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Maharashtra: 'नबाम रेबिया फैसले को तत्काल बड़ी पीठ के पास भेजने की जरूरत नहीं', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Fri, 17 Feb 2023 11:11 AM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Fri, 17 Feb 2023 11:11 AM IST
सार

कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा पीठ ही मेरिट के आधार पर इस मामले में सुनवाई करेगी। पीठ ने कहा कि क्या नबाम रेबिया फैसले को सात जजों की पीठ को भेजा जाना है या नहीं, यह सुनवाई के बाद तय किया जाएगा। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

महाराष्ट्र विधानसभा से जुड़े मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने 2016 के नबाम रेबिया फैसले को सात जजों की संविधान पीठ के पास तत्काल भेजने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नबाम रेबिया के फैसले को सात-न्यायाधीशों की बेंच को भेजा जाना चाहिए या नहीं, यह केवल महाराष्ट्र राजनीति मामले की सुनवाई के साथ ही तय किया जा सकता है। कोर्ट 21 फरवरी को महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के मामलों पर अगली सुनवाई करेगी।
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इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पिछले साल जून में शिवसेना के दोफाड़ होने की वजह से महाराष्ट्र में उत्पन्न राजनीतिक संकट से जुड़े मामले के संदर्भ में 2016 में नबाम रेबिया फैसले को बड़ी पीठ को पुनर्विचार करने के लिए भेजने को लेकर फैसला सुरक्षित रख लिया था। नबाम राबिया के फैसले ने अयोग्यता याचिकाओं को तय करने के लिए स्पीकर की शक्ति को प्रतिबंधित कर दिया था, क्योंकि उनके निष्कासन की मांग वाला प्रस्ताव पहले से ही लंबित था।
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सीजेआई ने क्या कहा था?
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एमआर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की संविधान पीठ ने इस पहलू पर अपना फैसला सुरक्षित रखने से पहले नबाम रेबिया पर पुनर्विचार की आवश्यकता है या नहीं, इस पर दलीलें सुनी थीं। सुनवाई के दौरान सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा था कि विचार किए जाने वाले पहलुओं में से एक यह है कि क्या नबाम रेबिया का फैसला इस मामले में लागू होता है या नहीं? पीठ ने कहा था कि 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) को राजनीतिक प्रतिष्ठानों ने आत्मसात कर लिया है। यह शतरंज की बिसात की तरह है, हर कोई जानता है कि अगला कदम क्या होगा।
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पक्ष-विपक्ष के तर्क
कुछ भाजपा विधायकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी और मनिंदर सिंह ने तर्क दिया था कि नबाम रेबिया के फैसले की सत्यता पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वहीं, महा विकास अघाड़ी का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से आग्रह किया था कि संविधान की 10वीं अनुसूची की इस तरह से व्याख्या की जाए कि सरकारों को गिराने के लिए इसका दुरुपयोग न किया जा सके। 

सिब्बल ने कहा था, 'यह आज के बारे में नहीं है बल्कि यह कल के बारे में भी है। ये मुद्दे बार-बार उठेंगे और सरकारें गिरा दी जाएंगी। एक निर्वाचित सरकार को तब तक जारी रहना चाहिए, जब तक कि अयोग्यता याचिकाओं का फैसला नहीं किया जाता। यदि अयोग्य ठहराया जाता है तो यह अदालत रक्षा कर सकती है। कृपया 10वीं अनुसूची को सरकारों को गिराने की अनुमति न दें। यह बहुत गंभीर है।' 


महा विकास अघाड़ी की ओर से पेश हुए दूसरे वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि न्यायालय को नबाम रेबिया के मामले को वर्तमान मामले से अलग नहीं करना चाहिए। यह किसी भी समस्या का हल नहीं, बल्कि भविष्य की मुकदमेबाजी उत्पन्न करेगा।
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