कानों देखी: नए मुल्ला ज्यादा प्याज खाएं
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कहावत पुरानी है। नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है। यह कहावत मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के पुराने और घुटे रणनीतिकारों को काफी परेशान कर रही है। लेकिन मुसीबत यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? लिहाजा सब भीतर घुट रहे हैं और बाहर खामोशी ओढकर चुप हैं। मध्य प्रदेश में सबकुछ बहुत बढ़िया चल रहा था। शिवराज सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी ने कांग्रेस नेताओं की छाती फुला दी है। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि दिग्विजय सिंह ने नर्मदा यात्रा के जरिए, सिंधिया और कमलनाथ ने अपने तरीके से राज्य में पिछले काफी समय से एड़ी-चोटी का पसीना भी बहा दिया है। लेकिन शिवभक्त के अवतार में आए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को उनके कुछ करीबियों ने सुझाव दिया। इन करीबियों का प्रभाव बढ़ा था और इसका असर यह हुआ कि कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र (वचन पत्र) हिंदूमय हो गया है। कांग्रेस हिंदुत्व को लेकर भाजपा और आरएसएस को कड़ी टक्कर देती नजर आ रही है। पार्टी के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि नए मुल्ला ने प्याज थोड़ी ज्यादा ही खा ली है। वह दूसरा तर्क भी देते हैं कि जब बाजार में ओरिजिनल मोबाइल उस दाम पर मिल रहा है तो कोई डुप्लीकेट क्यों खरीदेगा। अब राहुल को यह बात समझ में आए तब ना।
वसुंधरा का दमखम
वसुंधरा ने राजस्थान विधानसभा चुनाव के बहाने राज्य के विरोधी भाजपाइयों को बता दिया कि अभी तो महारानी वही हैं। कोई चाहे तो सवाईमाधोपुर विधानसभा की निवर्तमान विधायक दीया कुमारी से पूछ ले। दीया कुमारी पिछले चुनाव में जीतने के बाद काफी चर्चित हुई थीं। बाद में वसुंधरा से विवाद के कारण चर्चा में आईं। इस बार टिकट बंटवारे में वसुंधरा ने दीया कुमारी को लेकर अंगद का पांव धर दिया। वहीं दीया कुमारी ने भी अपने संपर्कों के जरिए कोई कसर नहीं छोड़ी। वह कुछ संघ और भाजपा केंद्रीय नेताओं के भरोसे भी रही। पहली लिस्ट में उन्हें टिकट नहीं मिला। दूसरी में भी नहीं मिला, लेकिन दूसरा प्रत्याशी घोषित नहीं हुआ था। दीया को उनके करीबियों ने उम्मीद दे रखी थी, लेकिन शनिवार को वह आखिरी लड़ाई भी हार गई। मानवेंद्र सिंह का हाल सबको पता है। टीम वसुंधरा के सूत्र बताते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मुख्यमंत्री वसुंधरा एक दूसरे का काफी सम्मान करते हैं। दोनों राजस्थान में अपनी पार्टी के दिग्गज नेता हैं। लिहाजा वसुंधरा ने भविष्य की राजनीति का आकलन करके पूरा दमखम दिखाया है। धुर विरोधियों को खड़ा नहीं होने दिया और सबसे खास लोगों का ही ख्याल रखा। राजस्थान में भाजपा की मजबूरी के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट भी कर रही हैं।
योगी जी नंबर वन हैं
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री नंबर वन है। योगी की मांग मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ रही है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी मांग बढ़ गई है। भगवावेशधारी, महंत अवैद्यनाथ के शिष्य, गोरखपुर गोरक्ष पीठ के योगी हिंदुत्व के प्रतीक नेताओं में सबको मात दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ उनकी मांग बढ़ी है तो मिजोरम और तेलंगाना में भी प्रत्याशी योगी की जनसभा चाहते हैं। योगी की समयस्या यह है कि वह 16-17 घंटे तक काम करते हैं। मुख्यमंंत्री कार्यालय में बैठकर हर फाइल निबटाते हैं। लगातार अफसरों से फीडबैक लेते रहते हैं। इलाहाबाद में कुंभ की तैयारी और जनवरी 2018 में बनारस में प्रवासी भारतीय दिवस को सुपर लेवल पर ले जाने में व्यस्त हैं। उनके पास समय राज्य का विकास देख पाने के लिए भी समय कम है।
