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कुरुक्षेत्र: आने वाले विधानसभा चुनावों में बजट होगा विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार, भाजपा के सामने भी चुनौतियां

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Sun, 28 Jul 2024 05:55 AM IST
सार

18वीं लोकसभा का गठन होने के बाद केंद्र की NDA सरकार ने बजट 2024 भी पेश कर दिया है। माना जा रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में बजट ही विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार होगा। दूसरी तरफ भाजपा के सामने हिंदुत्व और पिछड़ा कार्ड दोनों को साधने की चुनौती है।

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Kurukshetra Budget 2024 biggest weapon of opposition in upcoming assembly elections BJP also facing challenges
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस प्रमुख खरगे और पीएम मोदी के साथ नड्डा (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनावों के नतीजों ने भले ही विपक्षी इंडिया गठबंधन का उत्साह बढ़ा दिया हो लेकिन सत्ता पक्ष भी अब उस झटके से उबर चुका है जो नतीजों ने उसे जो झटका दिया था सरकार बनने के बाद सत्ता के टॉनिक ने उस घाव को कुछ भर दिया है।लेकिन पक्ष विपक्ष का सियासी संग्राम अभी जारी है। अक्तूबर में होने वाले महाराष्ट्र और हरियाणा और शायद झारखंड भी के विधानसभा चुनावों की गोलबंदी शुरु हो गई है। केंद्रीय बजट को लेकर संसद में विपक्ष के आक्रामक तेवर बता रहे हैं कि इन विधानसभा चुनावों में बजट सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बड़ा मुद्दा होगा। उधर भाजपा के सामने बाहर विपक्ष की लामबंदी और पार्टी के भीतर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ बनाम केशव प्रसाद मौर्य बृजेश पाठक की खेमेबंदी से निबटने की दोहरी चुनौती है। योगी के हिंदुत्व और केशव के पिछड़े कार्ड को एक साथ साधे रखने की कोशिश में भाजपा नेतृत्व जुटा हुआ है।

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जिस तरह राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मल्लिकार्जुन खरगे और अभिषेक बनर्जी ने बजट में आंध्र प्रदेश और बिहार के सिवा अन्य सभी राज्यों की उपेक्षा और अनदेखी का आरोप लगाया है उससे साफ संकेत है कि बजट विधानसभा चुनावों में विपक्ष का वैसा ही हथियार होगा जैसा कि उसने लोकसभा चुनावों के दौरान संविधान को बनाया था। सत्ता पक्ष भी इसे भांप चुका है इसलिए उसने इससे निबटने की तैयारी भी शुरु कर दी है।
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संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2024-25 का केंद्रीय बजट पेश किया जिसमें आंध्र प्रदेश और बिहार को कुल मिलाकर करीब 75 हजार करोड़ रुपए की विशेष सहायता और अनेक परियोजनाओं की घोषणा की गई। इसका जहां आंध्र और बिहार के सांसदों ने जबर्दस्त स्वागत किया वहीं नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इसे कुर्सी बचाओ बजट कहा तो समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के साथ उपेक्षा का आरोप लगाया। राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि बजट में बिहार और आंध्र प्रदेश की प्लेट में तो पकौड़े और जलेबियां परोसी गईं हैं जबकि अन्य राज्यों की प्लेटें खाली हैं।तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा में कहा कि बजट में प.बंगाल की पूरी तरह अनदेखी की गई है। शिवेसना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र को बजट में कुछ भी न देने मुद्दा उठा दिया है।इसी तरह हरियाणा के कांग्रेस नेताओं ने भी अपने राज्य के लिए बजट में कुछ भी न होने की बात कही है। मीडिया में कुछ इसी तरह की ध्वनि सुनाई दी कि ये भाजपा सरकार या मोदी सरकार का नहीं एनडीए गठबंधन की सरकार का बजट है जिसमें बिहार और आंध्र प्रदेश के उन सहयोगी दलों का जिनके समर्थन पर केंद्र सरकार टिकी है,अपने अपने राज्यों के लिए जो दबाव बनाया है उसका प्रभाव बजट में साफ दिखता है।एक जाने माने अखबार ने तो बजट की खबर का शीर्षक ही दे दिया सरकार के समर्थन मूल्य का बजट।
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लोकसभा में बजट पर चर्चा के दौरान विपक्ष के हर वक्ता ने बजट में दो राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया।राहुल गांधी लगातार बजट पर यह कहते हुए हमलावर हैं कि ये सिर्फ सरकार  बचाने  के लिए सहयोगियों को खुश करने वाला बजट है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल बजट को हरियाणा महाराष्ट्र झारखंड में चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में हैं तो अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में होने वाले दस विधानसभा सीटों के उपचुनावों में इसे भाजपा के खिलाफ प्रदेश की अनदेखी का मुद्दा बनाकर इसे भुनाना चाहता हैं। भाजपा ने इसे समझ लिया है इसलिए एक तरफ जहां भाजपा नेता बजट के अन्य प्रावधानों का बार बार उल्लेख कर रहे हैं जिनमें अन्य राज्यों के लिए आवंटित धनराशि को बताते हुए विपक्ष के आरोपों की धार कमजोर करने की रणनीति पर हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाल लिया है।

