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मद्रास हाईकोर्ट: जज बोले- पति और पत्नी यह समझें ‘अहंकार’ और ‘असहिष्णुता’ जूते की तरह, इसे घर के बाहर छोड़ना जरूरी
Wed, 02 Jun 2021 04:48 PM IST
प्रशांत कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: प्रशांत कुमार
Updated Wed, 02 Jun 2021 04:48 PM IST
सार
पत्नी की प्रताड़ना से परेशान पति ने कुटुंब न्यायालय में तलाक की अर्जी लगाई थी। वहां से उसके पक्ष में फैसला हुआ। इसी बीच पत्नी ने पति पर घरेलू हिंसा के आरोप लगा दिए। इस आधार पर पति को नौकरी से निलंबित कर दिया गया। इस निलंबन आदेश के खिलाफ संबंधित व्यक्ति ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील की थी
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मद्रास हाईकोर्ट
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विस्तार
‘दुर्भाग्य से पति के पास पत्नी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम जैसा कोई कानून नहीं है। ऐसे में स्पष्ट है कि सिर्फ पति को परेशान करने के लिए पत्नी ने घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई है।’ घरेलू हिंसा मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एस. वैद्यनाथन ने यह टिप्पणी की।
सुनवाई के दौरान जस्टिस वैद्यनाथन ने कहा, ‘वर्तमान पीढ़ी को समझना होगा कि शादी एक संस्कार है। यह कोई अनुबंध नहीं। बेशक, घरेलू हिंसा अधिनियम-2005 लागू होने के बाद ‘संस्कार’ का अस्तित्व खत्म होता दिख रहा है। यह कानून लिव-इन संबंधों (बिना शादी साथ रहना) को मंजूरी देता है। फिर भी पति और पत्नी को यह यह समझना चाहिए कि ‘अहंकार’ और ‘असहिष्णुता’ जूते की तरह हैं, इसलिए इन्हें घर से बाहर ही छोड़ देना चाहिए। अगर ये घर में प्रवेश करते हैं तो न सिर्फ उनका जीवन नारकीय होता है, बल्कि बच्चों को भी ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है।’ हाईकोर्ट ने पीड़ित पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 15 दिन में नौकरी पर बहाल करने का आदेश दिया, साथ ही सरकार को निलंबन की समयावधि के लिए उसका पूरा पैसा देने को भी कहा।
कुटुंब न्यायालय में चल रहा था तालाक का मामला
जस्टिस वैद्यनाथन ने कहा कि ऐसा लगता है, शिकायतकर्ता की पत्नी ने पति को बेवजह तंग करने के मकसद से शिकायत की है। दोनों के तलाक का मामला कुटुंब न्यायालय में चल रहा था। उसमें पति के पक्ष में फैसला आने की संभावना थी। कुटुंब न्यायालय तलाक मंजूर करने वाला था, लेकिन इसके चार दिन पहले ही पत्नी ने पति पर घरेलू हिंसा का आरोप लगा दिया। इस बीच, कुटुंब न्यायालय ने तलाक का आदेश देकर मामला खत्म कर दिया, लेकिन पति के विभाग ने पत्नी के घरेलू हिंसा के आरोपों को सही मानकर पति को निलंबित कर दिया। विभाग द्वारा ऐसा किए जाने की कोई वजह नहीं थी। वह आदेश गलत था।
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सुनवाई के दौरान जस्टिस वैद्यनाथन ने कहा, ‘वर्तमान पीढ़ी को समझना होगा कि शादी एक संस्कार है। यह कोई अनुबंध नहीं। बेशक, घरेलू हिंसा अधिनियम-2005 लागू होने के बाद ‘संस्कार’ का अस्तित्व खत्म होता दिख रहा है। यह कानून लिव-इन संबंधों (बिना शादी साथ रहना) को मंजूरी देता है। फिर भी पति और पत्नी को यह यह समझना चाहिए कि ‘अहंकार’ और ‘असहिष्णुता’ जूते की तरह हैं, इसलिए इन्हें घर से बाहर ही छोड़ देना चाहिए। अगर ये घर में प्रवेश करते हैं तो न सिर्फ उनका जीवन नारकीय होता है, बल्कि बच्चों को भी ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है।’ हाईकोर्ट ने पीड़ित पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 15 दिन में नौकरी पर बहाल करने का आदेश दिया, साथ ही सरकार को निलंबन की समयावधि के लिए उसका पूरा पैसा देने को भी कहा।
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कुटुंब न्यायालय में चल रहा था तालाक का मामला
जस्टिस वैद्यनाथन ने कहा कि ऐसा लगता है, शिकायतकर्ता की पत्नी ने पति को बेवजह तंग करने के मकसद से शिकायत की है। दोनों के तलाक का मामला कुटुंब न्यायालय में चल रहा था। उसमें पति के पक्ष में फैसला आने की संभावना थी। कुटुंब न्यायालय तलाक मंजूर करने वाला था, लेकिन इसके चार दिन पहले ही पत्नी ने पति पर घरेलू हिंसा का आरोप लगा दिया। इस बीच, कुटुंब न्यायालय ने तलाक का आदेश देकर मामला खत्म कर दिया, लेकिन पति के विभाग ने पत्नी के घरेलू हिंसा के आरोपों को सही मानकर पति को निलंबित कर दिया। विभाग द्वारा ऐसा किए जाने की कोई वजह नहीं थी। वह आदेश गलत था।
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