कोलकाता रैली में विपक्षी एकता की मरीचिका, साम्यताओं से ज्यादा अंतर्विरोध
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ममता बनर्जी के नेतृत्व में भले ही शनिवार को भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने के लिए 20 विपक्षी दलों के नेताओं ने एक मंच से बहुत बड़ी रैली को संबोधित किया लेकिन यह विपक्षी एकता टिकाऊ नहीं दिखती क्योंकि इन दलों के बीच जितनी साम्यताएं हैं उससे कहीं ज्यादा अंतर्विरोध हैं। रैली की संयोजक ममता बनर्जी इन अंतर्विरोधों का जीता जागता प्रतीक हैं। वे भाजपा के विरोध में साझा राष्ट्रीय मंच तो बना रही हैं लेकिन खुद अपने राज्य में वे अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही हैं। उनके साथ मंच पर मौजूद कांग्रेसी नेता को भी भरोसा नहीं है कि दो महीने बाद होने वाले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस उनके साथ समझौता करेगी। वाम दलों से न तो कांग्रेस तालमेल करती दिख रही है और न ही तृणमूल। यानी भाजपा-विरोधी मोर्चे के केंद्र में ही भाजपा के खिलाफ एकता नहीं हो पा रही है।
इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के खिलाफ कम से कम दो मोर्चे तो होंगे ही- सपा-बसपा और कांग्रेस। यदि किसी को संदेह हो कि कांग्रेस तो मुकाबले में ही नहीं दिख रही तो मालूम हो कि कांग्रेस के नेता प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव, राबसपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर, पीस पार्टी, अपना दल से लेकर कई छोटे-छोटे लेकिन अपने क्षेत्र में प्रभावशाली दलों से संपर्क में है। अखिलेश यादव खुद चार दिन पहले मायावती से मंच साझा करते हुए कहते नजर आए थे कि अगला प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही होगा लेकिन शनिवार को कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड पर उन्होंने उस रैली को संबोधित किया जिसे ममता बनर्जी को बतौर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार प्रोजेक्ट करने के लिए आयोजित किया गया था।
इसी तरह की हालत आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में है। हाल ही में संपन्न तेलंगाना विधानसभा चुनावों में तेलगूदेशम पार्टी और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और उन्हें तेलंगाना राष्ट्र समिति के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा। अब लोकसभा चुनाव में दोनों मिलकर लड़ेंगे, इसमें अभी संदेह है। और यदि उनका गठबंधन कायम भी रहता है तो भी त्रिकोणीय मुकाबला होगा क्योंकि टीआरएस ने जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कांग्रेस से समझौता कर लिया है।
हर ओर यही हाल
पंजाब और दिल्ली में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के मोर्चे के खिलाफ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिलकर लड़ने को तैयार ही नहीं है। ऐसी ही हालत हरियाणा में है जहां अजय चौटाला की जननायक जनता पार्टी, कांग्रेस और ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल आदि कई पार्टियां अलग अलग लड़ेंगी। सिर्फ इनेलो का समझौता बसपा से है।
तमिलनाडु में डीएमके, अन्नाडीएमके तो बीजेपी के खिलाफ लड़ेंगी ही लेकिन डीके, एमडीएमके, पीएमके जैसी कई छोटी-छोटी पार्टियां भी कई मोर्चे बनाएंगी। कांग्रेस और डीएमके का समझौता तो हो सकता है लेकिन रजनीकांत और कमलहासन की नई पार्टियों के रुख पर भी सभी की नजर रहेगी।
उड़ीसा में भी बीजेपी के खिलाफ बीजू जनता दल और कांग्रेस अलग अलग ही लड़ेंगे और यही हालत जम्मू कश्मीर में होगी जहां पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ फिलहाल अलग-अलग ही लड़ती नजर आ रही हैं। महाराष्ट्र में यदि शिवसेना का भाजपा के साथ समझौता नहीं होता तो वहां वह महानगर नवनिर्माण सेना, भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ चौंकाने वाले संघर्ष में शामिल होगी।
पहले भी हुए ऐसे प्रदर्शन
कर्नाटक में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में भी ऐसी ही एकता का प्रदर्शन हुआ था जिसमें सोनिया गांधी मायावती का हाथ थामे नजर आई थीं। लेकिन मायावती ने सपा के समझौते में कांग्रेस को शामिल न कर सोनिया के झटका दे दिया। यही नहीं, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ के शपथ ग्रहण समारोहों में भी ऐसी एकता नहीं दिखी।
गैर-भाजपा गैर-कांग्रेसी मोर्चा
टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस, बीजेडी जैसे कई दल कांग्रेस और भाजपा से बराबर की दूरी बनाए रखना चाहते हैं। उनकी कोशिश इसमें तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, सपा-बसपा जैसे कई और दलों के शामिल करने की है।