी
सुब्रमण्यम स्वामी और ममता बनर्जी - फोटो : Twitter@ AITC
क्या कांग्रेस का विकल्प बनना आसान है?
इस कदम का स्वाभाविक रूप से कांग्रेस के साथ टकराव बढ़ेगा। एक राजनीतिक पर्यवेक्षका का कहना है कि कांग्रेस का विकल्प बनना टीएमसी के लिए बहुत आसान नहीं है। टीएमसी जिस तरह से चल रही है, उसे कांग्रेस को हटाकर ही आगे बढ़ना होगा। जबकि टीएमसी अभी बंगाल के अलावा ममता अन्य राज्यों में उतनी मजबूत नहीं हैं।

त्रिपुरा में हाल ही में हुए निकाय चुनावों में पार्टी को झटका लगा है। यहां की 334 सीटों में से भाजपा को 329 सीटें मिली हैं। जबकि अभी भी छत्तीसगढ़, राजस्थान और पंजाब में कांग्रेस की सरकार चल रही है। जब तक टीएमसी बंगाल में लोकसभा चुनाव में 35 से ज्यादा सीटें नहीं जीत लेतीं और कई राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर लेती राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का चेहरा बनने का उनका सपना पूरा होना मुश्किल है। यह नेतृत्व करने के लिए टीएमसी को कड़ी मेहनत करनी होगी।

ममता देश की इकलौती महिला मुख्यमंत्री हैं और कुछ राजनीतिक पंडित उनके लिए वैसे ही बाते कर रहे हैं जैसे 2007 में यूपी विधानसभा चुनाव जीतने पर मायावती के लिए कहा गया। 2007 में मायावती को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताया जा रहा था। हालांकि 2012 के बाद मायावती की सत्ता यूपी तक ही सिमट कर रह गई है और इस चुनाव में उनकी पार्टी लड़ाई से ही बाहर दिख रही है। 

 
 
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