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गुजरात चुनाव: अयोध्या का क्या रिश्ता है सोमनाथ से

Thu, 07 Dec 2017 08:15 PM IST
अतुल सिन्हा/ अमर उजाला
अतुल सिन्हा/ अमर उजाला Updated Thu, 07 Dec 2017 08:15 PM IST
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know about the relation between Ayodhya and Gujarat's Somnath Temple

आखिर 25 साल बाद भी बाबरी मस्जिद ढांचे के गिराने और राम मंदिर को लेकर होने वाली सियासत का गुजरात के सोमनाथ से क्या रिश्ता है? आखिर क्यों गुजरात के चुनावी माहौल में अयोध्या की गूंज सुनाई देती है और क्यों सोमनाथ गुजरात की सियासत का मुख्य केन्द्र बन गया है? इन सवालों के जवाब आपको सोमनाथ जाने पर मिल जाते हैं।

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दरअसल 25 सितंबर 1990 को जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा की शुरूआत की और उसके बाद से देश की राजनीति ने जो उतार चढ़ाव देखे, उसका हश्र 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचे के विध्वंस और उसके बाद राम मंदिर को लेकर होने वाली सियासत के तौर पर नजर आया। 
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आडवाणी आज भी इसे सोमनाथ मंदिर का आशीर्वाद मानते हैं जिसकी बदौलत भाजपा आज इतनी मज़बूत ताकत बनकर खड़ी है। इसीलिए आडवाणी जी करीब 20 सालों तक हर 25 सितंबर को सोमनाथ जरूर जाते थे। इस मंदिर का एक ट्रस्टी होने के नाते भी आडवाणी का सोमनाथ से खास लगाव है। 
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गुजरात में जब से भाजपा सत्ता में आई तब से सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट पर इसके नेताओं का वर्चस्व है। केशूभाई पटेल इसके अध्यक्ष हैं। आठ ट्रस्टियों में फिलहाल एक जगह खाली है और बाकी ट्रस्टियों में केशुभाई और आडवाणी के अलावा नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, पी के लाहिरी, हर्षवर्धन लखोटिया और जे डी परमार हैं।

सोमनाथ आडवाणी का मुख्य केन्द्र

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सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के जनसंपर्क अधिकारी ध्रुव जोशी बताते हैं कि हमारे लिए राहुल गांधी हों या नरेन्द्र मोदी, सब बराबर हैं और राहुल गांधी के गैर हिन्दू रजिस्टर वाली इंट्री को लेकर जो विवाद मचा है, वो मीडिया ने जबरदस्ती मचाया और बाद में इसे चुनावी सभाओं में उठाया जाने लगा। 

दरअसल राहुल यहां आए और विजिटर बुक में बेहद सकारात्मक लाइनें लिखीं कि उन्हें यहां आकर बेहद सुकून मिला, लेकिन इसे राजनीतिक रंग दे दिया गया। और चूंकि अयोध्या के राम मंदिर की परिकल्पना भी सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर की जा रही है इसलिए सोमनाथ मंदिर सबकी पसंद है।

आडवाणी जी अबतक 6 रथयात्राएं निकाल चुके हैं और सोमनाथ उनका मुख्य केन्द्र रहा है। हर चुनावी अभियान की शुरूआत सोमनाथ में आशीर्वाद लेकर शुरू होती है और अब तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को भी यही जगह पसंद आने लगी है। यहां के पास ही बने त्रिवेणी संगम घाट पर मौजूद तमाम लोग यही कहते हैं कि अगर सोमनाथ नहीं आए तो चुनावी गणित कामयाब नहीं होता।
 
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखें तो 17 बार तोड़े गए इस मंदिर का जो मौजूदा स्वरूप है वह 12 साल में पूरी तरह 1962 में बनकर तैयार हुआ। सरदार पटेल ने इसे बनवाया और 1970 के बाद से इसे जामनगर की राजमाता ने और बेहतर बनाया।

जाहिर है जब अयोध्या में राम मंदिर की बात होती है, तो सोमनाथ से उसकी तुलना इसीलिए की जाती है क्योंकि उसे भी महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक ने बार बार तोड़ा और अयोध्या में बाबर ने मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई। इतिहास के इस कश्मकश में फंसी ये जंग चुनावी सियासत का एक मुख्य आधार रहा है। ऐसे में सोमनाथ और अयोध्या का सियासी रिश्ता समझा जा सकता है।

(सोमनाथ से लौटकर अतुल सिन्हा)

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