योगी जी एक मामले में और नंबर वन हैं। वह उत्तर प्रदेश में भाजपा के इकलौते मुख्यमंत्री है, जिसका पूरा नाज, नखरा केंद्रीय नेतृत्व को सहना पड़ रहा है। 2017 में जब योगी मुख्यमंत्री बने थे तो उनके साथ दो उप मुख्यमंत्री बनाए गए थे। योगी वैसे भी संघ के रास्ते से लखनऊ में काबिज हुए थे। दोनों उपमुख्यमंत्रियों के बारे में कहा जा रहा था कि ये योगी को नकेल पहनाने के इरादे से उपमुख्यमंत्री बनाए गए हैं। जहां भी मुख्यमंत्री जाते थे, दोनों उपमुख्यमंत्री साथ लग लेते थे। यह योगी जी को नागवार लग रहा था। बताते हैं योगी ने इस दांव को भी पलट दिया है। अब वह उत्तर प्रदेश का इकलौता फ्रेम वाला चेहरा है। बाकी सब आर्नामेंटल। इतना ही नहीं अब प्रदेश में व्यस्थित तरीके से टीम योगी खड़ी हो रही है।
सीबीआई में असल की लड़ाई बाकी है
सीबीआई के निदेशक और स्पेशल डायरेक्टर का मामला उच्चतम न्यायालय में है। अदालत के आदेश पर सीवीसी ने अपनी रिपोर्ट में निदेशक आलोक वर्मा पर राकेश अस्थाना के आरोपों के आधार पर सवाल उठाया है। जवाब आलोक वर्मा को देना है। आलोक वर्मा के करीबियों से छनकर आ रही खबर के मुताबिक वर्मा को इसका पूरा आभास था। वह पहले से इसके लिए तैयारी करके बैठे हैं। वह सोमवार को न केवल अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट को सौंपने में व्यस्त हैं, बल्कि इस लड़ाई में सीवीसी की निष्पक्षता पर सवाल और प्रधानमंत्री कार्यालय के कुछ अफसरों का नाम लेने पर विचार कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि वर्मा और अस्थाना प्रकरण में पीएमओ के कुछ अफसरों की भूमिका ने बड़ा खेल किया है। अस्थाना के कंधे पर हाथ रखकर वर्मा को कई बार नीचा दिखाने की कोशिश हुई और सीबीआई के कामकाज में हस्तक्षेप किया गया। इसके लिए सीवीसी को भी इस्तेमाल किया गया। बताते हैं कानूनी सलाह ठीक रही तो वर्मा समय आने पर इस हथियार को अजमाएंगे।
बिना अप्वाइंटमेंट के पत्रकारों से न मिलिए
एक मंत्रालय के सचिव ने बुलाया। चाय पिलाई और कुछ समय बाद सरकार के दु:ख बताए। सरकार के कामकाज और छवि को लेकर बन रही छवि से मोदी सरकार खुश नहीं है। उसे इस छवि में सबसे बड़ा दोष मीडिया और अफसरों का नजर आ रहा है। सरकार के कुछ नियंताओं का मानना है कि पत्रकार अफसरों के पास गपशप के लिए बैठते हैं और अफसरों से ऑफ दि रिकार्ड बातचीत में एबीसीडी लेकर खबरें बना रहे हैं। लिहाजा सभी अफसरों को मौखिक रूप से ताकीद किया गया है कि वह कामकाज पर ध्यान दें। अनौपचारिक पत्रकार वार्ता में समय जाया न करें। इतना ही नहीं उन्हीं पत्रकारों से मिलें जिनके पास अप्वाइंटमेंट है। अप्वाइंटमेंट देने से पहले बाकायदा मुतमईन हो जाएं किस विषय पर वह मिलना चाहते हैं। इस मामले में सख्ती से सावधानी बरती जाए। हालांकि सूत्र का कहना है कि इस तरह का सुझाव और व्यवस्था 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से है, लेकिन अब इसे ज्यादा चुस्त-दुरुस्त बनाया जा रहा है।
चिंदबरम गब्बर क्यों हैं?
