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LS Polls 2024: सूखे कुंए...तपती दोपहरी...घंटों की लाइन...और सिर्फ दो मटका पानी...कुछ ऐसी कहानी है इस गांव की
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पालघर के गांव से ग्राउंड रिपोर्ट।
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अमर उजाला
विस्तार
दोपहर के साढ़े बारह बज चुके थे। सूरज सिर पर आ चुका था और तापमान चालीस डिग्री के करीब पहुंच चुका था। पठारी इलाकों में सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। पालघर के नेताली से निकल कर नासिक के रास्ते में करीब बीस किलोमीटर ही चले थे कि वह गांव दिख गया जहां हमें पहुंचना था। पूरा बंजर इलाका। मुख्य मार्ग से गांव को जाती हुई सड़क और गांव के किनारे की सड़क पर महिलाओं की लगी लाइन। तपती दोपहर में कोई महिला अपने घर से सिर पर मटका रखकर पानी लेने के लिए दौड़ी चली जा रही थी, तो कोई पहले से ही पानी की टंकी के पास लाइन में लगी हुई थी। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक अपने घर में पीने वाले पानी के लिए मिलने वाले दो मटके पानी का इंतजार कर रहे थे। अमर उजाला डॉट कॉम की टीम ने जब यहां पर महिलाओं से बात की, तो पानी के लिए उनका दुखदर्द सामने आ गया।पालघर के बालकापरा गांव में पानी का संकट कोई नई बात नहीं है। यहां पर बीते कई वर्षों से गर्मी के मौसम में लोगों की जिंदगी दुश्वार हो जाती है। दरअसल, यहां पर पीने के लिए पानी का कोई स्थाई प्रबंध नही है। गांव में पानी लेने के लिए लाइन लगाकर खड़ी महिलाओं ने बताया कि जब टंकी में पानी भरा जाता है, तो गांव के लोगों के लिए पीने का पानी मयस्सर हो पाता है। पानी लेने के लिए लाइन में लगी गांव की ललिता कहती हैं कि यहां पानी के लिए बहुत समस्या होती है। इसी जगह पर लाइन में लगकर खड़ा होना पड़ता है। कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि आपस में झगड़ा तक हो जाता है। ललिता कहती हैं कि एक परिवार को दो मटके पानी से काम चलाना होता है। जब पानी खत्म हो जाता है, तब इधर-उधर से पानी का बंदोबस्त करना पड़ता है। कई बार तो लोगों को पानी का टैंकर भी मांगना पड़ता है।
इस गांव के लोगों का कहना है कि टैंकर की कीमत 500 रुपये से लेकर 700 रुपये तक की होती है। जरूरी नहीं है कि यह कीमत गांव का हर पानी का जरूरतमंद खर्च कर सके। इसलिए वह या तो गांव के सरपंच से गुजारिश कर पानी के लिए दोबारा लाइन में लगता है। या फिर लाचार होकर अपने आस-पड़ोस के लोगों से मदद लेकर कुछ पानी का बंदोबस्त करता है। इसी गांव की रहने वाली युवती गौरी दो मटके और एक बोतल में पानी भरकर ले जाने के लिए लाइन में खड़ी थी। गौरी कहती हैं कि उनके घर में पांच लोग हैं, लेकिन यह पानी उनके लिए पर्याप्त नहीं है। क्योंकि यहां पर बहुत से लोग पहले से लाइन में लगे हैं। इसलिए पानी तो उनको इससे ज्यादा नहीं मिल सकता। लेकिन फिर भी पानी खत्म हो जाएगा, तो इस टैंक में पानी भरने तक पर दोबारा फिर से घंटों लंबी लाइन में लगना पड़ेगा। तब कहीं जाकर उनको थोड़ा पानी और मिल पाएगा।
ललिता बताती हैं कि गांव के दूसरे कोने पर ट्यूबवेल लगाया गया है। जहां से पानी की सप्लाई यहां के इस सामने वाले टैंक में की जाती है। यह पूछे जाने पर कि लोगों को दो मटके पानी देने की व्यवस्था कौन तय करता है। इस पर वह कहती हैं कि इसके लिए गांव के लोग खुद मीटिंग करते हैं, जिसमें गांव के लोगों को मिलने वाले पानी की आपूर्ति तय की जाती है। हालांकि उनका कहना है जरूरत पड़ने पर पानी तो मिल जाता है, लेकिन उसके लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ती है कि लोग पहले से मिले दो मटके पानी में ही अपना गुजारा कर लेते हैं। पानी लेने के लिए लाइन में खड़ी महिलाएं कहती हैं कि जब पानी ही दोपहर में आता है, तो क्या किया जा सकता है। भरी दोपहरी में जब दो पल छांव में बैठने की बारी आती है, तो पानी के लिए लंबी-लंबी लाइन लगानी पड़ती है।
इस गांव में जहां पर पानी के लिए महिलाओं ने लाइन लगाई है, उसके अगल-बगल में कई कुएं भी हैं। लेकिन सब के सब सूखे हैं। यहां रहने वाली नीलम गड़के कहती हैं कि गर्मियों के इस मौसम में सबसे ज्यादा पानी की समस्या होती है। वह कहती हैं कि जब पानी की आपूर्ति नहीं होती हैं, तो लोगों को पानी कहां से मिलेगा। नीलम कहती हैं कि हर घर के हिसाब से दो मटके पानी की व्यवस्था ही है। अगर लोगों को और पानी की जरूरत होती है, तो वह बाहर से टैंकर मंगवाते हैं। गांव के लोग ग्राम पंचायत से कई बार खुद पानी का टैंकर मंगवाकर कुएं में डलवाने की मांग करते हैं। सड़क के दूसरी ओर कुछ समय पहले ही सरकार की ओर से एक कुआं बनवाया गया था। नीलम कहती है कि उसमें भी पानी नहीं होता।
गांव की ही प्रमिला शेलार कहती हैं कि ऐसा नहीं है गांव में पानी के कुएं नहीं हैं। वह कुएं की ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि आप जाकर किसी भी एक कुएं में झांक कर देख लीजिए। आपको पानी नहीं मिलेगा। जहां पर पानी के लिए महिलाओं ने लाइन लगाई है, उसी के पास में ही एक प्राइवेट कंपनी ने स्वच्छ पीने के पानी के लिए मशीन भी लगाई है। लेकिन गांव की महिलाएं कहती हैं कि यह महज दिखावा ही है। क्योंकि जब पीने के लिए घरों में पानी नहीं आता है, तो यहां पर पानी कहां उपलब्ध होगा। गांव के लोगों को उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव में जो सांसद चुने जाएंगे, वह संभव है कि उनकी वर्षों की इस समस्या का समाधान कर सकें।