{"_id":"6666bdb9ca98b41c8a078d0f","slug":"lok-sabha-election-result-west-bengal-lok-sabha-seats-cpm-news-in-hindi-2024-06-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"West Bengal: हंसिए की धार पड़ने लगी कुंद, खाता भी नहीं खोल पाई माकपा; 23 में 21 पर नहीं बचा पाए जमानत","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
West Bengal: हंसिए की धार पड़ने लगी कुंद, खाता भी नहीं खोल पाई माकपा; 23 में 21 पर नहीं बचा पाए जमानत
सार
देश में युवाओं वोटरों की संख्या ज्यादा है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए माकपा ने भी इस युवा और नामी चेहरों को मैदान में उतारा था। लेकिन युवा चेहरा कोई करिश्मा नहीं कर पाए। माकपा का गढ़ माने जाने वाले जादवपुर सीट से युवा चेहरा सृजन भट्टाचार्य को मैदान में उतारा था। उनको केवल 16.52 प्रतिशत ही मत मिले।
विज्ञापन
लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों तक एक छत्र राज करने वाली माकपा इस लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाई। इतना ही नहीं, इस बार माकपा ने 23 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, उनमें से 21 तो अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए यानी 21 की जमानत ही जब्त हो गई। केवल दो प्रत्याशी अपनी जमानत बचाने में कामयाब हुए है। इतना ही नहीं पार्टी का ग्राफ भी लगातार गिर रहा है। इस बार माकपा ने युवाओं को मौका दिया था लेकिन युवा चेहरे भी कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए। ऐसे में अब सवाल उठने लगा है कि क्या हंसिए की धार कुंद पड़ने लगी है। राजनीतिक विश्लेशक मानते हैं कि अगर माकपा ने इस लोसकभा चुनाव में निराश किया। अगर यही हाल रहा तो आने वाले चुनावों में माकपा को और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा और प्रभाव और कमेगा।
पांच सीटें जितने का किया था दावा
लोकसभा चुनाव से पहले माकपा ने अपने एक चुनाव सर्वे में दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम पांच सीटों जीत दर्ज करेगी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक उनको पूरा भरोसा था कि दमदम के अवावा मुर्शिदाबाद, जादवपुर और श्रीरामपुर सहित पांच पर जीत दर्ज करेगी, लेकिन चुनाव के बाद ये दावे हवा-हवाई हो गए। पार्टी पांच तो क्या बंगाल में खाता भी नहीं खोल पाई। मुर्शिदाबाद में मो. सलीम को हार का सामना करना पड़ा। दमदम से सुजन चक्रवर्ती हार गए। यही हाल जादवपुर सीट पर भी हुआ यहां से माकपा प्रत्याशी सृजन भट्टाचार्य को तृणमूल कांग्रेस से हार का सामना करना पड़ा। पार्टी के दावे के मुताबिक पांच जितना तो दूर की बात खाता तक खोल नहीं पाई। और इस बार भी 2019 की तरह पार्टी का प्रदर्शन शून्य रहा।
23 में से 21 का जमानत जब्त
इस बार बंगाल में माकपा ने अपने 23 उम्मीदवार उतारे थे। कांग्रेस का भी हाथ उनके साथ था, लेकिन माकपा के 23 में से 21 प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा पाए। मुर्शिदाबाद से माकपा के मो. सलीम दूसरे नंबर पर रहे। उनको 1,63,525 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। वरिष्ठ मापका नेता सुजन चक्रवर्ती दमदम से चुनाव मैदान में थे, उनको यहां पर तीसरे नंबर रह कर संतुष्ट रहना पड़ा। बाकी 21 जगह माकपा अपनी जमानत तक बचा नहीं पाई।
