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Hindi News ›   India News ›   Magadhraj: The Enduring Hue of Caste Discourse in Bihar Politics

बिहार चुनाव 2025: लोकतंत्र की प्रयोगशाला में जाति का अमर रसायन

Mon, 27 Oct 2025 05:16 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला ब्यूरो, पटना
अमर उजाला ब्यूरो, पटना Published by: शिव शुक्ला Updated Mon, 27 Oct 2025 05:16 AM IST
सार

सभ्यता के आरंभ से ही बिहार की धरती साम्राज्यों, दर्शन और गणतंत्रों की जननी रही है। यह वह धरती है, जहां दुनिया का पहला गणराज्य वैशाली स्थापित हुआ...जहां से अशोक और चाणक्य ने विशाल मगध साम्राज्य का विस्तार किया।
 

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Magadhraj: The Enduring Hue of Caste Discourse in Bihar Politics
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अतीत की समृद्ध विरासत जातीय पहचान, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की कालिमा में कहीं गुम हो चुकी है। विधानसभा चुनाव में मुद्दे गूंज रहे हैं...पलायन, बेरोजगारी, गरीबी और सामाजिक न्याय। आजादी के पहले अंग्रेजों ने जिस राज्य को प्रीमियर दिया, बाद में वह मुख्यमंत्री पद हो गया।

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चाणक्य से चंद्रगुप्त, सम्राट अशोक से गुरु गोविंद सिंह, गौतम बुद्ध से महावीर, दिनकर से विद्यापति, राजेंद्र प्रसाद से जय प्रकाश नारायण, श्रीकृष्ण सिंह से कर्पूरी ठाकुर, लालू से नीतीश तक...नालंदा से विक्रमशिला, क्रांति से संपूर्ण क्रांति, राजा से राजवंश, तंत्र से गणतंत्र, बल से बाहुबल, नीति से राजनीति तक...। ये सब नाम नहीं बल्कि वह पहचान हैं, जो बिहार के साथ जुड़ी हैं। वह ऐतिहासिक भूमि जिसने गणतंत्र को जन्म दिया। जहां राजनीति पली बढ़ी। कूटनीति को विस्तार मिला। शिक्षा सम्मानित हुई और तिरंगे को अशोक चक्र मिला।
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चेहरे बदलते रहे। नारे नए लगते रहे...
बड़े नेता बिहार देता रहा। देश की राजनीति की दशा-दिशा को बदलने वाला राज्य बिहार बना रहा। इसके बावजूद नहीं बदली, तो बिहार की किस्मत। जातीय गोलबंदी प्रदेश की सबसे बड़ी पहचान बनी रही।
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राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मस्थली बिहार थी...
रश्मिरथी में वह लिखते हैं-मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का, धनुष छोड़कर और गोत्र क्या होता रणधीरों का? पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, जाति-जाति का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर।

दिनकर जिस युग में थे...उस वक्त भी बिहार जातिवादी राजनीति से त्रस्त था। कर्ण पर लिखे महाकाव्य में उन्होंने बिहार की जातिवादी राजनीति पर इन पंक्तियों से करारा प्रहार किया। इसलिए, जो बिहार को लालू प्रसाद यादव या नीतीश कुमार के साथ ही जातीय राजनीति से जोड़ते हैं...उन्हें शायद सच्चाई पता नहीं। पहले सवर्ण राजनेताओं के बीच बिहार की सत्ता का समर था। फिर यह अगड़ा बनाम पिछड़ा हुआ। वहां से अब पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा के साथ कई और मोड़ ले गया।


इसे समझाने के लिए अमर उजाला आज से विशेष शृंखला मगधराज लाया है। इसके जरिये बिहार में जातीय विमर्श के साथ जो राजनीतिक टर्निंग प्वाइंट आए हैं...उनको सिलसिलेवार तरीके से सामने रखा जाएगा। अंग्रेजों के जमाने से लेकर आजादी के बाद तक बिहार की राजनीति के इस सफर को जाने बगैर बिहार के राजनीति के मर्म को समझना नामुमकिन है।

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