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गुरु जितेन्द्र महाराज: सिर्फ नलिनी-कमलिनी के गुरु नहीं, कथक की मंदिर शैली के जनक भी थे
Sat, 25 Feb 2023 11:49 PM IST
Jeet Kumar
अतुल सिन्हा
अतुल सिन्हा
Published by: Jeet Kumar
Updated Sat, 25 Feb 2023 11:49 PM IST
सार
गुरु जितेन्द्र महाराज अब नहीं रहे। महाशिवरात्रि के दिन यानी 18 फरवरी को उन्होंने कथक का आंगन सूना कर दिया। उनकी सबसे प्रिय शिष्या और कथक की दुनिया में करीब चार दशकों से अपना परचम लहरा रहीं नलिनी कमलिनी कहती हैं कि उनके गुरु ने उन्हें और कथक के सैकड़ों युवा कलाकारों को जो दिया वो कभी भुलाया नहीं जा सकता।
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कथक गुरु जितेन्द्र महाराज
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय शास्त्रीय नृत्य और खासकर कथक में दिलचस्पी रखने वालों के लिए नलिनी कमलिनी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। इन दोनों बहनों ने दुनिया भर में कथक को एक नई ऊंचाई तक ले जाने में अहम भूमिका निभाई है। लेकिन नलिनी और कमलिनी को इस मुकाम तक जिस गुरु ने पहुंचाया उनके योगदान को कम ही लोग जानते हैं।
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बनारस घराने के कथक गुरु जितेन्द्र महाराज जब राम स्तुति पेश करते थे, शिव की भंगिमाओं में डूबते उतराते थे या कृष्ण और राधा की रासलीलाओं की प्रस्तुति करते थे तो एक अद्भुत समां बंध जाता था। कथक की तमाम शैलियों में एक नई शैली को उन्होंने विकसित किया और वह है मंदिर शैली। बनारस के तमाम मंदिर हों या फिर देश के अलग अलग हिस्सों के मंदिर, वृंदावन का बांकेबिहारी मंदिर हो या फिर भगवान बुद्ध के प्रार्थना स्थल गुरु जितेन्द्र महाराज की प्रस्तुतियां वहां के माहौल को बेहद संगीतमय और आध्यात्मिक बनाती रहीं।
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गुरु जितेन्द्र महाराज अब नहीं रहे। महाशिवरात्रि के दिन यानी 18 फरवरी को उन्होंने कथक का आंगन सूना कर दिया। खबरों में आम तौर पर संगीत और नृत्य हाशिये पर रहता है, ऐसे में बेशक गुरु जितेन्द्र महाराज का जाना भी यूं ही एक आम घटना की तरह गुज़र गया, लेकिन उनकी सबसे प्रिय शिष्या और कथक की दुनिया में करीब चार दशकों से अपना परचम लहरा रहीं नलिनी कमलिनी कहती हैं कि उनके गुरु ने उन्हें और कथक के सैकड़ों युवा कलाकारों को जो दिया वो कभी भुलाया नहीं जा सकता।
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नलिनी और कमलिनी बताती हैं कि शिव के अनन्य भक्त और बनारस घराने की मंदिर शैली के जनक उनके गुरु को आखिरकार उनके आराध्य शिव ने महाशिवरात्रि के दिन अपने पास बुलाकर उनकी भक्ति और समर्पण को खुद में लीन कर लिया।
आज बेशक गुरु जितेन्द्र महाराज को नलिनी कमलिनी के गुरु के तौर पर ज्यादा जाना जाता हो, लेकिन नलिनी कमलिनी और उन जैसे तमाम कलाकारों को कथक की बारीकियां सिखाने का जो हुनर उनमें था, वह कम ही कलाकारों में होता है। खुद को पूरी तरह कथक के प्रति समर्पित कर देने वाले गुरू जितेंद्र महाराज के लिए कथक नृत्य केवल एक कला या आजीविका का साधन नहीं बल्कि शिव की आराधना थी। उनका जाना बनारस मंदिर शैली के लिए एक बड़ी क्षति है। जितेद्र महाराज ने अपने कला आश्रम में गुरू शिष्य परंपरा का निर्वाह करते हुए सैंकड़ों शिष्यों को अपनी कला की पूंजी सौंपी । आज देश विदेश में उनके शिष्य कथक की बनारस मंदिर शैली को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं।
गुरू जितेंद्र महाराज ने कथक की दरबार शैली के बजाए भक्ति शैली को अपनाया और खुद को नृत्य साधना के प्रति समपर्ति कर दिया। उनकी पहचान कथक के अन्य नर्तकों से अलग बनी। पूरे देश में उन्होनें भक्ति शैली के नृत्य से भगवान की आराधना की। शक्तिपीठों , महाकुंभ शैव और वैष्णव मंदिरों में अपनी प्रस्तुतियां दीं। भगवान शिव के परम धाम कैलास मानसरोवर में भी अपनी अनन्य शिष्याओं कमलिनी और नलिनी के साथ कैलासपति की नृत्य आराधना की। देश के सुप्रसिद्ध मंदिरों में जहां कभी किसी कलाकार को नृत्य का मौका नहीं दिया जाता था वहीं गुरू जितेंद्र महाराज को वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के सवा पांच सौ साल के इतिहास में पहली बार निमंत्रण मिला और वहां उन्होंने बांके बिहारी के सामने अपना नृत्य पेश किया। इस्कॉन के भारतीय और विदेशों में स्थित मंदिरों में तो उन्होनें अनेकों प्रस्तुतियां दीं। यहां तक कि बौद्ध मठों में भी उनको बुलाया गया और दलाई लामा की मौजूदगी में उन्होंने भगवान बुद्ध को नृत्यांजलि दी।
गुरू जितेन्द्र महाराज के तमाम शिष्य बताते हैं कि वो लौकिक के बजाए परलौकिक सुख में ज्यादा लीन रहते थे। जब वे क्लास नहीं ले रहे होते थे तब भी हारमोनियम पर उनकी सुरसाधना चलती रहती थी। उनकी बातचीत में भगवान शिव ही प्रमुख रहते थे। जितेंद्र महाराज कभी सांसारिक पद प्रतिष्ठा के पीछे नहीं भागे। हालांकि उन्हें उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान , नृत्य वाचस्पति और नाट्यब्रह्म शिरोमणि जैसे सम्मानों से विभूषित किया गया, अनके विश्वविद्यालयों में वे विजिटिंग प्रोफसर के रूप में शास्त्रीय नृत्य पढ़ाते रहे। बेशक गुरू जितेन्द्र महाराज ने जिस वैदिक परंपरा के जरिये नृत्य को एक नया और आध्यात्मिक आयाम दिया, उसे भूला नहीं जा सकता। खासकर नई पीढ़ी के लिए नृत्य में उनके योगदान को जानना समझना कथक को संपूर्णता में समझने जैसा है।