विज्ञापन
युवा चेहरा नहीं दिखा पाए करिश्मा
देश में युवाओं वोटरों की संख्या ज्यादा है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए माकपा ने भी इस युवा और नामी चेहरों को मैदान में उतारा था। लेकिन युवा चेहरा कोई करिश्मा नहीं कर पाए। माकपा का गढ़ माने जाने वाले जादवपुर सीट से युवा चेहरा सृजन भट्टाचार्य को मैदान में उतारा था। उनको केवल 16.52 प्रतिशत ही मत मिले। उनको तृणमूल कांग्रेस से हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह से श्रीरामपुर से दीप्शिता धर को प्रत्याशी बनाया था, उनको 16.2 प्रतिशत वोट के साथ संतुष्ट होना पड़ा। बशीरहाट से माकपा ने निरापद सरदार को मैदान में उतारा था, उनको 5.11 प्रतिशत ही वोट मिले। डायमंड हार्बर से प्रतिकुर रहमान को माकपा ने प्रत्याशी बनाया था लेकिन वहां उनको हार का सामना करना पड़ा। कोलकाता दक्षिण से माकपा ने सायरा हलीम को उम्मीदवार बनाया था लेकिन उनको केवल 13.55 प्रतिशत मतों से संतुष्ट रहना पड़ा। इसी तरह से तमलुक से युवा चेहरा सायन बनर्जी को मैदान में उतारा था, उन्हें 5.41 प्रतिश ही मत मिले। माकपा के युवा चेहरे कुछ खास नहीं कर पाए। हालांकि वाम-कांग्रेस गठजोड़ को 12 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली।
इसलिए कमजोर पड़ने लगी हंसिए की धार
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार के चुनाव नतीजों को देखने के बाद यह कह सकते हैं कि हंसिए की धार अब कुंद पडने लगी है। पिछली बार माकपा को वोट 6.3 प्रतिशत मिले थे जबकि इस बार 5.61 प्रतिशत ही मिले। इस तरह का निराशाजनक प्रदर्शन किसी भी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। यह तब जबकि इस पार्टी ने 34 वर्षों तक बंगाल में राज किया हो। इसका कारण है पार्टी का जनाधार कमजोर पड़ रहा है क्योंकि पार्टी संगठन भी कमजोर हुआ
है। पार्टी में युवाओं की भागीदारी तो है लेकिन संख्या कम हो रही है। माकपा के बहुत से मजबूत कार्यकर्ता दूसरी पार्टियों में चले गए। और जो हैं, वो छितरे हुए हैं। माकपा का वोटबैंक काफी संख्या में तृणमूल कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो गया है। अगर समय रहते माकपा ने आत्म मंथन और सुधार नहीं किया तो बंगाल में इतिहास बनने में देर नहीं लगेगा। क्योंकि आने वाले चुनाव और कठिन होंगे।
लोकसभा चुनाव 2024
लोकसभा चुनाव 2019
लोकसभा चुनाव 2014
विज्ञापन
पांच सीटें जितने का किया था दावा
लोकसभा चुनाव से पहले माकपा ने अपने एक चुनाव सर्वे में दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम पांच सीटों जीत दर्ज करेगी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक उनको पूरा भरोसा था कि दमदम के अवावा मुर्शिदाबाद, जादवपुर और श्रीरामपुर सहित पांच पर जीत दर्ज करेगी, लेकिन चुनाव के बाद ये दावे हवा-हवाई हो गए। पार्टी पांच तो क्या बंगाल में खाता भी नहीं खोल पाई। मुर्शिदाबाद में मो. सलीम को हार का सामना करना पड़ा। दमदम से सुजन चक्रवर्ती हार गए। यही हाल जादवपुर सीट पर भी हुआ यहां से माकपा प्रत्याशी सृजन भट्टाचार्य को तृणमूल कांग्रेस से हार का सामना करना पड़ा। पार्टी के दावे के मुताबिक पांच जितना तो दूर की बात खाता तक खोल नहीं पाई। और इस बार भी 2019 की तरह पार्टी का प्रदर्शन शून्य रहा।
