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लोकसभा चुनाव: पवार परिवार की राजनीतिक रस्साकशी में उलझती विरासत की डोर

Wed, 13 Mar 2019 06:29 PM IST
Prabudhh Jain बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: Prabudhh Jain Updated Wed, 13 Mar 2019 06:29 PM IST
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Lok Sabha Chunav 2019: Story of Political feud in Sharad Pawar family
पवार के परिवार की राजनीतिक रस्साकशी - फोटो : Facebook/Supriya Sule
महाराष्ट्र में राजनीतिक रसूख वाले परिवारों में सत्ता का संघर्ष कोई नई बात नहीं है। ठाकरे और भोसले राजघराने के बाद अब शरद पवार के परिवार में सत्ता को लेकर कलह शुरू हो गई है। अजित पवार के बेटे पार्थ पवार को मावल लोकसभा सीट से टिकट मिलने की संभावनाओं से इसके संकेत मिलते हैं।
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राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार ने ऐलान किया है कि उन्होंने ये फैसला नई पीढ़ी के हाथ में राजनीति की बागडोर सौंपने के उद्देश्य से लिया है। शरद पवार के इस फैसले के बाद पवार परिवार के सदस्य रोहित राजेंद्र पवार ने फेसबुक पोस्ट लिखकर बताया है कि शरद पवार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
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रोहित पवार लिखते हैं, "पवार साहब के हर फैसले का हम आदर करते हैं लेकिन इस आदर से भी बड़ा प्रेम होता है जो कि मैं और मेरे जैसे तमाम कार्यकर्ता पवार साहब से करते हैं। इसीलिए हम कहना चाहते हैं कि पवार साहब को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।" 
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महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पवार के इस फैसले के बाद परिवार में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया है। बीबीसी ने इस परिवार में सत्ता को लेकर हुए संघर्ष के मायनों को समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार विजय चोरमारे से बात की है।

सत्ता को लेकर पारिवारिक कलह
विजय चोरमारे कहते हैं, "महाराष्ट्र की राजनीति में राजनीतिक रसूख वाले परिवारों में सत्ता संघर्ष होना कोई नई बात नहीं है। इसके उदाहरण ठाकरे, मुंडे और सतारा का भोसले राजघराना हैं। लेकिन किसी को ये उम्मीद नहीं थी कि पवार परिवार में ये संघर्ष शुरू होगा। मगर इस उम्मीदवारी की घोषणा के साथ ही पवार परिवार में सत्ता संघर्ष शुरू होता दिख रहा है।

"ये बात समझा जाना बहुत जरूरी है कि अजित पवार अब तक अपने चाचा शरद पवार की हर बात मानते आए हैं। लेकिन शरद पवार को अजित पवार के बेटे यानी पार्थ पवार की बात आखिरकार माननी पड़ी।"

वरिष्ठ पत्रकार राही भिड़े मानती हैं कि पार्थ पवार को उम्मीदवारी मिलने के पीछे पारिवारिक संघर्ष एक वजह हो सकती है। भिड़े कहती हैं, "अजित पवार अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि शरद पवार के राजनीतिक रूप से सक्रिय रहते ही ऐसा हो। ये संभव है कि पवार परिवार में इसके लिए दबाव बनाया जा रहा हो।''

वो कहती हैं, ''पार्थ भी महात्वाकांक्षी हैं और वो खुद को राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं। इसीलिए वो लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। वह काफी समय से इसकी तैयारी भी कर रहे थे। मावल लोकसभा सीट में भी पार्थ पवार का पार्टी कार्यकर्ताओं से बढ़िया तालमेल है।"

"ऐसा लगता है कि शरद पवार ने घरवालों के दबाव की वजह से पार्थ को आगे बढ़ाने का फैसला किया हो। शरद पवार ने ही इससे पहले मावल से पार्थ की उम्मीदवारी को नकारा था। लेकिन अब शरद पवार को खुद के फैसले से पीछे हटना पड़ा। इससे पता चलता है कि उन पर घरवालों का कितना दबाव है। वहीं, अजित पवार के समर्थक भी चाहते हैं कि मावल से पार्थ को उम्मीदवारी मिले। इसका मतलब ये हुआ कि अजित पवार को खुद ये लगता है कि उनका बेटा पार्थ राजनीति में आने के लिए तैयार है।"

