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लोकसभा चुनाव: अब तक नहीं चढ़ा चुनावी रंग, क्या भाजपा को खल रही है प्रशांत किशोर की कमी?
Mon, 22 Apr 2019 09:38 PM IST
Amit Digital
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: Amit Digital
Updated Mon, 22 Apr 2019 09:38 PM IST
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प्रशांत किशोर
23 अप्रैल मंगलवार को तीसरे चरण में 116 सीटों पर मतदान के साथ ही लोकसभा चुनाव 2019 की आधी से अधिक सीटों पर वोटिंग प्रक्रिया समाप्त हो जायेगी। इसके बाद भी इस चुनाव में वह चुनावी खुमार देखने को नहीं मिला है जिसकी लोगों को उम्मीद थी। तमाम प्रचार तंत्र के इस्तेमाल के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में भी पिछले चुनाव जैसा आकर्षण नहीं दिख रहा है। और इन सबके बीच वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के हीरो प्रशांत किशोर उर्फ पीके पूरी तरह खबरों से गायब हैं। यह किस ओर इशारा कर रहा है और इसके क्या मायने निकल सकते हैं? और क्या भाजपा को पीके की कमी महसूस हो रही है?
बदल रहा है प्रचार का तरीका
दिल्ली भाजपा आईटी सेल के प्रमुख पुनीत अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि इस चुनाव में विपक्ष बहुत ढीला दिखा है।उनकी प्रचार रणनीति में अब तक कोई आक्रामकता नहीं दिखी है। नेता की कमी और मुद्दों पर बैकफुट पर होना इसकी बड़ी वजह हो सकती है। इसकी वजह से प्रचार में अपेक्षाकृत तेजी नहीं दिखी है। अग्रवाल के मुताबिक पहले-दूसरे चरण में तो केवल प्रधानमंत्री मोदी की प्रचार रैलियां ही चर्चा में रही हैं। इसके आलावा दिल्ली में नामांकन में देरी से भी चुनावी रंग कुछ फीका रहा है। लेकिन आज से नामांकन के बाद चुनाव में खूब तेजी आएगी।
आईटी विशेषज्ञ पुनीत अग्रवाल ने यह स्वीकार किया कि सोशल मीडिया ने चुनाव प्रचार की विधा को एक नई ऊंचाई दी है। अब चुनाव सड़कों पर कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा आक्रामक हुआ है। यहां वोटर खूब खुलकर बोल रहा है और अपनी राय भी रख रहा है। कहा जा सकता है कि चुनाव प्रचार रैलियों से निकलकर सोशल मीडिया के मैदान में उतर आया है।
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पुनीत बताते हैं कि पिछली बार हमें खुद को स्थापित करना था, इसलिए बड़े प्रचार अभियान की आवश्यकता थी। जबकि इस बार पूरे पांच साल केंद्र सरकार के कामकाज से हम जनता के बीच ही रहे हैं। ऐसे में अब हमें उतनी आक्रामक रणनीति के प्रचार की आवश्यकता भी नहीं है। हमें केवल जनता को अपने काम याद दिलाने हैं जो हम अपने अनेक कार्यक्रमों से कर रहे हैं। इसके आलावा दिल्ली में सोमवार को नामांकन होने से चुनावी रंग तेजी के साथ चढ़ने की उम्मीद है।
क्या भाजपा को खल रही है पीके की कमी?
पिछले चुनाव में थ्री-डी तकनीकी से रैली और चाय पे चर्चा जैसे आकर्षक कार्यक्रम तैयार कर प्रशांत किशोर ने भाजपा के चुनाव प्रचार को एक नये स्तर पर पहुंचा दिया था। इस बार वैसी कोई गर्मी महसूस नहीं की जा रही है। तो क्या भाजपा को पीके की कमी महसूस हो रही है?