विज्ञापन
23 में से 21 का जमानत जब्त
इस बार बंगाल में माकपा ने अपने 23 उम्मीदवार उतारे थे। कांग्रेस का भी हाथ उनके साथ था, लेकिन माकपा के 23 में से 21 प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा पाए। मुर्शिदाबाद से माकपा के मो. सलीम दूसरे नंबर पर रहे। उनको 1,63,525 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। वरिष्ठ मापका नेता सुजन चक्रवर्ती दमदम से चुनाव मैदान में थे, उनको यहां पर तीसरे नंबर रह कर संतुष्ट रहना पड़ा। बाकी 21 जगह माकपा अपनी जमानत तक बचा नहीं पाई।
विज्ञापन
युवा चेहरा नहीं दिखा पाए करिश्मा
देश में युवाओं वोटरों की संख्या ज्यादा है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए माकपा ने भी इस युवा और नामी चेहरों को मैदान में उतारा था। लेकिन युवा चेहरा कोई करिश्मा नहीं कर पाए। माकपा का गढ़ माने जाने वाले जादवपुर सीट से युवा चेहरा सृजन भट्टाचार्य को मैदान में उतारा था। उनको केवल 16.52 प्रतिशत ही मत मिले। उनको तृणमूल कांग्रेस से हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह से श्रीरामपुर से दीप्शिता धर को प्रत्याशी बनाया था, उनको 16.2 प्रतिशत वोट के साथ संतुष्ट होना पड़ा। बशीरहाट से माकपा ने निरापद सरदार को मैदान में उतारा था, उनको 5.11 प्रतिशत ही वोट मिले। डायमंड हार्बर से प्रतिकुर रहमान को माकपा ने प्रत्याशी बनाया था लेकिन वहां उनको हार का सामना करना पड़ा। कोलकाता दक्षिण से माकपा ने सायरा हलीम को उम्मीदवार बनाया था लेकिन उनको केवल 13.55 प्रतिशत मतों से संतुष्ट रहना पड़ा। इसी तरह से तमलुक से युवा चेहरा सायन बनर्जी को मैदान में उतारा था, उन्हें 5.41 प्रतिश ही मत मिले। माकपा के युवा चेहरे कुछ खास नहीं कर पाए। हालांकि वाम-कांग्रेस गठजोड़ को 12 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली।
इसलिए कमजोर पड़ने लगी हंसिए की धार
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार के चुनाव नतीजों को देखने के बाद यह कह सकते हैं कि हंसिए की धार अब कुंद पडने लगी है। पिछली बार माकपा को वोट 6.3 प्रतिशत मिले थे जबकि इस बार 5.61 प्रतिशत ही मिले। इस तरह का निराशाजनक प्रदर्शन किसी भी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। यह तब जबकि इस पार्टी ने 34 वर्षों तक बंगाल में राज किया हो। इसका कारण है पार्टी का जनाधार कमजोर पड़ रहा है क्योंकि पार्टी संगठन भी कमजोर हुआ
है। पार्टी में युवाओं की भागीदारी तो है लेकिन संख्या कम हो रही है। माकपा के बहुत से मजबूत कार्यकर्ता दूसरी पार्टियों में चले गए। और जो हैं, वो छितरे हुए हैं। माकपा का वोटबैंक काफी संख्या में तृणमूल कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो गया है। अगर समय रहते माकपा ने आत्म मंथन और सुधार नहीं किया तो बंगाल में इतिहास बनने में देर नहीं लगेगा। क्योंकि आने वाले चुनाव और कठिन होंगे।
लोकसभा चुनाव 2024
| टीएमसी | 29 |
| भाजपा | 12 |
| कांग्रेस | 02 |
| माकपा | 00 |
लोकसभा चुनाव 2019
| टीएमसी | 22 |
| भाजपा | 18 |
| कांग्रेस | 02 |
| माकपा | 00 |
लोकसभा चुनाव 2014
| टीएमसी | 34 |
| भाजपा | 02 |
| कांग्रेस | 04 |
| माकपा | 02 |