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इतिहास रचने वाली मेजर दीक्षा: पहली महिला अधिकारी को मिला बलिदान बैज, दो बार असफलता के बाद हासिल की कामयाबी

Mon, 19 Oct 2026 10:55 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 19 Oct 2026 10:55 PM IST
सार

मेजर दीक्षा सी. मुदादेवनावर भारतीय सेना का प्रतिष्ठित बलिदान बैज हासिल करने वाली पहली महिला अधिकारी बनी हैं। आर्मी मेडिकल कोर में डॉक्टर दीक्षा को चयन प्रक्रिया में दो बार असफलता और चोटों का सामना करना पड़ा, लेकिन दिसंबर 2022 में तीसरी कोशिश में उन्होंने सफलता हासिल की। उन्होंने तुर्किये में ऑपरेशन दोस्त के दौरान भी चिकित्सा सेवाएं दीं। आखिर कैसे उन्होंने कठिन प्रशिक्षण और चुनौतियों को पार कर यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Major Deeksha Makes History: First Woman Officer to Earn Balidaan Badge After Overcoming Two Rejections
पहली महिला अधिकारी को मिला बलिदान बैज - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारतीय सेना की मेजर दीक्षा सी. मुदादेवनावर ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। दिए गए इनपुट के मुताबिक, वह भारतीय सेना का प्रतिष्ठित ‘बलिदान बैज’ हासिल करने वाली पहली महिला अधिकारी बनी हैं। सेना की आर्मी मेडिकल कोर में डॉक्टर के रूप में सेवा देने वाली दीक्षा ने कठिन चयन प्रक्रिया और शारीरिक चुनौतियों का सामना करते हुए यह मुकाम हासिल किया। उनकी उपलब्धि को सेना में महिलाओं की बढ़ती भूमिका और कठिन सैन्य प्रशिक्षण में उनकी भागीदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया है।

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बलिदान बैज इतना खास क्यों माना जाता है?
बलिदान बैज पैराशूट रेजिमेंट की स्पेशल फोर्सेज से जुड़ा प्रतिष्ठित प्रतीक है। इसमें नीचे की ओर नोक वाली चांदी की कमांडो कटार, उसके दोनों ओर ऊपर की तरफ मुड़े पंख और देवनागरी में ‘बलिदान’ शब्द अंकित होता है। यह बैज कठिन प्रशिक्षण पूरा करने और विशेष सैन्य जिम्मेदारियों के लिए योग्य साबित होने वाले जवानों से जुड़ा है। इसे हासिल करने के लिए शारीरिक क्षमता, मानसिक मजबूती और कठिन परिस्थितियों में काम करने की योग्यता की परीक्षा से गुजरना पड़ता है। मेजर दीक्षा की उपलब्धि इसलिए अहम है, क्योंकि वह इस बैज को हासिल करने वाली पहली महिला अधिकारी बताई गई हैं।
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दो बार असफल होने के बाद मेजर दीक्षा ने कामयाबी कैसे हासिल की?
मेजर दीक्षा ने आर्मी मेडिकल कोर में कमीशन मिलने के बाद लेह के तांगत्से स्थित 303 फील्ड अस्पताल में सेवा दी। यहां उन्हें हिमालयी क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों और शून्य से नीचे के तापमान में काम करने का अनुभव मिला। इसके बाद उन्होंने पैराशूट रेजिमेंट से जुड़ने का लक्ष्य रखा। शुरुआती चयन प्रक्रिया में उन्हें दो बार असफलता मिली। इस दौरान उन्हें शारीरिक चोटें भी आईं। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और कई महीनों तक इलाज, शारीरिक क्षमता दोबारा हासिल करने और मानसिक तैयारी पर काम किया। वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन में उन्होंने तीसरी कोशिश की। दिसंबर 2022 में उन्होंने कठिन चयन प्रक्रिया पूरी की और उन्हें रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर के रूप में जोड़ा गया।
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स्पेशल फोर्सेज में डॉक्टर की जिम्मेदारी कितनी चुनौतीपूर्ण होती है?
स्पेशल फोर्सेज में रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर का काम केवल अस्पताल या क्लिनिक तक सीमित नहीं होता। ऐसे अधिकारियों को सैनिकों के साथ कठिन अभियानों में शामिल होने, विमान से पैराशूट के जरिए उतरने और दुर्गम इलाकों में घायल जवानों को तत्काल चिकित्सा सहायता देने के लिए तैयार रहना पड़ता है। मेजर दीक्षा ने आगरा स्थित पैराट्रूपर्स ट्रेनिंग स्कूल में अनिवार्य बेसिक पैराट्रूपर कोर्स पूरा किया और पैराशूट से उतरने के लिए जरूरी विंग हासिल किए। उनके प्रशिक्षण में युद्ध के दौरान घायल सैनिकों का इलाज, कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की तैयारी, लंबी दूरी तक चलना और सीमित संसाधनों में आपात चिकित्सा देना शामिल रहा।

तुर्किये में ऑपरेशन दोस्त के दौरान मेजर दीक्षा ने क्या किया?
फरवरी 2023 में मेजर दीक्षा ने तुर्किये में चलाए गए ऑपरेशन दोस्त के तहत चिकित्सा सहायता दी। भूकंप से प्रभावित तुर्किये में भारतीय सेना के 60 पैरा फील्ड अस्पताल की टीम तैनात की गई थी। मेजर दीक्षा ने हटाय क्षेत्र में राहत और चिकित्सा कार्यों में हिस्सा लिया। वहां इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा था और भूकंप के बाद भी झटके महसूस किए जा रहे थे। ऐसे मुश्किल हालात में उन्होंने आपात चिकित्सा सेवाएं दीं। इस अनुभव ने कठिन परिस्थितियों में उनकी चिकित्सा और परिचालन क्षमता को दिखाया। उनका काम यह भी बताता है कि सैन्य डॉक्टरों को जरूरत पड़ने पर सामान्य अस्पतालों से बाहर, आपदा और जोखिम वाले क्षेत्रों में भी काम करना पड़ता है।


मेजर दीक्षा की उपलब्धि सेना में महिलाओं के लिए क्यों अहम है?
मेजर दीक्षा को बाद में राष्ट्रीय समारोहों की परेड के दौरान अपने सैन्य पदकों और बलिदान बैज के साथ देखा गया। दिए गए इनपुट के अनुसार, उनकी उपलब्धि विशेष बलों से जुड़ी सेवा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन, लड़ाकू विमान उड़ाने और युद्धपोतों पर तैनाती जैसे अवसर बढ़े हैं। मेजर दीक्षा की यात्रा इस बात की मिसाल है कि कठिन प्रशिक्षण और लगातार प्रयास के जरिए बड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। दो बार असफल होने और चोटों से उबरने के बाद उन्होंने तीसरी कोशिश में सफलता हासिल की। उनकी कहानी उन महिला अधिकारियों के लिए प्रेरणा बन सकती है, जो सेना में कठिन परिचालन जिम्मेदारियां निभाने का लक्ष्य रखती हैं।

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