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Bengal: 'व्हाट्सएप पर लगे रोक, हटाए जाएं माइक्रो ऑब्जर्वर', ममता सरकार ने की SIR प्रक्रिया में बदलाव की मांग

Mon, 09 Feb 2026 07:25 PM IST
अमन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमन तिवारी Updated Mon, 09 Feb 2026 07:25 PM IST
सार

ममता बनर्जी सरकार ने चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट सुधार प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार ने व्हाट्सएप निर्देशों और माइक्रो ऑब्जर्वर की भूमिका पर आपत्ति जताई है। मुख्यमंत्री खुद इस मामले की पैरवी कर रही हैं। वहीं, कुछ लोग मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का विरोध कर रहे हैं।

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Mamata Banerjee Supreme Court West Bengal government ECI SIR challenge Special Intensive Revision
ममता बनर्जी - फोटो : PTI

विस्तार

पश्चिम बंगाल सरकार ने सोमवार को कहा कि वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जारी प्रक्रिया में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी। तृणमूल सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया कई मतदाताओं को वंचित कर सकती है। सरकार ने यह भी कहा कि इसमें पारदर्शिता नहीं है और पश्चिम बंगाल को अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा निशाना बनाया गया है।

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सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा कि यह प्रक्रिया (एसआईआर) बड़े पैमाने पर मतदाता वंचित कर सकती है और इसमें पारदर्शिता की कमी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल को अनुचित रूप से निशाना बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच कई याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इस बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एनवी अंजारिया भी शामिल होंगे। इन याचिकाओं में मुख्यमंत्री खुद की याचिका भी शामिल है।
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क्या हैं ममता सरकार की मांग?

  • पश्चिम बंगाल सरकार चाहती है कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया को बदल दिया जाए।
  • ममता बनर्जी की सरकार का कहना है कि आधिकारिक बातचीत में व्हाट्सएप का इस्तेमाल बंद किया जाए। सभी निर्देश आधिकारिक लेटरहेड पर, सही मेमो नंबर और तारीख के साथ जारी किए जाएं। ये निर्देश चुनाव आयोग (ईसीआई) की वेबसाइट पर अपलोड किए जाएं ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो।
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  • मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार इसकी आलोचना करते हुए इसे 'व्हाट्सएप आयोग' करार दिया।
  • उन्होंने कहा कि अनौपचारिक डिजिटल निर्देश न तो कानूनी हैं और न ही पारदर्शी।


एक और अहम मांग सूक्ष्म पर्यवेक्षकों (माइक्रो ऑब्जर्वर्स) की भूमिका को लेकर है। राज्य सरकार की मांग है कि एसआईआर की प्रक्रिया से इन माइक्रो ऑब्जर्वर्स को पूरी तरह हटा दिया जाए। इसके बजाय समूह बी के 8,505 अधिकारियों की एक समिति बनाई जाए, जिन्हें सरकार ने नियुक्त किया है। इन अधिकारियों की जिला-वार सूची पहले ही चुनाव आयोग को भेज दी गई है। तृणमूल सरकार चाहती है कि माइक्रो ऑब्जर्वर्स की ओर से लिए गए विवादित फैसले रद्द किए जाएं। सरकार का कहना है कि अंतिम अधिकार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) या सहायक ईआरओ के पास होने चाहिए। अगर माइक्रो ऑब्जर्वर्स कोई आपत्ति उठाएं, तो इसे कानूनी अधिकारियों के पास अंतिम निर्णय के लिए भेजा जाए।



ये भी पढ़ें: SIR: बंगाल एसआईआर में बांग्लादेशी नागरिक की पहचान, चुनाव आयोग का दावा- आरोपी के पास दोनों देश का वोटर कार्ड


छोटे अंतर के कारण हटाए जा रहे नाम
राज्य सरकार ने कोर्ट से कहा है कि नाम में छोटे अंतर के कारण किसी मतदाता को हटाया न जाए। सरकार ने चेतावनी दी है कि छोटे मतभेदों का गलत इस्तेमाल हो रहा है और नोटिस जारी करके नाम हटाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल ने यह भी मांग की है कि उन सभी मामलों को तुरंत स्वीकार किया जाए, जिन्हें पहले स्थायी निवास प्रमाणपत्र जमा न करने के कारण खारिज किया गया था। सरकार ने कहा कि अब चुनाव आयोग ने ये दस्तावेज वैध मान लिए हैं। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल चाहती है कि घर आवंटन स्वीकृति पत्र को मुख्य दस्तावेज माना जाए। ममता बनर्जी ने बताया कि ऐसे दस्तावेज बिहार में समान प्रक्रिया में स्वीकार किए गए थे।

ममता बनर्जी का हो रहा विरोध
दूसरी तरफ, अखिल भारत हिंदू महासभा के पूर्व उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल ने एक याचिका दायर कर ममता बनर्जी के खुद कोर्ट में पेश होने का विरोध किया है। उन्होंने इसे संवैधानिक रूप से गलत बताया है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं होना चाहिए क्योंकि राज्य के वकील पहले से वहां मौजूद हैं। चार फरवरी को ममता बनर्जी इस मामले में बहस करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बनी थीं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ईसीआई और राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी को नोटिस जारी कर नौ फरवरी तक जवाब मांगा।

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