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खबरों के खिलाड़ी: केजरीवाल से अखिलेश तक अलग से कर रहे सीटों का एलान, क्या बनने से पहले बिखर रहा विपक्षी गठबंधन

Sat, 20 Jan 2024 07:07 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 20 Jan 2024 07:07 PM IST
सार

आखिर विपक्षी गठबंधन में हो क्या रहा है? क्या यह गठबंधन बनने से पहले बिखरने लगा है? अलग-अलग दलों की ओर से इस तरह के एलान के क्या मायने हैं? इन सभी सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह, प्रेम कुमार, समीर चौगांवकर और राकेश शुक्ला मौजूद रहे। 

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Khabron Ke Khiladi: Why is there no consensus in opposition regarding seat sharing For Lok Sabha Elections
खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनाव की तारीखों का एलान होने में दो महीने से भी कम का समय रह गया है। विपक्षी गठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे की अलग-अलग तारीखे घोषित होने के बाद बंटवारा नहीं हो सका है। इन सबके बीच अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दल सीटें लड़ने का एलान करने लगे हैं। केजरीवाल गुजरात जाकर भरूच सीट से उम्मीदवार उतराने का एलान करते हैं तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, रालोद के जयंत चौधरी के साथ आपसी समझौते के साथ सीटें देनें का एलान कर देते हैं। इसमें कांग्रेस कहीं नहीं दिखाई देती। ममता की पार्टी की ओर से भी बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने की बात कही जा रही है।

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आखिर विपक्षी गठबंधन में हो क्या रहा है? क्या यह गठबंधन बनने से पहले बिखरने लगा है? अलग-अलग दलों की ओर से इस तरह के एलान के क्या मायने हैं? इन सभी सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह, प्रेम कुमार, समीर चौगांवकर और राकेश शुक्ला मौजूद रहे। 
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प्रेम कुमार: इंडिया गठबंधन बिखरे हुए विपक्ष का एक समुच्चय है। सीट शेयरिंग को लेकर स्थानीय स्तर पर जो प्रतिक्रियाएं हैं वह स्वाभाविक हैं। यह एक पार्टी के भीतर भी होता है, तो गठबंधन में क्यों नहीं होगा, यह सोचने का विषय है। मूल बात यह है कि किसी दल ने विपक्षी गठबंधन से हटने की बात की है क्या? तो इसका जवाब है नहीं। यह कहा जा रहा है कि देर हो रही है, तो क्या अकेले इंडिया गठबंधन को ही चुनाव लड़ना है। दूसरी ओर भी कोई एलान नहीं हुआ है। 
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अलग-अलग मतों के बाद भी यह गठबंधन एक बना हुआ है। अगर बिखराव होता है तो यह बातें जरूर आएंगी। अगर बिखराव नहीं होता है तो यह कहना गलत होगा। अखिलेश यादव ने अगर रालोद की सीटों की घोषणा की तो यह भी इंडिया गठबंधन की आपसी समझ का हिस्सा है। मुझे लगता है कि 2019 में जो नहीं हुआ था वह 2024 को होता हुआ दिख रहा है। मुझे नहीं लगता है इसमें कोई देरी नहीं हो रही है। यह रणनीतिक तौर पर किया जा रहा है। 

बिहार में 2019 में 39 सीटें एनडीए को मिलीं थीं। क्या 2024 में इतनी सीटें मिलेंगी? उत्तर प्रदेश भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ है। यह इंडिया गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। पश्चिम बंगाल में क्या भाजपा अपनी सीटें बढ़ा लेगी? दूसरी ओर कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश, छत्तीसढ़, राजस्थान सब जगह संभावनाएं हैं। 

रामकृपाल सिंह: मुझे तो इस गठबंध का छाता अब तक दिखा ही नहीं है। जो चीज बनी ही नहीं तो उसके टूटने की बात कहां से आ गई। जो कुछ वर्चुअली हुआ है। अगर इन लोगों को ही जल्दी नहीं है तो भाजपा को जल्दी क्यों होगी। मैंने एक बात पहले भी कही थी, विचार नहीं सच्चाई जो होती है वह वस्तुपरक होती है, घटनापरक होती है। भाजपा को छोड़कर सभी विपक्षी दलों ने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति की है। कौन चाहेगा कि वह अल्पसंख्यक मतदाता दूसरे दल के पास चला जाए। 

