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Maharashtra Aarey Project: आरे प्रोजेक्ट का विरोध क्यों कर रहे पर्यावरणवादी, पेड़ों के कटने से कैसे बढ़ेगा पर्यावरण का संकट

Sun, 03 Jul 2022 07:56 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Sun, 03 Jul 2022 07:56 PM IST
सार

सबसे ज्यादा वनाच्छादित क्षेत्र के मामले में प्रमुख रहने वाले महाराष्ट्र के लिए इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट के  तथ्य बहुत चिंताजनक हैं। 2017 की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि महाराष्ट्र में वनाच्छादित भूमि का तेजी से क्षरण हो रहा है। कुछ वर्षों में ही अकेले पुणे शहर में 32 वर्ग किलोमीटर और जलगांव में 21 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कम हो गया है। यदि इसी गति से वन क्षेत्र में कमी होती रही, तो महाराष्ट्र में बाढ़ और सूखे की आशंका बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी।

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Maharashtra Aarey Metro Shed Project Why are environmentalists opposing how the environmental crisis will increase due to the cutting of trees
आरे कार शेड प्रोजेक्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महाराष्ट्र में नई सरकार के आने के साथ ही आरे प्रोजेक्ट को दुबारा आगे बढ़ाने का निर्णय कर लिया गया है। फड़णवीस सरकार में इस प्रोजेक्ट को शुरू किया था जिसका सत्ता में भागीदार रही शिवसेना तब भी विरोध कर रही थी। पिछले चुनाव के बाद सत्ता में आने के बाद उद्धव ठाकरे सरकार ने इस पर पूरी तरह रोक लगा दी। इस प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने के बाद पर्यावरणवादियों की चिंताएं बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि इससे मुंबई सहित महाराष्ट्र में वनाच्छादित क्षेत्र में कमी आएगी जो पहले ही वर्षा-बाढ़ और सूखे से जूझ रहे राज्य का संकट बढ़ाएगा। पर्यावरणवादियों का तर्क है कि जब राज्य में ऐसे क्षेत्र हैं जहां बिना पेड़ों को काटे मेट्रो कार शेड बनाए जा सकते हैं तो ऐसे में आरे कॉलोनी के पेड़ों की कटाई करने की क्या आवश्यकता है? 

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वनाच्छादित क्षेत्रों के मामले में मुंबई शहरी क्षेत्रों में अग्रणी है। वनाच्छादित भूमि के मामले में शहरों में यह दिल्ली के बाद दूसरे नंबर पर आता है। इसके कुल लगभग 602 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्र में लगभग 111 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। लेकिन मुंबई की विशाल आबादी को देखते हुए शुद्ध पर्यावरण के लिए इसे बेहद कम बताया जाता है। किसी भौगोलिक क्षेत्र में लगभग एक तिहाई भूमि को वनाच्छादित होने को आदर्श माना जाता है। इस पैमाने पर मुंबई सहित देश के अधिकांश शहर खरे नहीं उतरते हैं। पर्यावरणवादियों का कहना है कि आरे प्रोजेक्ट के कारण हजारों पेड़ों को काटने की आवश्यकता पड़ेगी जो शहर के वातावरण को नुकसान पहुंचाएगा।
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कितना है वन क्षेत्र
इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR 2019) के अनुसार महाराष्ट्र की 10,806 वर्ग किमी (लगभग 16.50 प्रतिशत) भूमि वनाच्छादित है। इसके गढ़चिरोली जिले का 68.81 प्रतिशत क्षेत्र जंगलों से ढका हुआ है, लेकिन इसी की तुलना में पुणे शहर में केवल 10.94 प्रतिशत भूमि हरित क्षेत्र है। वर्षा जल की कमी से जूझते लातूर में 0.18 प्रतिशत भूमि ही वनाच्छादित है। लातूर की भुखमरी और किसानों की परेशानियों के पीछे क्षेत्र में वनों की भारी कमी को जिम्मेदार बताया जाता है।
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सबसे ज्यादा वनाच्छादित क्षेत्र के मामले में प्रमुख रहने वाले महाराष्ट्र के लिए इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट के  तथ्य बहुत चिंताजनक हैं। 2017 की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि महाराष्ट्र में वनाच्छादित भूमि का तेजी से क्षरण हो रहा है। कुछ वर्षों में ही अकेले पुणे शहर में 32 वर्ग किलोमीटर और जलगांव में 21 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कम हो गया है। यदि इसी गति से वन क्षेत्र में कमी होती रही, तो महाराष्ट्र में बाढ़ और सूखे की आशंका बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी।


वन क्षेत्र बढ़ने पर सवाल
राज्य के लिए यह अच्छी खबर है कि सिंधु दुर्ग और कोल्हापुर में क्रमशः 34 वर्ग किलोमीटर और 31 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की वृद्धि हुई है, लेकिन पर्यावरणवादियों ने इस रिपोर्ट पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि रबर की खेती के लिए आवंटित भूमि पर उगे पेड़ों को भी वन क्षेत्र बताते हुए वन विभाग अपनी पीठ ठोंकने का काम कर रहा है, जबकि असलियत यह है कि अन्य क्षेत्रों की तरह इन इलाकों में भी वन भूमि में कमी आई है। समुद्र के किनारों की एरिया में भी मैंग्रूव वनों के क्षेत्र में भारी कमी आ रही है जिससे राज्य में बाढ़-सूखे का संकट बढ़ रहा है। आने वाले समय में यह संकट गहरा सकता है।

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