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किसान आंदोलन: बंदिशें लगाकर भूल तो नहीं कर बैठी सरकार, दोहरी चुनौती से निपटना होगा मुश्किल

Tue, 02 Feb 2021 07:19 PM IST
सुरेंद्र जोशी जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली  
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली   Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Tue, 02 Feb 2021 07:19 PM IST
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Kisan agitation: government will have to deal with the double challenge
किसान नेता राकेश टिकैत - फोटो : पीटीआई

आंदोलनकारी किसानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए जितनी ज्यादा बंदिशें लगाई जा रही हैं, वह उतने अधिक उग्र होते जा रहे हैं। आंदोलन स्थलों पर बढ़ती किसानों की तादाद के बाद किसान नेता खुद यह सवाल कर रहे हैं, किसानों को बांधने की भूल तो नहीं कर बैठी है केंद्र सरकार। पहले तो सरकार को केवल किसानों से ही निपटना था, गणतंत्र दिवस की घटना के बाद अब प्रत्यक्ष तौर पर विपक्षी भी सरकार के लिए सिरदर्द बन गए हैं। केंद्र सरकार को अब दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। 

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आठ से दस स्तरीय सुरक्षा घेरा, इंटरनेट बंद : दिल्ली की सीमाओं पर आठ स्तरीय सुरक्षा है। सड़कों पर लोहे और सीमेंट के बैरिकेड के अलावा नुकीली कीलें बिछाई जा रही हैं, ताकि ट्रैक्टर आगे न आ सकें। दिल्ली के तीनों आंदोलन स्थलों पर इंटरनेट बंद कर दिया गया है। हरियाणा में भी कई दिनों से अलग-अलग जिलों में इंटरनेट सेवाएं बाधित की जा रही हैं। 
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मनजीत राय बोले-केंद्र को हो गया था भ्रम : भारतीय किसान यूनियन (दोआब) के अध्यक्ष मनजीत सिंह राय के अनुसार, केंद्र सरकार को भ्रम हो गया था। वह गणतंत्र दिवस पर किसान आंदोलन को समाप्त समझ बैठी थी। केंद्र सरकार को यह अंदाजा ही नहीं था कि यह आंदोलन इतनी तेजी से आगे बढ़ जाएगा। सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया। किसानों को रोकने के लिए दुनिया में जितनी भी तकनीक हैं, वे सभी आजमा लीं। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तो एक-दो स्तर की सुरक्षा होती है, मगर यहां किसानों को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने आठ से दस स्तरीय सुरक्षा घेरा तैयार कर दिया है। 
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पीएम के बयान से उम्मीद जगी, पर सुरक्षा इंतजामों से शक

जब पीएम मोदी ने कहा, किसानों का मामला सुलझने में बस एक फोन कॉल की दूरी है तो उन्हें लगा था कि सरकार अब गंभीरता से बातचीत करना चाहती है। किसानों की यह उम्मीद जल्द ही टूट गई। सरकार ने सिंघु बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर और गाजीपुर में जारी किसानों के धरना स्थल पर सुरक्षा के जो इंतजाम किए हैं, उससे शक पैदा हो गया है। 

चक्काजाम के एलान से छूटा पसीना : छह फरवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की चक्का जाम करने की घोषणा से सरकार को पसीना आने लगा है। इसकी वजह यह है कि किसानों को राजनीतिक दलों ने अब खुलेआम समर्थन देना शुरु कर दिया।

राकेश टिकैत का मंच से निकलना, भाजपा को पड़ेगा भारी

किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत अब मंच से बाहर निकलेंगे। यानी वे अब केवल गाजीपुर तक सीमित नहीं रहेंगे।उन्होंने तय किया है कि वे तीन फरवरी को हरियाणा के जींद जिले का दौरा करेंगे। यहां पर किसानों की कंडेला खाप काफी प्रभावशाली मानी जाती है। इस जिले से कई बड़े आंदोलनों की शुरुआत हुई है। इसके अलावा टिकैत का दूसरी जगहों पर जाने का भी कार्यक्रम तय किया जा रहा है। जब से दूसरे राज्यों में किसानों को आंदोलन से जोड़ने के लिए निकलेंगे तो वहां विपक्षी दल भी रहेंगे।

संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य दर्शनपाल कहते हैं, पहले हमने तय किया था कि राजनीतिक दलों को किसानों का मंच प्रदान नहीं करेंगे। वे अपनी इच्छा से जैसा चाहें, सहयोग दे सकते हैं। अब किसान आंदोलन में विभिन्न खापों के जरिए लोगों को जोड़ा जा रहा है। हरियाणा, पंजाब, यूपी और राजस्थान से बड़ी संख्या में खाप प्रतिनिधि आंदोलन स्थल पर पहुंचने लगे हैं। इससे आंदोलन को मजबूती मिली है। गणतंत्र दिवस के बाद परिस्थितियां बदल गई हैं। राजनेता उनके मंच पर आने लगे हैं। किसान संगठनों ने इसके लिए सहमति दे दी है। 

बकौल दर्शनपाल, भाजपा सरकार इस आंदोलन को तोड़ने के लिए जितने अधिक प्रयास करेगी, यह उतना ही आगे बढ़ता जाएगा। सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया तो पहले से कहीं ज्यादा किसान आंदोलन स्थल पर पहुंच रहे हैं। सड़कों पर जितना अधिक नुकीला सामान बिछाया जा रहा है, लोग उतनी ही तेजी से इस आंदोलन के साथ जुड़ते जा रहे हैं। 

समर्थन कर रहे राहुल गांधी, संजय राउत मिलने पहुंचे

कांग्रेस पार्टी नेता राहुल गांधी लगातार किसान आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं। मंगलवार को शिवसेना के नेता संजय राउत भी राकेश टिकैत से मिलने पहुंचे। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी किसान नेता राकेश टिकैत से बातचीत करेंगे। राउत ने कहा, गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलनकारी किसानों को कुचलने की कोशिश की गई, ऐसे में महाराष्ट्र के लोगों का कर्तव्य बनता है कि वे राकेश टिकैत के साथ खड़े हों।

योगेंद्र यादव बोले-दमनकारी नीति से आंदोलन मजबूत : योगेंद्र यादव ने कहा, सरकार की दमनकारी नीति ने इस आंदोलन को और ज्यादा मजबूत बना दिया है। यह बात सही है कि भाजपा को अब दो मोर्चों पर लड़ना होगा।चूंकि विपक्ष को भी अब इस आंदोलन की समझ आ गई है। किसानों ने अभी भी किसी राजनीतिक दल से समर्थन नहीं मांगा। वे आ रहे हैं तो ठीक है। अधिकांश राजनीतिक दलों ने इस आंदोलन को समर्थन दे दिया है। जब सड़क मार्ग जाम होंगे तो सरकार को अपनी भूल का अहसास होगा। किसान संगठन पहले ही कह चुके हैं कि वे लाल किला पर हुए उपद्रव से शर्मिंदा हैं। सरकार, किसानों के सामने जितने अधिक अवरोध खड़े करेगी, आंदोलन उतना ही तेज होगा।

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