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भोपाल में दिग्विजय की सोशल इंजीनियरिंग से टकराएगा साध्वी प्रज्ञा का इतिहास

Wed, 17 Apr 2019 09:35 PM IST
Abhishek Singh शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhishek Singh Updated Wed, 17 Apr 2019 09:35 PM IST
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Lok Sabha Chunav 2019: Close fight on Bhopal seat,  Sadhvi Pragya infront of Digvijaya Singh
दिग्विजय सिंह-साध्वी प्रज्ञा (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media

भोपाल की लोकभा सीट पर बहुत रोचक मुकाबला होने जा रहा है। कांग्रेस पार्टी ने राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले इंजीनियर डिग्रीधारी दिगग्विजय सिंह को टिकट दिया है तो भाजपा ने जवाब में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उतारा है। प्रज्ञा सिंह ठाकुर मालेगांव विस्फोट मामले की आरोपी हैं और सबूतों के अभाव में अप्रैल 2017 से जमानत पर हैं। दिलचस्प यह है कि इंजीनियर दिग्विजय के मुकाबले में उतरी प्रज्ञा इतिहास की विद्यार्थी रही हैं और लोकसभा चुनाव 2019 में दिग्विजय को उनका इतिहास भी जोरदार चुनौती देगा।

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राजनीति के घुटे खिलाड़ी हैं दिग्विजय सिंह


72 साल के दिग्विजय सिंह राजनीति के घुटे खिलाड़ी हैं। काफी होमवर्क के साथ बारीक राजनीति करते हैं। इसे उनका राजनीतिक करियर खुद बयां करता है। 1971 में राघोगढ़ नगरपालिका अध्यक्ष दिग्विजय सिंह देखते-देखते 1980 में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की कैबिनेट के प्रभावी मंत्री और फिर 1993-2003 तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वहां से दिल्ली आए तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी के विश्वस्त सलाहकार में जाने गए। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनवाने से लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ की ताजपोशी तक में दिग्विजय सिंह का बड़ा हाथ माना जाता है। कहा जाता है कि तोड़ने, जोड़ने, विपरीत हालात में सब कुछ पाले में कर लेने की कला दिग्विजय सिंह को आती है।

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कट्टर हिन्दुत्व का चेहरा हैं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर

राजनीति में नई हैं, लेकिन भाजपा के लिए हिन्दुत्व का चेहरा हैं। प्रज्ञा सिंह ठाकुर के पिता भी आरएसएस से जुड़े और एक आयुर्वेदिक डाक्टर थे। वह चंबल के भिंड में पली बढ़ी, इतिहास की विद्यार्थी रही हैं। कालेज के जमाने से अखिल विद्यार्थी परिषद की सदस्य रही हैं। 2002 में जय वंदेमातरम जन कल्याण समिति बनाने वाली प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने बाद में राष्ट्रीय जागरण मंच भी बनाया था। नेताओं और राजनीति में गहरा प्रभाव रखने वाले स्वामी अवधेशानंद गिरी के संपर्क में आने के बाद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने नया आकार ले लिया था। 

वह विश्व हिन्दू परिषद की दुर्गा वाहिनी सक्रिय सदस्य थी और मालेगांव विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार होने तथा सबूत के अभाव जमानत मिलने के बाद अब वह एक कट्टर हिन्दुत्व का चेहरा है। ऐसा चेहरा भोपाल की लोकसभा सीट के लिए फिट बैठता है। माना यह भी जा रहा है कि भाजपा यह पूरी राजनीतिक लड़ाई अपने तीन बार के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान के कंधे और प्रज्ञा सिंह ठाकुर के चेहरे पर लड़ेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा बस एक उत्प्रेरक का काम करेगा।

लोहे चने चबा सकते हैं दिग्विजय सिंह

दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री कमलनाथ की सलाह पर भोपाल सीट से ताल ठोंक रहे हैं। 1984 तक भोपाल सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी केएन प्रधान और उससे पहले 1980 में शंकर दयाल शर्मा सांसद बने हैं। लेकिन 1989 में भाजपा ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली और तब से अभी तक उसके पास है। 1989-98 तक चार बार भाजपा के सुशील चंद्र शर्मा ने, 1999 में उमा भारती, 2004 और 2009 में कैलाश जोशी ने यहां जीत हासिल किया। 

2014 में आलोक संजर ने 3.70 लाख से  विजय विजयी हुए। इतना ही नहीं पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भोपाल लोकसभा सीट के तहत आने वाली आठ विधानसभा सीटों में से पांच पर भाजपा को जीत मिली है। कांग्रेस तीन सीट जीतने में सफल रही, लेकिन आठ विधानसभा सीटों में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले 63 हजार वोट अधिक मिले हैं। ऐसे में वोटों के लिहाज से भाजपा का पलड़ा भारी है और साध्वी प्रज्ञा को आसान सी विजयश्री मिल सकती है।

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वोट का ध्रुवीकरण रहेगा मुख्य एजेंडे में

भाजपा का मुख्य एजेंडा वोट का ध्रुवीकरण हो सकता है। प्रज्ञा सिंह ठाकुर इसके लिए भोपाल से काफी उपयुक्त उम्मीदवार हैं। इसका असर मध्य प्रदेश के साथ-साथ अन्य राज्य के चुनाव पर भी पड़ सकता है। वैसे भी भोपाल को नवाबों का शहर कहा जाता है। एक अलग परंपरा और ठसक भरी जिंदगी का शहर है। भोपाल की सात विधानसभा में 19 लाख, 07 हजार मतदाता हैं। आठवीं सिहोर विधानसभा सीट में करीब दो लाख मतदाता हैं। 

इस तरह से भोपाल लोकसभा सीट के कुल मतदाताओं की संख्या 21 लाख से अधिक है। इसमें करीब 37 हजार मतदाता 18-19 साल के हैं और पहली बार मतदान करेंगे। पांच लाख 37 हजार मतदाता 30-39 साल के हैं। अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 4.5 लाख है। इस तरह से भोपाल में युवा मतदाता भी काफी संख्या में है। यह संख्या भी साध्वी प्रज्ञा सिंह के हित में अधिक और दिग्विजय के पक्ष में कम जा रहा है।  

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