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ग्राउंड रिपोर्ट मेरठ: कम उम्र में शादी...मां और बच्चे की जिंदगी पर आफत

Mon, 28 Dec 2020 06:56 AM IST
देव कश्यप अरिश रिजवी, मेरठ
अरिश रिजवी, मेरठ Published by: देव कश्यप Updated Mon, 28 Dec 2020 06:56 AM IST
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Malnutrition has become major problem in Meerut, Uttar Pradesh complete ground report in Hindi
घर के आंगन में अपने आठ बच्चों के साथ चारपाई पर बैठी नाजरीन - फोटो : अमर उजाला

पोषण क्या होता है, इन्हें नहीं पता। इनके लिए भूख बड़ी है। अशिक्षा है और जागरूकता की कमी है। कम उम्र में शादी और फिर लगातार बच्चे। न मां पोषित न बच्चे। कुपोषण को ऊपरी हवा समझने लगते हैं। एनआरसी इनके लिए दूर और काल कोठरी है। गर्भवती की फिक्र नहीं तो बच्चा कैसे स्वस्थ होगा। यह हाल है उन परिवारों का जिनके बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।


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पोषण क्या होता है, इन्हें नहीं पता। इनके लिए भूख बड़ी है। अशिक्षा है और जागरूकता की कमी है। कम उम्र में शादी और फिर लगातार बच्चे। न मां पोषित न बच्चे। कुपोषण को ऊपरी हवा समझने लगते हैं। एनआरसी इनके लिए दूर और काल कोठरी है। गर्भवती की फिक्र नहीं तो बच्चा कैसे स्वस्थ होगा। यह हाल है उन परिवारों का जिनके बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

वहीं, सरकार का खाद्यान्न (पहले पोषाहार) ऊंट के मुहं में जीरा है। वह भी वक्त पर आता नहीं, कइयों तक पहुंचता भी नहीं। जिला अस्पताल का पोषण पुनर्वास केंद्र तो बस जैसे तैसे चल रहा है।


घर के आंगन में अपने आठ बच्चों के साथ चारपाई पर बैठी नाजरीन महज 32 साल की है। कहती है, मैं 14 साल की थी, जब मेरी शादी हुई। सातवें नंबर का तीन साल का चाहत लाल बच्चा (अति कुपोषित) है। इससे छोटा डेढ़ साल का मेरी गोद में है। जो पोषाहार मिलता है, वह तो बस दो दिन चलता है।

पावली खुर्द की नाजरीन की ही तरह हिना का हाल है। 18 माह की बेटी हिदा को लेकर मकबरा डिग्गी से एनआरसी आई है। बताती है, मैं 20 साल की हूं। यह तीसरा बच्चा है। शादी कम उम्र में हो गई थी। बच्ची को कुछ खाया पिया लग नहीं रह था तो चिकित्सक को दिखाया। पता चला कुपोषण का शिकार है। आंगनबाड़ी नहीं आती है। न ही अनाज, दाल और चावल आता है।

जेवरी गांव की शशि का दूसरा बेटा मानव अतिकुपोषित है। सवा चार साल का है, मगर दिखता दो साल जैसा है। उसके दाहिने हाथ की चार उंगलियां आपस मे जुड़ी हुई हैं। शशि कहती है, जब हुआ था तबसे ही ऐसा है। डॉक्टर को दिखाया था, उंगलियों का ऑपरेशन बताया है। इसे कुछ खाया पिया लगता नहीं हैं। गेहूं और चावल तो इस बार आए थे, मगर दाल नहीं मिली।

गांव बहचौला में सात माह के अतिकुपोषित सनी की मां मंजू घर के पास ही आंगनबाड़ी केंद्र पर धूप सेंक रही है। गोद में सनी है। मंजू कहती है, पहला बच्चा है। मुझ पर और सनी पर ऊपरी हवा है। डेड़ माह भभूत उतरवाई, पर पूरी तरह से हवा उतरी नहीं। पास बैठी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कविता बताती है, मंजू को दूध नहीं उतरता था, बेटे को मिला नहीं तो कमजोर रह गया। एनआरसी भी ले गए, मगर दूर होने के कारण इसने भर्ती नहीं किया।

इंचौली में तीन अति कुपोषित बच्चे थे। 20 माह की सारा, दो साल का हिमांशु और 31 माह की सिदरा। सारा की मां सबीहा को पता ही नहीं कि बेटी अति कुपोषित है। कहती है, पेट खराब रहता है इसका। दूध में गुड़ दे देती हूं तो ठीक हो जाती है। एनआरसी भी ले गए थे, दूर है, इसलिए नहीं रखा वहां।

सिदरा की मां फातिमा घर के बाहर नहीं आई, अपने जेठ के लड़के की गोद में उसे बाहर भेजा। यहां की आंगनबाड़ी सबा परवीन ने बताया कि जब ये हुई तो बीमार थी। इसकी मां को टीबी हो गई थी। अपना दूध नहीं पिला सकी। हिमांशु की मां बबीता भी  घर के बाहर नही आई, बड़ी बेटी के साथ उसे भेजा। देखने में ही काफी कमजोर लग रहा था, गुमसुम था। हालांकि उसकी बड़ी बहन राधा का कहना था कि कमजोर है, पर तबीयत पहले से ठीक है।

