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लद्दाख का एजेंडा हुआ हाईजैक?: सिविल सोसायटी ने लेह एपेक्स बॉडी और केडीए पर लगाए आरोप, कहा- खुद बदल रहे शर्तें

Thu, 22 Oct 2026 07:39 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Thu, 22 Oct 2026 07:39 PM IST
सार

लद्दाख सिविल सोसायटी फोरम ने लेह एपेक्स बॉडी और केडीए पर आरोप लगाया है कि वे अपनी शर्तें बदलकर क्षेत्र के मूल एजेंडे को कमजोर कर रहे हैं। फोरम ने आठ जिलों में पंचायत और एलएएचडीसी चुनाव कराने की मांग की है। आखिर लद्दाख की बातचीत में विवाद क्यों बढ़ रहा है? क्या स्थानीय चुनाव जमीन, नौकरियों और संस्कृति की सुरक्षा का रास्ता खोल सकते हैं? केंद्र सरकार अब क्या कदम उठाएगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Ladakh Civil Society Forum Leh Apex Body KDA dispute on autonomous hill council elections Home Ministry meet
क्या लद्दाख के मूल मुद्दे पीछे छूट रहे हैं? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

लद्दाख में जमीन, नौकरियों, संस्कृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चल रही बातचीत को लेकर विवाद गहरा गया है। लद्दाख सिविल सोसायटी फोरम ने लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) पर आरोप लगाया है कि उन्होंने क्षेत्र के मूल एजेंडे को हाईजैक कर लिया है और अपनी शर्तें बार-बार बदल रहे हैं। फोरम का कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत किसी ठोस नतीजे तक पहुंचने के बजाय टकराव की ओर बढ़ रही है। संगठन ने तत्काल पंचायत और लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) के चुनाव कराने की मांग की है।

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सिविल सोसायटी ने दोनों संगठनों पर क्या आरोप लगाए?
लद्दाख सिविल सोसायटी फोरम में धार्मिक प्रमुख, बुद्धिजीवी, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी और क्षेत्र के पूर्व व वर्तमान जनप्रतिनिधि शामिल हैं। फोरम के प्रतिनिधियों ने गुरुवार को लेह में कहा कि केंद्र सरकार के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी है और कई मुद्दों पर सहमति भी बनी थी। इसके बावजूद लेह एपेक्स बॉडी और केडीए पर बार-बार शर्तें बदलने और बातचीत टालने का आरोप लगाया गया है। फोरम के मुताबिक, इससे दोनों पक्षों के बीच भरोसा कमजोर हुआ है। सदस्यों ने कहा कि लद्दाख के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत को आगे बढ़ाना जरूरी है। फोरम ने इस पूरी प्रक्रिया पर चिंता जताते हुए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया।
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क्या लद्दाख के मूल मुद्दों से ध्यान हट रहा है?
फोरम का आरोप है कि लद्दाख की जमीन, नौकरियों, संस्कृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधानों की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब अपने मूल रास्ते से भटक रहा है। सदस्यों ने कहा कि बातचीत में सोनम वांगचुक और केडीए का दबदबा बढ़ने से अलग-अलग जिलों और बौद्ध समुदाय के वास्तविक हितों की अनदेखी हो रही है। उनके अनुसार, बातचीत का उद्देश्य केंद्र सरकार के साथ सौहार्दपूर्ण समाधान निकालना था, लेकिन अब इसे टकराव की प्रक्रिया में बदल दिया गया है। फोरम ने कहा कि लद्दाख की अलग-अलग आबादी और समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखे बिना कोई समाधान सभी को स्वीकार्य नहीं होगा।
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फोरम ने तत्काल समाधान के तौर पर क्या मांग रखी?
लद्दाख सिविल सोसायटी फोरम ने कहा कि पूर्ण संवैधानिक सुरक्षा और केंद्रशासित प्रदेश स्तर पर लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्थान बनाने की प्रक्रिया में समय लग सकता है। इसके लिए विस्तृत मसौदा तैयार करने और संसदीय प्रक्रिया की जरूरत होगी। लेकिन लोगों को वर्षों तक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बिना नहीं छोड़ा जा सकता। फोरम ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर पंचायत चुनाव कराने और सभी आठ जिलों में एलएएचडीसी चुनाव तत्काल घोषित करने की मांग की है।