रोहित और पार्थ के बीच प्रतिस्पर्धा
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, "पवार परिवार में युवाओं के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षा दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। क्योंकि अजित पवार ने कहा था कि पार्थ को राजनीति में नहीं आना चाहिए और शरद पवार ने भी कहा था कि उनके परिवार से अब कोई व्यक्ति राजनीति में शामिल नहीं होगा। लेकिन इसके बावजूद पार्थ को उम्मीदवारी मिलने की बात लगभग पक्की हो गई है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या पार्थ और रोहित के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है।"

स्थानीय पत्रकार मानते हैं कि दोनों भाइयों में किसी तरह की राजनीतिक रेस नहीं चल रही है। वहीं, नाम न बताने की शर्त पर एक पत्रकार कहते हैं, "पवार परिवार में आपसी रिश्ते बेहद मजबूत हैं। शरद पवार की बात कोई नहीं टालता है। ऐसे में शरद पवार ने मावल में जीत सुनिश्चित होने की वजह से ही उन्हें उम्मीदवारी दी है। इसके पीछे एक वजह ये थी कि अगर एक ही परिवार के ज्यादा लोग चुनाव लड़ें तो जनता में इससे गलत संदेश जाता है।''

इसी वजह से पवार ने खुद चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। पवार का मानना है कि चुनाव जीतने की क्षमता और जनाधार के आधार पर टिकटों का बंटवारा किया जाता है। ऐसा होने के बावजूद भी दिल्ली की राजनीति में पवार परिवार की सुप्रिया सुले, पार्थ पवार और शरद पवार (राज्य सभा से) तीन सदस्यों की मौजूदगी होगी। वहीं, महाराष्ट्र की विधानसभा में अजित पवार और रोहित पवार मौजूद होंगे।

कौन हैं रोहित पवार
शरद पवार के भाई अप्पा साहेब पवार के बेटे का नाम राजेंद्र पवार था। राजेंद्र भी राजनीति में आना चाहते थे लेकिन परिवार के एक सदस्य अजित पवार पहले ही राजनीति में आ चुके थे। ऐसे में उनका ये सपना अधूरा रह गया। इसके बावजूद राजेंद्र पवार ने बारामती एग्रो और शिक्षण संस्थाएं चलाकर समाज में अपना नाम हासिल किया। अब राजेंद्र के 31 साल के बेटे रोहित को राजनीति में दिलचस्पी है।

हाल ही में वह पुणे जिला परिषद के सदस्य बने हैं। स्थानीय पत्रकार मानते हैं कि रोहित विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। वह हडपसर या कर्जत-जामखेडची में से किसी एक विधानसभा से चुनाव लड़ सकते हैं।

लेकिन ये जंग नहीं आसां
एक सवाल ये है कि क्या पार्थ पवार मावल लोकसभा सीट से सिर्फ पवार उपनाम की वजह से चुनाव जीत जाएंगे। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि पार्थ की उम्मीदवारी से राष्ट्रवादी कांग्रेस को लाभ जरूर होगा। लेकिन पार्थ से पहले कई दिग्गज राजनेता इस सीट से चुनाव हार चुके हैं।

यहां के रायगड़ क्षेत्र में शेतकरी कामगार पक्ष का प्रभाव है। इस बार ये पक्ष चाहता है कि पार्थ पवार को टिकट मिले और अगर ऐसा हुआ तो ये पक्ष एनसीपी को अपना समर्थन देगा। लेकिन अगर ये हुआ तब भी ये एक कठिन चुनाव साबित होगा। इससे पहले उम्मीदवार एकतरफा जीत हासिल कर लेते थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। मावल के वर्तमान सांसद श्रीरंग बारणे का जनाधार काफी अच्छा है। इसलिए पार्थ पवार को उम्मीदवारी मिलने के बाद भी बारणे की हार की आशंका जताना गलत होगा।

वहीं, विजय चोरमारे का कहना है, "पार्थ पवार घराने से आते हैं। इसी वजह से इस चुनाव में दलबदल की संभावना कम होगी। इस लोकसभा सीट का माहौल देखें तो पार्थ पवार की उम्मीदवारी एनसीपी के लिए लाभदायक होगी। लेकिन यहां शिव सेना का नेटवर्क भी काफ़ी अच्छा है। इसीलिए अजीत पवार को अपने बेटे के लिए व्यक्तिगत स्तर पर मेहनत करनी होगी।"

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