आने वाले विधानसभा चुनावों में बजट आवंटन को  केंद्रीय मुद्दा बनाने के लिए ही विपक्ष शासित राज्यों के सभी मुख्यमंत्रियों ने सरकार के  थिंक टैंक नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार कर दिया। सिर्फ प.बंगाल की ममता बनर्जी बैठक में गईं जरूर लेकिन उन्होंने भी खुद को कम समय देने और माईक बंद किए जाने का आरोप लगाकर बैठक से बहिर्गमन कर दिया। ममता ने इसे बंगाल का अपमान बताते हुए कहा कि वह बंगाल का अपमान कभी नहीं होने देंगी। ममता के साथ पूरा विपक्षी इंडिया गठबंधन एकजुट होकर खड़ा हो गया। सरकार पर अपना दबाव बढ़ाने के लिए जेल में बंद अरविंद केजरीवाल की सेहत के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन ने 30 जुलाई को दिल्ली के जंतर मंतर पर धरने का भी ऐलान किया है।

उधर भाजपा अभी चुनाव नतीजों की समीक्षा और उत्तर प्रदेश में पार्टी के खराब प्रदर्शन को लेकर जो मंथन कर रही है उसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके दोनों उप मुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक के बीच चल रही तकरार की खबरों ने भी पार्टी नेतृत्व का सिरदर्द बढ़ा दिया है। मीडिया में लगातार योगी बनाम मौर्य के झगड़े को लेकर चलने वाली बहसों और अटकलों को विराम देने के लिए ही उत्तर प्रदेश सरकार ने हरिद्वार कांवड़ यात्रा मार्ग की दुकानों रेहड़ी पटरी फल वालों आदि से अपना पूरा नाम लिखने का फरमान जारी कर दिया। इसके जरिए योगी आदित्यनाथ ने हिंदुत्व की राजनीति में एक बड़ी लाईन खींचकर खुद को सबसे बड़ा हिंदुत्व का चेहरा दिखाने की कोशिश की। योगी के इस दांव ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित भाजपा शासित राज्यों के अन्य मुख्यमंत्रियों को भी इसके समर्थन के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन योगी के इस दांव ने केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन को विचलित कर दिया और जद(यू) लोजपा रालोद आदि सहयोगी दलों ने इसका विरोध किया। उनके विरोध से केंद्र की भाजपा गठबंधन सरकार की वैचारिक दरारों के गहरा होने की आशंका से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने योगी सरकार के दांव पर बचाव मुद्रा अख्तियार कर ली। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर जब पहली तारीख पड़ी तो सरकार की तरफ से एक भी वकील वहां मौजूद नहीं था और अदालत को इस आदेश पर एक्स पार्टी स्थगनादेश देना पड़ा। अदालत के आदेश ने योगी के हिंदुत्व के नए दांव की धार को कुंद कर दिया। दरअसल योगी के इस दांव ने सबसे ज्यादा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को असहज किया क्योंकि मोदी ने जिस तरह अरब देशों के साथ अपने और भारत के रिश्ते मजबूत किए हैं और इस्राईल के साथ भारत की दोस्ती के बावजूद सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, कतर ईरान इराक जोर्डन इंडोनेशिया मलेशिया जैसे मुस्लिम राष्ट्र भारत के साथ खड़े हैं और फलस्तीन के मुद्दे पर भी भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी स्वतंत्र विदेश नीति जारी रखी है, योगी के सरकार के इस आदेश का दुनिया में गलत संदेश जाता जो प्रधानमंत्री मोदी नहीं चाहते हैं। इसलिए भी शायद सरकारी वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट जाकर राज्य सरकार का पक्ष रखने में उदासीनता दिखाई।

