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कैसे भारतीयों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है 'सिंगल टाइम जोन'

Tue, 12 Feb 2019 12:37 PM IST
Shilpa Thakur न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Tue, 12 Feb 2019 12:37 PM IST
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Know how single time zone is affecting lives of Indian people
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pexels.com

भारत का सिंगल टाइम जोन ब्रिटिश शासन की विरासत है, इसे एकता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। लेकिन हर किसी को भारतीय मानक समय (आईएसटी) का आइडिया ठीक नहीं लगता।

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लेकिन ऐसा क्यों?

भारत की पूर्व-पश्चिम दूरी लगभग 2933 किलोमीटर है, जिसके कारण पूर्व में सूर्योदय और सूर्यास्त पश्चिम से 2 घंटे जल्दी होता है और इसीलिए उत्तर-पूर्वी राज्य के लोगों को उनकी घड़ियां आगे बढ़ने की आवश्यकता पड़ती है, जिससे सूर्योदय के उपरांत ऊर्जा का क्षय न हो। टाइम जोन के कारण बड़ी संख्या में लोगों को मुसीबत का सामना करना पड़ता है, खासतौर पर उन लोगों को जो गरीबी में रह रहे हैं।

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पूर्व में पश्चिम से दो घंटे पहले सूर्योदय होता है। सिंगल टाइम जोन के आलोचकों का कहना है कि पूर्वी भारत में दिन की रोशनी का इस्तेमाल ठीक से हो सके, इसके लिए भारत को दो अलग मानक समय के बारे में सोचना चाहिए। जिसके कारण पूर्व में रहने वाले लोगों को दिन की शुरुआत में ही लाइटों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे बिजली की अधिक खपत होती है।
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सूर्योदय और सूर्यास्त से शरीर की घड़ियों और सर्कैडियन रिदम भी प्रभावित होती हैं। जैसे-जैसे शाम ढलती जाती है, वैसे ही शरीर स्लीप हार्मोन मेलाटोनिन प्रड्यूस करता है, जिससे सोने में मदद मिलती है। 

कोर्नेल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री मौलिक जगनानी का कहना है कि सिंगल टाइम जोन नींद की गुणवत्ता को कम करता है। खासतौर पर गरीब बच्चों की नींद की गुणवत्ता इससे कम होती है। जिसके कारण उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होती है। भारत में लगभग सभी स्कूल एक ही समय पर शुरू होते हैं लेकिन जहां सूरज देरी से ढलता है वहां बच्चे देरी से सोते हैं। सूरज का एक घंटे देरी से ढलने का मतलब है, बच्चे की नींद 30 मिनट तक कम होना। इन सबका प्रभाव सबसे अधिक गरीब बच्चों पर पड़ता है, जिनके घरों में आर्थित समस्याएं रहती हैं।

उनका कहना है कि गरीब बच्चे सबसे अधिक प्रभावित इसलिए होते हैं क्योंकि उन्हें शोर, गर्मी, मच्छर और कुल मिलाकर असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। इनके पास वित्तीय संसाधनों की कमी होती है जिनका इस्तेमाल अच्छी नींद के लिए किया जाता है। न तो गरीब बच्चों को अलग से कमरा मिल पाता है और न ही ढंग के पलंग। गरीबी से न केवल तनाव बढ़ता है बल्कि निर्णय लेने पर भी प्रभाव पड़ता है।

जगनानी को अध्ययन में पता चला कि पूर्व और पश्चिम में सूर्योदय और सूर्यास्त के विभिन्न समय के कारण छात्रों के शिक्षा परिणामों पर भी प्रभाव पड़ता है। वार्षिक औसत सूर्यास्त के समय में एक घंटे की देरी से शिक्षा में 0.8 साल की कमी आ जाती है। और वो बच्चे जो उन जगहों पर रहते हैं जहां सूर्यास्त देरी से होता है, उनके प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल पूरा कर पाने की संभावना कम होती है।

उनका कहना है कि सिंगल टाइम जोन के बजाय अगर भारत दो तरह के टाइम जोन का इस्तेमाल करे तो भारत 4.2 बिलियन डॉलर (जीडीपी का 0.2%) से अधिक वार्षिक मानव पूंजी लाभ अर्जित कर सकता है। जिसमें पश्चिमी भारत के लिए यूटीसी+5 घंटे और पूर्वी भारत के लिए यूटीसी+6 घंटे हों। भारत में दो टाइम जोन को लेकर लंबे समय से चर्चा भी होती रही है। उत्तर पूर्वी राज्य असम में तो चाय के बगानों में काम करने वाले लोग अपनी घड़ी को एक घंटे आगे करके रखते हैं। 

साल 1980 में खोजकर्ताओं की एक टीम ने बिजली बचाने के लिए भारत को दो अथवा तीन समय मंडलों में विभाजित करने का सुझाव दिया। लेकिन ये सुझाव ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित समय मंडलों को अपनाने के बराबर था, इसलिए इस सुझाव को नकारा दिया गया। साल 2002 में जटिलताओं के कारण सरकार ने ऐसे ही एक और प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया। 


बीते साल भारत के आधिकारिक टाइमकीपर्स ने दो टाइम जोन का सुझाव दिया था। एक जोन अधिकांश भारत के लिए और एक आठ राज्यों के लिए। जिनमें से सात देश के सुदूर उत्तर-पूर्व में स्थित हैं। इन दोनों टाइम जोन में एक घंटे का अंतर किया जाता। खोजकर्ताओं का कहना है कि सिंगल टाइम जोन लोगों के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। क्योंकि आधिकारिक काम के घंटों की तुलना में सूर्योदय और सूर्यास्त जल्दी हो जाता है।

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