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Khabron Ke Khiladi: राजनीतिक दलों के लिए क्या संदेश देंगे महाराष्ट्र के चुनाव? बता रहे हैं खबरों के खिलाड़ी

Sat, 02 Nov 2024 09:02 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Sat, 02 Nov 2024 09:02 PM IST
सार

Maharashtra Assembly Election 2024: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की निगाहें हैं। इन चुनावों के नतीजों पर बहुत कुछ निर्भर है और इसमें राजनीति के गहरे निहितार्थ भी छिपे हैं। महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे क्यों अहम हैं? इनका भारतीय राजनीति पर क्या असर होगा? ऐसे ही सवालों पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई।

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Khabron Ke Khiladi: What message will the Maharashtra elections give to political parties?
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

देश में इस वक्त चुनाव की बयार बह रही है। नजरें सबसे ज्यादा महाराष्ट्र पर टिकी हैं। काफी खींचतान के बाद नामांकन की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है और अब बड़ा सवाल है कि जमीन पर क्या खिचड़ी पक रही है। अभी सीएम पद के लिए एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे आगे बढ़कर ताल ठोक रहे हैं, लेकिन दबे स्वर में सभी पार्टियां अपने-अपने समीकरण बैठाने में जुटी हैं। अब देखने वाली बात होगी कि महाराष्ट्र में क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य क्या होगा और इससे राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा-कांग्रेस को कितनी चुनौती मिलेगी। इस बार खबरों के खिलाड़ी में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। इस चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार,  राकेश शुक्ला, समीर चौगांवकर और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।

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राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टियां, कौन सा विकल्प बेहतर?
रामकृपाल सिंह

राजनीति में चुनौतियां हमेशा रहती हैं, लेकिन एक बात हाल ही में अखिलेश यादव ने बहुत अच्छी कही कि राजनीति में त्याग की उम्मीद मत कीजिए। उन्होंने बहुत सही बात कही है। कांग्रेस ने भी इस बात को समझ लिया है और उन्होंने भी त्याग करना छोड़ दिया है। INDIA गठबंधन की असली परीक्षा राज्यों के चुनाव में ही है। यहां कोई त्याग नहीं करना चाहता।  कुछ पुर्जे गलत कार में फिट हो गए हैं , हो सकता है चुनाव के बाद वो अपनी मूल जगह पर चले जाएं। चुनाव बाद कोई भी पार्टी कहीं भी जा सकती हैं।
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अवधेश कुमार
महायुति और महा विकास अघाड़ी, दोनों गठबंधनों में समस्याएं हैं। एकनाथ शिंदे की शिवसेना और उद्धव ठाकरे की तार्किक राजनीति की परिणिती क्या हो सकती है? चुनाव बाद दोनों में से कोई भी कहीं भी जा सकता है। 'बटेंगे तो कटेंगे' नारे का असर भी होगा। महाराष्ट्र में ये भी बड़ा फैक्टर होगा। हालांकि भाजपा इस मुद्दे को कितना आगे ले जा पाएगी, उस पर भी बहुत कुछ निर्भर होगा। 

क्या उद्धव ने बाला साहब ठाकरे की लाइन से हटकर गलती कर दी?
राकेश शुक्ला

महाराष्ट्र चुनाव में जो सबसे अहम चीज है वो ये है कि अजित पवार और उद्धव ठाकरे पाला भी बदल सकते हैं। नवाब मलिक को लेकर कहा जा रहा है कि उससे गठबंधन में गांठ पड़ गई है, लेकिन मुझे लगता है कि वो रणनीति के तहत उतारे गए हैं ताकि महा विकास अघाड़ी के उम्मीदवार अबु आजमी को नुकसान पहुंचाया जाए। मानखुर्द सीट पर नवाब मलिक के उतरने से अबु आजमी के माथे पर सिकन उभर आई है। हो सकता है कि अबु आजमी की नैया डूब जाए। इससे सपा की महाराष्ट्र में अपने पैर जमाने की कोशिश भी प्रभावित होगी।

अनुराग वर्मा
बागी हर चुनाव में कहीं न कहीं खेल बिगाड़ते हैं। महाराष्ट्र चुनाव में सबसे अहम संदेश ये होगा कि क्या क्षेत्रीय दलों की राजनीति खत्म हो रही है? पहली बार उद्धव ठाकरे की पार्टी अपने पारंपरिक हिंदू वोट के बगैर चुनाव लड़ रही है। वहीं अजित पवार अपने पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक के बिना चुनाव लड़ रहे हैं। आपके पास नाम तो है लेकिन क्या वो लेगेसी है या नहीं? इस चुनाव से पता चलेगा कि जनता शख्सियत देखकर वोट करेगी या विचारधारा पर। लोकसभा चुनाव में भाजपा राम मंदिर के मुद्दे को नहीं भुना पाई और राहुल गांधी ने संविधान को लेकर नैरेटिव गढ़ दिया। 


क्या क्षेत्रीय दलों का बना रहेगा दबदबा?
समीर चौगांवकर

महाराष्ट्र में बीते 20 वर्षों में कोई भी दल अपने दम पर सत्ता में नहीं आया। 2014 में भाजपा ने केंद्र में विशाल बहुमत से सत्ता पाई, लेकिन महाराष्ट्र में उस वक्त भी भाजपा को क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहना पड़ा था। जब शिवसेना महा विकास के साथ गई तो चर्चा थी कि अब भाजपा अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, लेकिन स्थिति पुरानी जैसी ही रही। महाराष्ट्र में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को क्षेत्रीय दलों के सामने घुटने टेकने ही पड़े। जिस तरह से सीटों की अदला-बदली हुई और सीटों का बंटवारा हुआ, उससे ये बात और साफ हो गई है। अजित पवार ने भी नवाब मलिक को टिकट देकर इसके साफ संकेत दे दिए हैं कि महाराष्ट्र में क्षेत्रीय दलों का दबदबा बना रहेगा। सीटें कम ज्यादा हो सकती हैं, लेकिन क्षेत्रीय दलों का प्रभाव राज्य में आगे भी रहेगा। 

विनोद अग्निहोत्री
महाराष्ट्र आज से नहीं शिवाजी के समय से केंद्र को चुनौती देता रहा है। महाराष्ट्र में क्षेत्रीय अस्मिता का बड़ा जोर है, जिसकी वजह से वहां क्षेत्रीय दलों का दबदबा बना रहेगा। वैसे भी सीटों का बंटवारा जैसे हुआ है, उससे भी साफ है कि राष्ट्रीय दल अपने बहुमत पर सरकार नहीं बना पाएंगे और उन्हें क्षेत्रीय दलों का सहारा लेना ही पड़ेगा। देखना ये है कि अगर उद्धव ठाकरे को सीएम की कुर्सी मिल जाती है तो क्या वह भाजपा के साथ आ सकते हैं। आज की तारीख में महायुति जो लोकसभा चुनाव के बाद कमजोर दिख रही थी, और अब वह टक्कर में आ गई है, उसमें एकनाथ शिंदे की अहम भूमिका है। उन्होंने जिस तरह से योजनाओं की बरसात की और पार्टी का नेतृत्व किया, उससे उनका दावा भी मजबूत है। चुनाव एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे ही होगा। महाराष्ट्र में इस बार सामाजिक समीकरण बहुत उलट-पलट हैं। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण, ओबीसी में इसे लेकर नाराजगी जैसे मुद्दों पर भी नजरें रहेंगी।

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