भाजपा नेताओं और टीम मोदी-शाह के लिए यह परेशानी सबब है। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम पर तमाम तरह का शिकंजा कसे जाने के बाद भी वह पूरी अकड़ में हैं। चिदंबरम गब्बर बने हुए हैं। सरकार और भाजपा पर लगातार जहर बुझे तीर छोड़ रहे हैं। कानून के जानकार, टैक्सेशन मामले के प्रतिष्ठित वकील चिदंबर की पत्नी भी अच्छी वकील हैं। ईडी, सीबीआई और जांच एजेंसियां अपनी हर कोशिश भी कर रही हैं, लेकिन टीम चिदंबरम न केवल कानूनी तरीके से अपना बचाव कर रही है, बल्कि राजनीतिक हमले की धार बढ़ा रही है। वह प्रधानमंत्री मोदी की इकोनॉमिक्स से लेकर हर नीति पर हमला बोल रहे हैं। इस बीच खबर है कि चिदंबरम पर अभी शिकंजा और कसने की तैयारी चल रही है। ईडी के नये निदेशक संजय मिश्रा पर इसका दबाव रहने के पूरे आसार हैं। सुब्रामण्यम स्वामी चाहते हैं कि इस पूरे प्रकरण में राजेश्वर सिंह को थोड़ा और खुले हाथ से काम करने दिया जाए।
उर्जित पटेल का इम्तिहान
रिजर्व बैंक आफ इंडिया के गवर्नर उर्जित पटेल का इम्तिहान शुरू हो गया है। वह प्रधानमंत्री से मिलकर आए हैं। सरकार के साथ तालमेल बनाकर चलना चाहते हैं, लेकिन स्थितियां विपरीत होती जा रही हैं। आरएसएस से गहरा नाता रखने वाले और आरएसएस इकोनॉमिक्स के मास्टर एस गुरुमूर्ति झुकने के लिए तैयार नहीं है। आरबीआई के बड़े अधिकारी विरल आचार्य और उर्जित पटेल को गुरुमूर्ति इकोनॉमिक्स समझ में नहीं आ रही है। घोटाला, ऋण पर ब्याज का न लौटना और एनपीए ने बैंकों की माली हालत खराब कर रखी है। बैंक अब ऋण देने, क्रेडिट लिमिट बढ़ाने में दस बार सोच रहे हैं। एनपीए से कर्जा वसूलने में भी भरपूर दादागिरी दिखा रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी कोई उत्साहित करने वाली खबर नहीं आ रही है। बैंक अधिकारियों का कहना है कि नोटबंदी के बाद जो कर्जा लेने वाली ईकाइयां किश्त का भुगतान कर रही थी, उन्होंने बंद कर दिया। रिअल स्टेट बुरे सपने की तरह है। सब मिलाकर रुपये की तरलता तंग कर रही है। ऐसे में सरकार का बढ़ रहा दबाव और आरबीआई निदेशकों के साथ तालमेल बनाकर चलना नये इंतहान जैसा ही है। बताते हैं ऐसे समय में उर्जित को पुराने गवर्नर रघुराम राजन भी खूब याद आ रहे हैं।
हार नहीं मानते अमित शाह
भाजपा को उसकी स्थापना के बाद से पहला अध्यक्ष मिला है जो आसानी से घुटने नहीं टेकता। अमित शाह के साथ काम करने वाले टीम के सदस्य बताते हैं कि बिना किसी पूर्वाग्रह के वह नई सोच में संतुलन बनाने के मास्टर हैं। विपरीत हालात में अमित शाह ने सहयोगियों के जरिए राजस्थान विधानसभा चुनाव में जीत की चौसर बिछाई है तो वह पश्चिम बंगाल में कीर्तिमान बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। तेलंगाना में उनके दिमाग में कोई नई खिचड़ी पक रही है। इसका अंदाजा अमित शाह के साथ काम करने वाले लोगों को भी नहीं है। मिजोरम में सत्ता में आने के लिए भाजपा अध्यक्ष ने सभी घोड़े खोल दिए हैं। बताते हैं मिजोरम में वह हर हाल में भाजपा सरकार बनवाने के लिए काम कर रहे हैं। इसी तरह से मध्य प्रदेश में भाजपा ने भी पूरी ताकत झोंक दी है। शिवराज सिंह और भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह के साथ तालमेल बनाकर 21-22 नवंबर के बाद से वह नये सिरे से प्रचार अभियान को लांच करने जा रहे हैं। बताते हैं शाह पहले तेल और तेल की धार देखते हैं। इसके बाद सतरंज में हर चाल को आपरेशनल बनाकर बाजी जीत लेते हैं। उनका सबसे बड़ा बल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है। इसी बिना पर वह अपनी टीम के सदस्यों से पांच राज्यों में से कम से कम चार में सरकार बना लेने का दावा कर रहे हैं। देखिए होता क्या है।