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महाराष्ट्र: 'नाबालिग से दुष्कर्म और हत्या समाज की आत्मा पर हमला', नासिक कोर्ट ने दोषी को सुनाई मौत की सजा

Mon, 19 Oct 2026 09:42 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 19 Oct 2026 09:42 PM IST
सार

महाराष्ट्र के नासिक में चार साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में अदालत ने विजय संजय खैरनार को मौत की सजा सुनाई है। अदालत ने अपराध को दुर्लभतम से दुर्लभ बताते हुए कहा कि ऐसी क्रूरता में नरमी न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर कर सकती है। डीएनए सबूत और 24 गवाह अभियोजन के मामले का हिस्सा रहे। आखिर अदालत ने उम्रकैद को अपर्याप्त क्यों माना? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Maharashtra Nashik Court Sentences Convict to Death in Child crime Murder Case Calls Crime Attack Conscience
24 गवाह और डीएनए सबूत बने अहम कड़ी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

महाराष्ट्र के नासिक की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने चार साल की बच्ची से दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले में दोषी विजय संजय खैरनार को मौत की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि बच्ची से दुष्कर्म उसकी गरिमा को अंधेरे में दफन करने जैसा है। इस जघन्य अपराध में नरमी बरतने से लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो सकता है। अदालत ने इस मामले को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी का अपराध माना।

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अदालत ने दोषी को मौत की सजा क्यों सुनाई?
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश केजी पलदेवार ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि अपराध की क्रूरता और बच्ची के शव को जिस बेरहमी से फेंका गया, उसने समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर दिया। अदालत के मुताबिक, दोषी को उम्रकैद देना इस अपराध के लिए पर्याप्त नहीं होगा। न्यायाधीश ने कहा कि दोषी भले ही आदतन अपराधी न हो, लेकिन इस मामले में उसकी क्रूरता इतनी गंभीर थी कि उसके प्रति किसी भी तरह की सहानुभूति उचित नहीं होगी। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे अपराधों में नरमी दिखाने से आपराधिक न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
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चार साल की बच्ची के साथ क्या हुआ था?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 16 नवंबर 2025 को बच्ची अपने घर के बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेल रही थी। इसी दौरान वेल्डिंग और फर्नीचर का काम करने वाले विजय संजय खैरनार ने उसे चॉकलेट का लालच देकर अपने साथ ले गया। आरोप के मुताबिक, उसने बच्ची से दुष्कर्म किया, उसके सिर पर वार किया और पतले धागे से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद बच्ची का आधा नग्न शव घर के पास मोबाइल टावर के एक बंद परिसर में फेंक दिया। यह घटना नासिक जिले के मालेगांव तालुका के एक गांव में हुई थी। अदालत ने माना कि हत्या अचानक गुस्से या झगड़े में नहीं हुई, बल्कि अपराध के सबूत मिटाने और बच्ची को चुप कराने के लिए की गई।

अदालत ने अपराध को इतना गंभीर क्यों माना?
अदालत ने कहा कि बच्ची की हत्या का मकसद पहले किए गए अपराध के सबूत मिटाना था। न्यायाधीश के अनुसार, किसी बच्चे की जान को सबूत मिटाने की बाधा समझकर उसकी हत्या करना बेहद गंभीर अपराध है। अदालत ने दोषी के कृत्य को बर्बर और अमानवीय बताया। उसने कहा कि अपराध की प्रकृति और उसे अंजाम देने का तरीका इसकी असाधारण गंभीरता दिखाता है। अदालत ने यह भी माना कि दोषी के व्यवहार से सुधार की संभावना पर गंभीर सवाल उठते हैं और उम्रकैद इस अपराध के लिए पर्याप्त सजा नहीं होगी।


दोषी के खिलाफ कौन से सबूत पेश किए गए?
अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष सरकारी वकील उज्ज्वल निकम और एसके सोनावणे ने पैरवी की। मामले में कुल 24 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। अभियोजन ने डीएनए जांच और फॉरेंसिक सबूत भी पेश किए। इन जांचों में बच्ची से जुड़े जैविक नमूनों का मिलान खैरनार के घर से बरामद खून से सने कपड़ों के साथ किया गया। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता की अपहरण, दुष्कर्म, दुष्कर्म के कारण मौत, हत्या और सबूत मिटाने से संबंधित धाराओं के साथ पॉक्सो कानून की धाराओं के तहत दोषी ठहराया।

बच्ची के माता-पिता को कितना मुआवजा मिलेगा?
अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की संशोधित मनोधैर्य योजना के तहत बच्ची के माता-पिता को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत का कहना था कि इस तरह के अपराध में दोषी के प्रति नरमी बरतना उचित नहीं होगा। मामले में मौत की सजा सुनाते हुए अदालत ने अपराध की क्रूरता, बच्ची की हत्या के पीछे सबूत मिटाने के उद्देश्य और समाज पर पड़ने वाले असर को अहम माना।

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