  • आठ जिले... लेह, करगिल, नुब्रा, शाम, चांगथांग, जंस्कार, द्रास और सांकू।
  • चुनाव की मांग... पंचायतों के साथ सभी आठ जिलों में एलएएचडीसी चुनाव।
  • सुरक्षा का उद्देश्य... जमीन, संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों, व्यापार, नौकरियों, पर्यटन और खनन लाइसेंसों से जुड़े हितों की रक्षा।


फोरम का कहना है कि चुनी हुई परिषदों को अधिक अधिकार देकर स्थानीय जरूरतों के अनुसार फैसले लेने की व्यवस्था की जा सकती है।

अलग-अलग जिलों के लिए अलग परिषदें क्यों जरूरी बताई गईं?
फोरम के अनुसार, लद्दाख के हर जिले की अपनी अलग जातीय, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान है। उदाहरण के तौर पर धा-हानु के ब्रोकपा, चांगथांग के चांगपा, जंस्कार के बौद्ध और द्रास के शीना समुदाय की जरूरतें अलग-अलग हैं। सदस्यों का कहना है कि केवल लेह या करगिल पर केंद्रित कोई संस्था इन सभी समुदायों के हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं कर सकती। फोरम ने दावा किया कि एलएएचडीसी पहले से स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं और इन्हें आठ जिलों तक विस्तारित करने के लिए एलएएचडीसी अधिनियम में संशोधन की जरूरत होगी। उसने यह भी कहा कि पिछले छह वर्षों से पंचायतें नहीं होने के कारण गांवों में विकास कार्य, मनरेगा और फंड से जुड़े काम प्रभावित हुए हैं। फोरम ने अनुच्छेद 371 जैसे प्रावधानों के तहत सुरक्षा और परिषदों को अधिक अधिकार देने की मांग भी रखी है।



लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बहाल करने के लिए क्या सुझाव दिए गए?
फोरम ने कहा कि चुनाव से वास्तविक जनप्रतिनिधि सामने आएंगे और भविष्य में केंद्र सरकार के साथ बातचीत के लिए अधिक भरोसेमंद प्रतिनिधि मिल सकेंगे। उसने लेह एपेक्स बॉडी के पुनर्गठन की मांग करते हुए कहा कि इसमें सभी संबंधित जिलों के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधि शामिल होने चाहिए। फोरम के मुताबिक, इसमें मठों, महिलाओं, आदिवासी समुदायों, युवाओं और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले खानाबदोश समुदायों को भी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संगठन ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री से अपील की कि संवैधानिक समझौता होने तक पंचायत और एलएएचडीसी चुनाव कराए जाएं तथा स्थानीय संस्थाओं को अधिक शक्तियां दी जाएं।

गृह मंत्रालय की बैठक पर सोनम वांगचुक और थुपस्तान छेवांग ने क्या कहा?
सोनम वांगचुक ने कहा कि लद्दाख के मुद्दों पर गुरुवार को गृह मंत्रालय में बैठक होनी थी, लेकिन यह नहीं हो सकी। उन्होंने केंद्र सरकार पर वादे से पीछे हटने का आरोप लगाया और कहा कि वह दिल्ली पहुंचकर लद्दाख भवन में क्षेत्र के लोगों की समस्याएं सामने रखेंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र जल्द बैठक आयोजित करेगा। दूसरी ओर, लद्दाख के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता थुपस्तान छेवांग ने कहा था कि 9 सितंबर को गृह मंत्रालय में लेह एपेक्स बॉडी और केडीए के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक सकारात्मक रही थी। उन्होंने निराशा जताई कि बैठक में हुई सकारात्मक चर्चा और सहमति वाले मुद्दों को जनता के सामने ठीक से नहीं रखा गया। उनके अनुसार, इसके बजाय राष्ट्रीय और सोशल मीडिया में बातचीत में प्रगति नहीं होने की बातें सामने आईं। इस तरह लद्दाख में बातचीत की दिशा, प्रतिनिधित्व और स्थानीय चुनावों को लेकर अलग-अलग पक्षों के बीच मतभेद सामने आए हैं।

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