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रुपहले पर्दे से जन-जन तक पहुंचा उपेक्षितों के लिए महाश्वेता का दर्द

Fri, 29 Jul 2016 02:06 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, कोलकाता
ब्यूरो/ अमर उजाला, कोलकाता Updated Fri, 29 Jul 2016 02:06 AM IST
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Mahashweta Devi's feelings for neglected people of society shown through cinema
महाश्वेता देवी - फोटो : Getty

आदिवासियों, उपेक्षितों और दबे-कुचलों की आवाज बन चुकीं विख्यात लेखिका महाश्वेता देवी को ममता बनर्जी का करीबी माना जाता था।  सिंगुर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन के दौरान जिन बुद्धिजीवियों ने खुलकर ममता का समर्थन किया था, उनमें महाश्वेता देवी का नाम सबसे ऊपर था। उन्होंने आदिवासियों और उपेक्षित ग्रामीणों को समूहों में संगठित किया ताकि वे लोग अपने-अपने क्षेत्रों में विकास कार्यों का लाभ उठा सकें। उनकी ऐसी ही कई रचनाओं पर मशहूर फिल्म निर्माताओं ने फिल्में बनाईं, तभी जन-जन तक पहुंच पाई थी उपेक्षितों के लिए महाश्वेता की व्यथा। 

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गोविंद निहलानी ने 1998 में हिंदी फिल्म ‘हजार चौरासी की मां’ के नाम से ही फिल्म बनाई जिसमें नक्सली आंदोलन से जुड़े एक बेटे की मां के भावनात्मक संघर्षों की कहानी थी। सन 1993 में कल्पना लाजिमी ने उनकी पुस्तक ‘रूदाली’ के नाम से ही फिल्म बनाई जिसमें राजस्थान की उच्च जाति में पुरुषों की मौत पर किराये पर शोक मनाने और क्रंदन करने आने वालीं महिलाओं की कहानी थी। उनकी लघुकथा ‘चोली के पीछे’ पर इतालवी निर्देशक इतालो स्पिनेली ने भी बहुभाषी फिल्म ‘गैंगोर’ बनाई जिसमें महिलाओं के अधिकार का मुद्दा उठाया गया था।
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उनकी प्रमुख कृतियों में हजार चौरासी की मां, अरण्य अधिकार के अलावा ब्रेस्ट स्टोरीज, झांसीर रानी, अग्निगर्भ, सिद्धू कान्हुर डाके, बिश-एकुश, सुहाग बसंत और तीन कौड़ीर साध शामिल हैं। वे आजीवन आदिवासियों के हित में काम करती रहीं। उनका न सिर्फ आदिवासी समाज से लगाव रहा बल्कि वह  शासन के समक्ष उनकी सबसे बड़ी पैरोकार भी रहीं। ममता बनर्जी भी मानती हैं कि दीदी ने सिंगूर और नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उनके आंदोलन में बड़ा साथ दिया था।

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Mahashweta Devi's feelings for neglected people of society shown through cinema
महाश्वेता देवी - फोटो : Getty

राज्यपाल के. एन. त्रिपाठी ने उनके निधन पर गहरा शोक जताते हुए कहा कि उन्हें बंगाल की आदिवासी जातियों लोधा एवं शबार, महिलाओं और दलितों के उत्थान के लिए लेखन और अध्ययन कार्य करती रहीं। महाश्वेता देवी का जन्म वर्ष 1926 में ढाका (अब बांग्लादेश की राजधानी) में हुआ था। मां धारित्रि देवी और पिता मनीष घटक दोनों लेखक थे। इसलिए लेखन उनको विरासत में मिला था। देश के विभाजन के बाद वह भारत आ गईं। यहां उन्होंने विश्व भारती विश्वविद्यालय से बीए (आनर्स) की डिग्री हासिल की और कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमए की।

जाने-माने बांग्ला फिल्म निदेशक ऋत्तिक घटक महाश्वेता के भाई थे। वर्ष 1979 में उनको साहित्य अकादमी अवार्ड मिला था। उसके बाद वर्ष 1986 में पद्मश्री मिला और 1997 में ज्ञानपीठ। उन्होंने सौ से भी ज्यादा उपन्यास लिखे। उनकी लघु कहानियों के 20 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक साहित्यकार के तौर पर देश-विदेश में उनकी अलग पहचान थी। महाश्वेता देवी साहित्य में अपनी कामयाबी का श्रेय हमेशा आम लोगों को देती रहीं। उनका कहना था कि आम लोगों से ही उनको अपनी कहानियां लिखने की प्रेरणा मिलती है।

एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर उन्होंने अपना जीवन आदिवासियों के विकास के प्रति समर्पित कर दिया था। शबर जनजाति के हित में किए गए कार्यों की वजह से ही उनको शबरों की मां कहा जाता था। वह विभिन्न आदिवासी संगठनों से जुड़ी थीं। इसके अलावा बार्तिके नामक एक आदिवासी पत्रिका का संपादन भी करती थीं।

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