बाहर विपक्ष की लामबंदी और पार्टी के भीतर नेताओं की खेमेबंदी की दोहरी चुनौती से निबट रही भाजपा के सामने वैचारिक द्वंद भी है। द्वंद ये है कि पार्टी की एक धारा जो संघ की विचारधारा में पली बढ़ी है का मानना है कि लोकसभा चुनावों में पार्टी हिंदुत्व की अपनी लाईन से हट गई जिसके कारण पूरा चुनाव हिंदुत्व से हटकर जातीय ध्रुवीकरण पर चला गया और उसका नुकसान हुआ। जबकि दूसरे नेता जो सिर्फ हिंदुत्व को लेकर ही नहीं सोचते हैं उनका कहना है कि राम मंदिर के शिलान्यास से लेकर मुस्लिम आरक्षण तक के मुद्दे और योगी आदित्यनाथ जैसे भगवा मुख्यमंत्री के बावजूद जनता ने हिंदुत्व की बजाय संविधान, बेरोजगारी, महंगाई और जातीय जनगणना जैसे मुद्दों को पसंद किया और उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का पीडीए और राहुल गांधी का सामाजिक न्याय दलितों और पिछड़ों के बड़े हिस्से को इंडिया गठबंधन के साथ जोड़ने में कामयाब रहा जिसकी वजह से भाजपा को नुकसान हुआ। नेताओं के इस वर्ग का मानना है कि हिंदुत्व के साथ साथ पार्टी को सरकार के कामकाज को भी दुरुस्त करना होगा। उत्तर प्रदेश में होने वाले दस विधानसभा सीटों के उपचुनावों और महाराष्ट्र हरियाणा झारखंड विधानसभा चुनावों से पहले ही भाजपा को अपने इस वैचारिक असमंजस से भी मुक्ति पानी होगी और विचारधारा को पुनर्भाषित करना होगा। पार्टी की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तेवर भी भाजपा नेतृत्व की उलझने बढ़ा रहे हैं।

संघ प्रमुख मोहन भागवत के बीच बीच में आने वाले बयानों के सियासी मायने भी संकेत देते हैं कि भाजपा संघ के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। कहा ये भी जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ को संघ का पूरा समर्थन है जबकि दोनों उप मुख्यमंत्री दिल्ली के कुछ बड़े नेताओं के संरक्षण में योगी की उलझने बढ़ा रहे हैं। उत्तर प्रदेश का यह सत्ता संघर्ष 1999 का इतिहास दोहराता दिख रहा है जब तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के खिलाफ ऐसी ही गोलबंदी भाजपा में लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हो गई थी। जिस तरह 2024 में राज्य में भाजपा की सीटें 62 से 33 होने का ठीकरा योगी बनाम अन्य के द्वारा एक दूसरे के सिर फोड़ा जा रहा है उसी तरह 1999 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें 59 से घटकर 29 रह गईं थीं और तब भी इसी तरह कल्याण सिंह बनाम अन्य की लड़ाई तेज हो गई थी। जैसे 2024 में वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़त पौने पांच लाख से घटकर करीब डेढ़ लाख वोटों की रह गई है इसी तरह तब भी लखनऊ में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की बढ़त भी घटकर करीब सवा लाख वोटों की रह गई थी।

तब भी लखनऊ से तब की भाजपा के कद्दावर प्रदेश नेता दिल्ली आकर कल्याण सिंह को हटाने का दबाव बना रहे थे और आखिरकार कल्याण सिंह को हटा दिया गया।लेकिन तब और अब में एक बड़ा फर्क ये है कि अपने अहंकार में कल्याण सिंह सीधे अटल बिहारी वाजपेयी से भिड़ गए थे और उनके खिलाफ बयानबाजी करने लगे थे। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में न संयम खोया न कोई बयानबाजी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई ऐसा बयान नहीं दिया जिससे किसी तरह का विवाद हो।योगी का यही संयम और शालीनता उनकी सबसे बड़ी ताकत और रक्षा कवच बना हुआ है। कुछ ऐसा ही मंजर भाजपा में तब भी दिखाई दिया था जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 2009 के लोकसभा चुनावों में गुजरात में भाजपा की सीटें 2004 के मुकाबले घट गईं थी और कांग्रेस करीब नौ सीटें जीत गई थी।तब मोदी विरोधी खेमे ने उन्हें हटाने का दबाव केंद्रीय नेतृत्व पर बनाया था लेकिन मोदी नहीं बदले गए और उसका नतीजा भाजपा की कामयाबी के रूप में सबके सामने है। जबकि 1999 में कल्याण सिंह बदल दिए गए थे और उसके बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा लगातार कई चुनाव हारी। उसकी वापसी 2014 में तब हुई जब मोदी के नाम पर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 71 और सहयोगियों के साथ 73 सीटें जीतीं।


भाजपा के एक प्रमुख नेता के शब्दों में योगी जी की प्रदेश में और देश में अपनी एक छवि और लोकप्रियता है इसलिए अगर उन्हें बदला जाता है तो पार्टी को न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि देश में भी उसका नुकसान होगा। लेकिन दूसरी दुविधा है कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह अखिलेश यादव पीडीए के जरिए दलित पिछड़ों को गोलबंद कर रहे हैं उसे पार्टी में वापस लाना भी एक बड़ी चुनौती है। इसलिए भाजपा नेतृत्व कोई ऐसा बीच का रास्ता निकालने में जुटा है कि जिससे योगी आदित्यनाथ भी मुख्यमंत्री बने रहें और पार्टी अपना पिछड़ा और दलित जनाधार भी वापस पा सके।भाजपा के समक्ष यही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है कि ये दोनों काम कैसे साधे जाएं।

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