आम चुनाव 2019: 2 मार्च के बाद हो सकता है चुनाव की तारीख का एलान, मोदी-शाह ने कसी कमर
लोकसभा का शीत सत्र समाप्त होते ही आम चुनावों की तारीखों की घोषणा हो सकती है। इसी के साथ शुरू हो जाएगा चुनावी रैलियों का सफर। चुनावी तैयारियों के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कार्ययोजना भी अंतिम रूप में पहुंच गई है। प्रधानमंत्री लगभग सौ चुनावी सभाएं और रैलियां करेंगे। उनकी अंतिम रैली दो मार्च को होगी।
सबसे बड़ी चिंता उत्तर प्रदेश
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा उत्तर प्रदेश में खास तरह की तैयारी कर रही है। 2014 में पूरे देश में मोदी लहर थी जिसका फायदा भाजपा को जमकर मिला था। सूबे की 80 लोकसभा सीटों में से 73 भाजपा और उसके सहयोगी दल (अपना दल) के खाते में आई थी। लेकिन इस बार बदलते परिवेश की वजह से भाजपा की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
जिस तरह से पिछले दिनों प्रधानमंत्री के बनारस दौरे का अपनादल ने विरोध किया वह पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है। वहीं दूसरा बड़ा कारण सपा और बसपा के बीच महागठबंधन की संभावना है। अभी भले ही सपा और बसपा के बीच में गठबंधन होने की खबरें आ रही हैं, लेकिन उ.प्र. के गोरखपुर जिले से आने वाले भाजपा के राज्यसभा सांसद का कहना है फरवरी के पहले सप्ताह से तस्वीर बदलने के आसार हैं।
राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजीत सिंह का भी कहना है कि प्रदेश के हर कोने में महागठबंधन की चर्चा है। यह चर्चा राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जनता कर रही है। अजीत सिंह का कहना है कि भाजपा को छोड़कर चाहे सपा हो या बसपा, कांग्रेस हो या कोई अन्य दल, महागठबंधन को इनकार नहीं कर सकता। चौधरी के अनुसार यदि महागठबंधन से परहेज हुआ तो यह विपक्षी दलों की बहुत बड़ी राजनीतिक भूल होगी।
समाजवादी पार्टी के एक अन्य सांसद का कहना है कि अभी बसपा जो भी कर रही है, इसके पीछे उसकी अपनी मजबूरी है। इस मजबूरी को सभी राजनीतिक सहयोगी दल समझ रहे हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को पता है कि यदि महागठबंधन स्वरुप में आया तो उसकी राह मुश्किल है। भाजपा के चुनाव रणनीतिकारों की टीम में रजत सेठी से जुड़े एक सदस्य का भी मानना है कि मुश्किल बड़ी है।
महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार भी डरा रहा
भाजपा को इस बार सहयोगी पार्टियों से 2014 जैसा समर्थन मिलने की उम्मीद कम होती जा रही है। शिवसेना ने पहले ही 2019 का चुनाव अपने दम पर लड़ने का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस के हरियाणा से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा का आत्मविश्वास गजब के कुलांचे भर रहा है।कांग्रेस के झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह और वरिष्ठ नेता सुबोध कांत सहाय चुनाव को लेकर बड़े दावे कर रहे हैं। वहीं झारखंड से भाजपा के एक सांसद का मानना है कि थोड़ी मुश्किल है। अभी चुनाव आने में चार महीने का समय है और तबतक सब ठीक हो जाएगा। बिहार में भाजपा के प्रभारी भूपेन्द्र यादव दिन रात एक करके पार्टी का आधार मजबूत करने में लगे हैं। लेकिन झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र के साथ-साथ भाजपा को हरियाणा, राजस्थान, म.प्र., दिल्ली और गुजरात में झटका लगने की उम्मीद है। इन राज्यों से 2014 में पार्टी को 190 से अधिक सीटें मिली थी।
कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा से उम्मीद
भाजपा सूत्रों के अनुसार कर्नाटक से उन्हें काफी उम्मीदें हैं। राज्य में भाजपा अच्छा प्रदर्शन करेगी। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा अपनी जड़े मजबूत कर रही है। पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष को राज्य में आधा दर्जन से अधिक लोकसभा जीतने का भरोसा है। कांग्रेस के नेता भी मान रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ सकता है।हालांकि भाजपा को सीट मिलने को लेकर कांग्रेस के नेता आश्वस्त नहीं है। चुनाव अभियान को जेरदार बनाने के लिए पार्टी राज्यसभा सांसद रूपा गांगुली, अभिनेत्री मौसमी चैटर्जी समेत कई चेहरों को मैदान में उतार सकती है। केरल में भी भाजपा ने 2014 के बाद से आक्रामक राजनीतिक अभियान चला रखा है।
यहां से भी वोट प्रतिशत बढऩे या खाता खुलने की उम्मीद है। इसी तरह से उड़ीसा में भी भाजपा को सफलता मिलने की पूरी उम्मीद है। उड़ीसा में राज्य विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव साथ में होंगे। इसमें केन्द्रीय मंत्री जुएल ओराम और धर्मेंन्द्र प्रधान के कंधे पर पार्टी को सफलता दिलाने का बड़ा जिम्मा रहेगा।