लॉकडाउन में शराब, तलब और मनोरंजन की कहानी, किसे जीवित रखने के लिए गुलजार हुए शराब के ठेके
- मेडिकल साइंस में लोगों की यह लाइन 'तलब' का हिस्सा होती है
- चालीस दिन के लॉकडाउन के बाद भी लोगों में नहीं छूटी शराब की लत
- इस दौरान लोग सोशल डिस्टेंसिंग को भूले, कई जगह पुलिस की सख्ताई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
महज कुछ ही देर में लंबी-लंबी लाइनों के साथ शराब के ठेके गुलजार हो गए। मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के डॉक्टर ओमप्रकाश कहते हैं, मेडिकल साइंस में लोगों की यह लाइन 'तलब' का हिस्सा होती है।
लॉकडाउन में इस तलब के साथ एक डर भी रहा है। वह था कि कहीं लॉकडाउन और आगे सरक गया तो क्या होगा। इसी डर के चलते ठेकों के बाहर लोगों की लंबी कतारें लग गई। अधिकांश व्यक्ति कई दिन का स्टॉक लेने की फिराक में रहे।
अमर उजाला डॉट कॉम के साथ एक खास बातचीत में डॉक्टर ओमप्रकाश ने बताया, आप किसी भी सभ्यता को देख लें, शराब 'मनोरंजन' का एक बड़ा जरिया रही है। बहुत से लोग तंबाकू और बीड़ी को भी नशे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
अपने देश में तो यही नशे सर्वाधिक किए जाते हैं। अनेक लोग इन्हें मनोरंजन का साधन भी मानते हैं। अब लॉकडाउन में ये सारे एक साथ नशे बंद हो गए। लॉकडाउन 2.0 के दौरान भी कई जगहों पर शराब की दुकानें खोलने की मांग उठी थी।
लॉकडाउन 3.0 में जब पहले दिन शराब की दुकानें खोली गईं, तो वहां सोशल डिस्टेंसिंग के सारे नियम टूट गए। अगर किसी को लॉकडाउन की अवधि में शराब छोड़नी होती, तो वह कब का छोड़ चुका होता।
मेडिकल साइंस में इसके लिए दस दिन का इलाज बताया गया है। अब लॉकडाउन में तो लोगों को चालीस दिन हो गए हैं, लेकिन उनकी तलब शांत नहीं हो सकी। नतीजा, वे ठेके खुलने के पहले ही दिन ही शराब लेने वालों की कतार में लग गए।
ये डर भी तो लगा है कि कहीं दोबारा से तलब को दबाना पड़ गया तो...
शराब पीने वाले लोगों के व्यवहार को लेकर डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि अब लोगों को यह भरोसा नहीं है कि लॉकडाउन आगे नहीं बढ़ेगा। ये छूट आगे भी जारी रहेगी या नहीं। इन सबके चक्कर में लोग कई दिनों का स्टॉक जमा करने के लिए ठेकों पर पहुंच गए।
इसी वजह से सोशल डिस्टेंसिंग का चक्र भी टूटता नजर आया। इन लाइनों में जो लोग खड़े हैं, उनमें से ज्यादातर शराब के नॉमर्ल यूजर्स हैं। यही वो समुदाय है, जो शराब को तलब और मनोरंजन के तौर पर इस्तेमाल करता है।
दूसरे वे लोग हैं जो किसी शारीरिक समस्या के चलते इस पर निर्भर हैं। शराब मिलते ही वे चुप बैठ जाते हैं। तीसरी श्रेणी में वे लोग शामिल हैं, जो पूरी तरह शराब पर निर्भर रहते हैं। यानी ये लोग शराब को एक इलाज की तरह लेते हैं।
अगर इन्हें यह नहीं मिलती तो वे खुद को नुकसान तक पहुंचा सकते हैं। देश की कुल आबादी का करीब 10 फीसदी हिस्सा ऐसे लोगों का है।