आंगनबाड़ी केंद्रों तक घी और दूध पाउडर नहीं पहुंचा

जेवरी गांव की शशि का दूसरा बेटा मानव अतिकुपोषि है, उसके दाहिने हाथ की चार उंगलियां आपस मे जुड़ी हुई हैं।
जेवरी गांव की शशि का दूसरा बेटा मानव अतिकुपोषि है, उसके दाहिने हाथ की चार उंगलियां आपस मे जुड़ी हुई हैं। - फोटो : अमर उजाला
घी 410 ग्राम और 450 ग्राम दूध पाउडर भी देने की बात है, लेकिन यह अभी किसी को मिला नहीं। दरअसल, सरकार पहले वाला पोषाहार बंद कर चुकी है, जिसमें मीठा और नमक का दलिया दिया जाता था। क्षेत्रीय भाषा में लोग इसे कसार कहते थे। उसके स्थान पर अब गर्भवती और दूध पिलाने वाली माता को दो किलो गेहूं, एक किलो चावल और 750 ग्राम चने की दाल दी जाती है।

दूध और घी भी दिया जाना है। डीपीओ विनीत कुमार का कहना है कि घी और दूध जल्द मिलेगा। अभी ऊपर से ही नहीं आया है।


कोरोना काल में चार माह से तनख्वाह नहीं, दूसरे से मोबाइल लेकर भेजते हैं सूचना
कोरोना काल में आंगनबाड़ियों की चार माह से तनख्वाह नहीं मिली है। 5,500 रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। ऑनलाइन मॉनिटरिंग होती है, लेकिन  अधिकांश के पास एंड्रॉयड मोबाइल भी नहीं है। बहचौला की आंगनबाड़ी महेन्द्री बताती है, मेरे पास तो बटन वाला फोन है जब सूचना भेजनी होती है तो किसी से गांव में ले लेती हूं।

पावली खुर्द की आंगनबाड़ी सरिता बताती है कि जो खाद्यान्न दिया जा रहा है, वह बेहद कम है। यह तो छोटे परिवार में एक हफ्ते चलता है और अगर परिवार बड़ा हो तो दो से तीन दिन में ही खत्म हो जाता है।

मेरठ एक नजर में

पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती तीन बच्चे
पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती तीन बच्चे - फोटो : अमर उजाला
- शून्य से पांच साल के कुल बच्चे- 18,5,885
- कुपोषित- 4,045
- अतिकुपोषित- 811

आधे बेडों पर चादर तक नहीं, खाली पड़ा रहता है पोषण पुनर्वास केंद्र
पोषण पुनर्वास केंद्र में लगे पोस्टरों पर तो बच्चों के लिए जंगल बुक और कॉमिक्स के सारे चरित्र हैं, मगर सिर्फ तीन बच्चे भर्ती हैं, जो अपनी माताओं के साथ बाहर धूप सेंक रहे हैं। आधे बेडों पर चादर ही नहीं है। लगता है जिन पर चादर है, उन्हें भी बदले हुए कई दिन हो गए हैं। चंद खिलौने हैं, जो बेरतीब पड़े हैं।


एनआरसी की स्टाफ नर्स डोली बताती है कि आंगनबाड़ी के जरिए कुपोषित बच्चे एनआरसी नहीं आते हैं। इक्का-दुक्का ही कभी आता है। ओपीडी नहीं चली तो बच्चे भी नहीं पहुंचे। यहां जो भी बच्चे आते हैं वह जिला अस्पताल में ओपीडी के जरिए ही आते हैं। यही वजह है कि बच्चों की संख्या काफी कम है।

कोरोना काल में अप्रैल से लेकर दिसंबर तक महज 26 बच्चे आए हैं पूरे साल में सिर्फ 50 बच्चे। इनमें भी ज्यादातर 14 दिन का समय पूरा नहीं कर पाते हैं और बीच में ही चले जाते हैं। कई बार तो बताते भी नहीं। हालांकि इन्हें 50 रुपये रोजाना मिलते हैं और फॉलोअप करने पर 100 रुपये। फिर भी एक जगह बंदिश सी लगती है इन्हें, रहना नहीं चाहते। 10 बेड हैं मगर कभी भरे नहीं।

कुपोषण की वजह और सरकारी तंत्र की कमियां

कुपोषित बच्चे के साथ उसकी मां
कुपोषित बच्चे के साथ उसकी मां - फोटो : अमर उजाला
- जागरूकता की कमी
- बच्चों में अंतर कम होना
- कम उम्र में शादी
- समय पर अनाज या पोषाहार न पहुंचना
- पोषाहार बेहद कम होना
- गर्भवती की फिक्र कम करना

ये हैं जरूरतें:-
- एनआरसी केंद्र हर सीएचसी पर खुलवाए जाएं
- पोषाहार पर्याप्त मात्रा में हो और समय पर पहुंचे
- जागरूकता के लिए और प्रयास किए जाएं, शिविर लगाए जाएं, घर-घर जाकर पोषण की सही परिभाषा समझाई जाए।
- आंगनबाड़ी कार्यकत्री को समय से वेतन मिले, ताकि ज्यादा जिम्मेदारी से काम करें।
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