आप नाम ले रहे थे नीतीश कुमार का। आज की तारीख में यह पता नहीं है कि वो कहीं भाजपा के साथ नहीं चले जाएं। अगर वह 17 सीटों पर नहीं लड़ते हैं तो उनकी पार्टी में बगावत हो जाएगी। यह सच्चाई है। बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के साथ दिल्ली, पंजाब और झारखंड को मिलाकर करीब ढाई सौ सीटें हैं। अगर इनमें से सौ सीटों पर भी कांग्रेस नहीं लड़ती तो क्या करेगी। मेरा मानना है कि अगर यह गठबंधन बन जाए तो यह दुनिया का नौंवा आश्चर्य होगा। 

राकेश शुक्ला: जून में जब इस गठबंधन की योजना बनी, उस वक्त एक बड़ा ब्लू प्रिंट बताया गया। कहा गया है कि अगस्त सितंबर तक सब तय कर लिया जाएगा और अक्तूबर से रैलियां शुरू हो जाएंगी। हुआ यह कि जून से जनवरी तक संयोजक, अध्यक्ष तक नहीं तय हुआ। सीट शेयररिंग की बात ही छोड़ दीजिए। दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण विषय है कि जिस व्यक्ति ने पूरी पहल की वही गठबंधन छोड़कर जाने की स्थिति में दिख रहा है। ममता बनर्जी भी दरवाजे पर खड़ी दिखाई दे रहीं हैं। 

मुझे लगता है कि उत्तर प्रदेश में जो एलान किया गया है वह अगर इंडिया गठबंधन की तरफ से है तो सभी दलों को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके एलान करना चाहिए था कि रालोद को इंडिया गठबंधन की ओर से सीटें दी जा रही हैं न कि अखिलेश यादव को अकेले एलान करना चाहिए था। महागठबंधन आज की तारीख में एक कल्पना है। आम मतदाता को विपक्ष ने असमंजस में डाल रखा है। 

समीर चौगांवकर: 23 जून को विपक्ष की पहली बैठक हुई थी। 23 जनवरी को सात महीने हो जाएंगे। इन सात महीनों में विपक्ष कोई भी फैसला नहीं कर पाया है। केजरीवाल भरूच जाकर अपने उम्मीदवार का एलान कर देते हैं। ममता कहती हैं कि दो सीट से ज्यादा नहीं दूंगी। शिवसेना कहती है कि मुंबई की छह और कोंकड़ की सात सीटों पर लड़ेंगे। कांग्रेस कहती है कि नहीं मुंबई की तीन सीटों पर हम भी लड़ेंगे। मुझे लगता है कि सब अपने-अपने टापू के सुल्तान हैं। नीतीश को लग रहा है कि 17 से कम सीटों पर लड़ेंगे तो हमारे सांसद भाजपा में चले जाएंगे। लालू को लग रहा है कि मौका मिला है तो ज्यादा सीटें लेकर जीत लें। जबकि, 2019 में उनका खाता तक नहीं खुला था। 


विपक्ष के पास अपना अस्तिव बचाने की लड़ाई है। कांग्रेस को यह देखना है कि हम कैसे अपनी सीटें को सख्या को बढ़ाएं कि हमारे पास कम से कम नेता प्रतिपक्ष की सीट मिल सके। आज की तारीख में भाजपा ने खुद को इतना मजबूत कर लिया है कि उसे यह तय करना है कि वह कैसे 400 सीटों के लक्ष्य को हासिल कर सकती है। जो पार्टी 16 राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा वोट लेकर आ रही है उसे आप कैसे रोकेंगे। विपक्षी दल अकेले तो भाजपा को बिलकुल नहीं रोक सकते हैं। साथ आते हैं तब भी भाजपा को रोकना बड़ी चुनौती होगी। विपक्ष को मिलकर लड़ना चाहिए, लेकिन अभी की स्थिति में यह मेढक को तराजू में तौलने जैसी स्थिति है।

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