22वां विधि आयोग निबटाए समान नागरिक संहिता का मामला: विधि आयोग
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कार्यकाल के आखिरी दिन 21वें विधि आयोग ने पारिवारिक कानून में सुधार की जरूरत पर बल देते हुए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को खारिज कर दिया है। विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर अपनी समग्र रिपोर्ट देने से बचते हुए पारिवारिक कानून में सुधार का परामर्श पत्र जारी किया है।
आयोग ने कहा है कि समान नागरिक संहिता एक व्यापक विषय है। इसे अभी परखा नहीं गया है, इसलिए आयोग अपने दो वर्ष के गहन शोध, परामर्श और परिचर्चा के आधार पर पारिवारिक कानून में सुधार की जरूरत पर बल देता है। समान नागरिक संहिता की अंतिम रिपोर्ट का जिम्मा अगले(22वें) वित्त आयोग पर डालते हुए आयोग ने कहा कि अभी न तो इसकी (समान नागरिक संहिता)आवश्यकता है और न ही यह वांछनीय है।
तीन तलाक पर नये कानून की जरूरत नहीं
विधि आयोग ने परामर्श पत्र में तीन तलाक की तुलना सती प्रथा, दासता, देवदासी और दहेज प्रथा के साथ की है। हालांकि तीन तलाक पर किसी नये कानून की जरूरत पर कोई जोर नहीं दिया है। अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जस्टिस बीएस चौहान की आध्यक्षता वाले आयोग की इस मामले में भी सिफारिश पारिवारिक कानून में सुधार जैसी ही है।
गौरतलब है कि तीन तलाक को उच्चतम न्यायालय ने पहले गैर कानूनी करार दिया है। एक साथ तीन बार देने का विवाह की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एक तरफा तलाक को घरेलू हिंसा अधिनियम, महिलाओं के प्रति क्रूरता, उत्पीडऩ और भारतीय दंड संहिता की धारा 498 के तहत रखा गया है। विधि आयोग से इससे पूरी तरह से सहमति जताई है।
चरणबद्ध हो पारिवारिक कानून में सुधार
विधि आयोग के अनुसार पारिवारिक कानून में चरण बद्ध तरीके से सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। इसी के साथ आयोग ने धार्मिक रीति रिवाजों और मौलिक अधिकारों के बीच में सद्भाव तथा समन्वय बनाए रखने पर जोर दिया।
विधि आयोग की इस आखिरी बैठक में बिना गलती के तलाक, भरण-पोषण, गुजारा-भत्ता तथा विवाह सहमति की उम्र में अनिश्चितता के नए आयामों पर चर्चा की। इस परामर्श पत्र में मुसलमानों में प्रचलित संविदात्मक विवाह को महिलाओं के हित में बताया गया है। यह परामर्श रिपोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के निकाहनामा मॉड़ल और जीनतशौकत अली द्वारा लिखित भारत में विवाह और तलाक पुस्तक का समर्थन करती है।
बहुविवाह अपराधः
यह मामला उच्चतम अदालत में विचारधीन है। इसलिए विधि आयोग ने इस पर कोई सिफारिश नहीं की है, लेकिन बहु विवाह को अपराध माना है। इसके लिए तमाम मुस्लिम देशों का उदाहरण दिया गया है। मसलन पाकिस्तान में पहली पत्नी की रजामंदी के बगैर मुसलमान दूसरी शादी नहीं कर सकता। वहां अपराध माना गया है। दूसरे मुस्लिम देशों में भी बहु विवाह के खिलाफ सख्त कानून हैं। फिलवक्त आयोग ने इस मसले को अदालत के रुख पर छोड़ दिया है।
अवैध बच्चों के लिए बने धर्म निरपेक्ष कानून
विधि आयोग ने सभी धर्मों के अवैध बच्चों के लिए संसद से धर्म निरपेक्ष कानून बनाने की सिफारिश की है। ताकि इन बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो सके। उन्हें उनका मौलिक अधिकार मिल सके। विधि आयोग के अनुसार इन्हें माता-पिता की अधिगृहीत संपत्ति में विरासत की तरह मिलने वाले अधिकारों से युक्त किए जाने की जरूरत है।
विवाह अधिनियम 1954 में बदलाव हो
विधि आयोग ने 1954 में बने विवाह अधिनियम में बदलाव की सिफारिश की है। आयोग अब इस अधिनियम के सभी प्रावधानों को प्रासंगिक नहीं मानता। आयोग के अनुसार इस अधिनियम में विवाह वैध होने से पहले विवाह करने वाले माता-पिता या जोड़े को दिया जाने वाला 30 दिन का समय दिया जाना गलत परंपरा को बढ़ावा दे रहा है। इसके दुरुपयोग की काफी शिकायते हैं। आयोग का कहना है कि इस 30 दिन के खंड को हटा दिया जाना चाहिए या फिर विवाह करने वाले जोड़े को सुरक्षा दी जानी चाहिए।