पाटलिपुत्र: दांव पर लालू परिवार की साख, लेफ्ट के समर्थन से रामकृपाल को चुनौती देने की जुगत में मीसा
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बिहार की हॉट सीटों में से एक पाटलिपुत्र पर सबकी नजर है। यहां राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव की साख दांव पर है। यहां से उनकी बेटी मीसा भारती एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं, जिनका सामना मौजूदा भाजपा सांसद रामकृपाल यादव से है। कभी लालू प्रसाद के 'हनुमान' रहे रामकृपाल राजद छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे और पाटलिपुत्र से लालू की बेटी को हराकर भाजपा को जीत दिलाई थी। इसका इनाम उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाकर दिया गया।
चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद इस बार चुनावी प्रचार अभियान में अनुपस्थित हैं। पिछली बार बेटी के लिए उन्होंने खूब प्रचार किया था, बावजूद इसके मोदी लहर में रामकृपाल की ही नैया पार लगी थी, जबकि मीसा करीब चार फीसदी वोटों से हार गई थीं। इस बार तो लालू अपनी बेटी के लिए प्रचार भी नहीं कर पा रहे हैं। भाई तेजस्वी ने ही बहन मीसा के प्रचार का जिम्मा संभाल रखा है।
लालू भले ही चुनावी कैंपेन में नहीं हैं, लेकिन बेटी मीसा के लिए वह एक अहम दांव खेल चुके हैं। लालू प्रसाद के इस दांव के बारे में जानने से पहले एक बार पाटलिपुत्र लोकसभा सीट के इतिहास पर एक नजर डाल लिया जाए।
बिहार की राजधानी पटना जिला में पड़ने वाली पाटलिपुत्र लोकसभा सीट 2008 के बाद अस्तित्व में आई थी। 2008 तक पटना में सिर्फ एक लोकसभा सीट हुआ करती थी लेकिन परिसीमन के बाद यहां दो सीटें हो गईं- एक पाटलिपुत्र और दूसरी पटना साहिब। पाटलिपुत्र में लगभग 16.5 लाख मतदाता हैं, इनमें यादव और भूमिहार वोटों की संख्या करीब पांच-पांच लाख हैं।
विधानसभा सीटों का सियासी समीकरण
पाटलिपुत्र के तहत छह विधानसभा सीटे हैं- दानापुर, मनेर, फुलवारी, मसौढ़ी, पालीगंज और बिक्रम। इनमें से मसौढ़ी, पालीगंज और मनेर पर राजद का कब्जा है। बिक्रम में कांग्रेस के विधायक हैं, तो फुलवारी में जदयू के और दानापुर में भाजपा के। इस तरह छह में से चार महागठबंधन, जबकि दो एनडीए के वर्चस्व वाली विधानसभा सीटे हैं। देखा जाए तो पूरा इलाका आरजेडी का गढ़ है लेकिन लोकसभा में पिछली बार बीजेपी नेता रामकृपाल यादव जीत कर आए जो कभी राजद के बड़े नेता हुआ करते थे।
2009 में जदयू तो 2014 में भाजपा की जीत
इस सीट पर 2009 में जदयू के रंजन प्रसाद यादव जीते जबकि 2014 में बीजेपी के राम कृपाल यादव विजयी रहे। रामकृपाल यादव ने आरजेडी छोड़कर बीजेपी का दामन थामा और बड़ी जीत दर्ज की। रामकृपाल यादव को 39.16 फीसदी वोट मिले थे। उन्होंने राजद की मीसा भारती को हराया था। मीसा को 35.04 फीसदी वोट मिले थे। तीसरे स्थान पर जदयू के रंजन प्रसाद यादव रहे जिन्हें 97,228 वोट मिले। सीपीआईएमएल प्रत्याशी रामेश्वर प्रसाद को 51,623 वोट मिले थे। साल 2009 का मुकाबला दिलचस्प था क्योंकि जदयू के रंजन प्रसाद यादव ने लालू यादव को हराया था।
बेटी मीसा के लिए लालू का सियासी दांव
भाकपा माले के लिए राजद ने छोड़ी आरा लोकसभा सीट
महागठबंधन में हुए बंटवारे के अनुसार, आरा सीट राजद के खाते में है। राजद ने आरा लोकसभा सीट भाकपा माले के लिए छोड़ दी। सवाल उठे कि लालू यादव ने ये सीट माले के लिए क्यों छोड़ी? तो सबसे पहले बात करते हैं यहां से भाकपा माले के उम्मीदवार के बारे में। इस सीट से भाकपा माले ने राजू यादव को उम्मीदवार बनाया है। राजू यादव यहां से लोकसभा चुनाव पहले भी माले के टिकट पर लड़ चुके हैं। हालांकि पिछले चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। राजू यादव को संघर्षशील नेता के तौर पर जाना जाता है।
मीसा भारती की जीत के लिए राजद ने चला सियासी दांव!
राजू यादव की छवि को देखकर ही महागठबंधन ने यहां से अपना समर्थन दिया है। हालांकि सूत्र ये भी बता रहे हैं कि लालू यादव का इसमें सियासी खेल है। कहा जा रहा है कि पाटलिपुत्र से बेटी मीसा भारती की जीत के लिए लालू यादव ने आरा में भाकपा माले का समर्थन किया है, क्योंकि भाकपा माले ने भी पाटलिपुत्र लोकसभा सीट पर राजद प्रत्याशी मीसा भारती को समर्थन देने का एलान किया है। पाटलिपुत्र सीट पर पिछले चुनाव में भाकपा माले को जितने वोट मिले थे, उससे कम वोट से मीसा भारती चुनाव हारी थीं। वर्ष 2014 में भाजपा प्रत्याशी रामकृपाल यादव ने जीत दर्ज की थी। तब दूसरे स्थान पर रहीं राजद उम्मीदवार मीसा भारती करीब 40,000 वोट से हारी थीं। उससे ज्यादा करीब 51,000 वोट माले प्रत्याशी रामेश्वर प्रसाद को मिले थे।
एक तरह से देखा जाए तो राजद अपने इसी सियासी दांव की बदौलत मीसा की नैया पार कराने की जुगत में है। हालांकि भाजपा सांसद रामकृपाल ने भी पूरी ताकत झोंक दी है। इस सीट पर सबसे अंतिम चरण में 19 मई को मतदान होना है। ऐसे में दोनों के पास अभी बहुत ज्यादा वक्त नहीं है। पिछली बार हारीं मीसा हर हाल में यहां से जीत हासिल करना चाहती है, तो वहीं रामकृपाल के लिए सीट बचाना चुनौती है।