इस सवाल पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि प्रशांत किशोर जैसे चुनावी रणनीतिकार अपनी प्रचार शैली से जनता में कुछ आकर्षण अवश्य पैदा करते हैं, लेकिन सिर्फ उनकी वजह से कोई चुनाव जीता जा सकता है, ऐसा बिलकुल भी नहीं है। पीके मॉडल पश्चिमी देशों में तो सफल हो सकता है जहां समाज बहुत कम वर्गों में विभक्त है लेकिन भारत जैसे देश में जहाँ हजारों जातियों, क्षेत्रों और धर्मों का खयाल रखना पड़ता है, वहां ऐसे मॉडल सफल नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय कांग्रेस-सपा की सरकार होती जिसका प्रचार पीके ने किया था।
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बदल रहा है प्रचार का तरीका
दिल्ली भाजपा आईटी सेल के प्रमुख पुनीत अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि इस चुनाव में विपक्ष बहुत ढीला दिखा है।उनकी प्रचार रणनीति में अब तक कोई आक्रामकता नहीं दिखी है। नेता की कमी और मुद्दों पर बैकफुट पर होना इसकी बड़ी वजह हो सकती है। इसकी वजह से प्रचार में अपेक्षाकृत तेजी नहीं दिखी है। अग्रवाल के मुताबिक पहले-दूसरे चरण में तो केवल प्रधानमंत्री मोदी की प्रचार रैलियां ही चर्चा में रही हैं। इसके आलावा दिल्ली में नामांकन में देरी से भी चुनावी रंग कुछ फीका रहा है। लेकिन आज से नामांकन के बाद चुनाव में खूब तेजी आएगी।
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आईटी विशेषज्ञ पुनीत अग्रवाल ने यह स्वीकार किया कि सोशल मीडिया ने चुनाव प्रचार की विधा को एक नई ऊंचाई दी है। अब चुनाव सड़कों पर कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा आक्रामक हुआ है। यहां वोटर खूब खुलकर बोल रहा है और अपनी राय भी रख रहा है। कहा जा सकता है कि चुनाव प्रचार रैलियों से निकलकर सोशल मीडिया के मैदान में उतर आया है।
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पुनीत बताते हैं कि पिछली बार हमें खुद को स्थापित करना था, इसलिए बड़े प्रचार अभियान की आवश्यकता थी। जबकि इस बार पूरे पांच साल केंद्र सरकार के कामकाज से हम जनता के बीच ही रहे हैं। ऐसे में अब हमें उतनी आक्रामक रणनीति के प्रचार की आवश्यकता भी नहीं है। हमें केवल जनता को अपने काम याद दिलाने हैं जो हम अपने अनेक कार्यक्रमों से कर रहे हैं। इसके आलावा दिल्ली में सोमवार को नामांकन होने से चुनावी रंग तेजी के साथ चढ़ने की उम्मीद है।
क्या भाजपा को खल रही है पीके की कमी?
पिछले चुनाव में थ्री-डी तकनीकी से रैली और चाय पे चर्चा जैसे आकर्षक कार्यक्रम तैयार कर प्रशांत किशोर ने भाजपा के चुनाव प्रचार को एक नये स्तर पर पहुंचा दिया था। इस बार वैसी कोई गर्मी महसूस नहीं की जा रही है। तो क्या भाजपा को पीके की कमी महसूस हो रही है?
इस सवाल पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि प्रशांत किशोर जैसे चुनावी रणनीतिकार अपनी प्रचार शैली से जनता में कुछ आकर्षण अवश्य पैदा करते हैं, लेकिन सिर्फ उनकी वजह से कोई चुनाव जीता जा सकता है, ऐसा बिलकुल भी नहीं है। पीके मॉडल पश्चिमी देशों में तो सफल हो सकता है जहां समाज बहुत कम वर्गों में विभक्त है लेकिन भारत जैसे देश में जहाँ हजारों जातियों, क्षेत्रों और धर्मों का खयाल रखना पड़ता है, वहां ऐसे मॉडल सफल नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय कांग्रेस-सपा की सरकार होती जिसका प्रचार पीके ने किया था।
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