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Khabron ke khiladi: हरियाणा में जीतकर कैसे बाजीगर बनी भाजपा, खबरों के खिलाड़ी ने बताई कांग्रेस की हार की वजह?

Sat, 12 Oct 2024 03:33 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Sat, 12 Oct 2024 03:33 PM IST
सार

हरियाणा में कांग्रेस की हार ने कई राजनीतिक विश्लेषकों और खुद कांग्रेस पार्टी को चौंका दिया है। कांग्रेस हार के कारणों पर मंथन कर रही है और उन कारणों पर चर्चा हो रही है, जिनकी वजह से हरियाणा में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। अमर उजाला के खबरों के खिलाड़ी के विशेषज्ञों का जानिए क्या कहना है।

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Khabron ke khiladi tells reason congress defeat in haryana election bjp strategy win amar ujala analysis
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बीते मंगलवार हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए। नतीजों के बाद भाजपा की जीत के साथ ही कांग्रेस की हार की भी चर्चा बहुत हो रही है। मतदान होने से पहले से लेकर एग्जिट पोल तक जिस पार्टी की जीत की संभावना बताई जा रही थी, वो आखिर कैसे हार गई? जिस भाजपा के लिए भारी एंटी इनकंबेंसी की बात कही जा रही थी, उसने कैसे इसे प्रो-इनकंबेसी में बदल दिया। इस हफ्ते 'खबरों के खिलाड़ी' में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार राखी बख्शी और राकेश शुक्ल मौजूद रहे।
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समीर चौगांवकर: कांग्रेस बहुत मजबूत स्थिति में लग रही थी। 10 साल की एंटी इनकंम्बेंसी की बात उठ रही थी। इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों की भी चर्चा रही। इस चुनाव में हरियाणा की 10 में से पांच सीटें कांग्रेस ने जीतीं, जबकि 2019 में उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी। राज्य की दोनों आरक्षित लोकसभा सीटों पर भी कांग्रेस को जीत मिली। इन सब वजहों से कहा जा रहा था कि कांग्रेस बहुत बेहतर स्थिति में है। मनोहर लाल खट्टर के बारे में कहा जा रहा था कि पार्टी ने उन्हें बहुत देर से बदला। इसके साथ ही नायब सिंह सैनी के कार्यकाल को भी बहुत ज्यादा प्रभावशाली नहीं माना जा रहा था। जाट वोटर भाजपा से नाराज बताया जा रहा था। इसके साथ ही किसानों और पहलवानों की नाराजगी की बात कही जा रही थी। ये सभी चीजों को देखते हुए यह कहा जा रहा था कि कांग्रेस की स्थिति बहुत मजबूत है। जमीन स्तर पर भले ही भाजपा की स्थिति कमजोर थी, इसके बाद भी भाजपा चुनावी दौड़ से बाहर नहीं हुई थी। मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही बताया जा रहा था। इन सबके बीच जमीनी स्तर पर जिस तरह से संघ ने काम किया, जबकि कांग्रेस ने अति आत्मविश्वास दिखाया और उसे लगा कि जीत उसे तश्तरी में परोसी जा रही है। कुमारी सैलजा की नाराजगी ने भी इस पर असर डाला। 
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अवधेश कुमार: एक कहावत है कि सफलता आपकी बहुत सी कमियों को ढंक लेती है। सफलता का श्रेय लेने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे। विफलता की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। इस समय हरियाणा कांग्रेस के स्थानीय नेता बाहर निकलकर क्या बोल रहे हैं? इस समय कांग्रेस के नेता खुलेआम टीवी चैनलों पर आकर जो बता रहे हैं, उससे पता चलता है कि कांग्रेस इस वक्त नेतृत्व, नीति और व्यवहार, तीन स्तर पर गंभीर संकट से गुजर रही है। जब तक इसमें बदलाव नहीं होगा, तब तक इस तरह के नतीजे आते रहेंगे। 
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राकेश शुक्ल: लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी को इस तरह से प्रोजेक्ट किया गया कि लोकप्रियता में वह प्रधानमंत्री से बस एक अंगुल पीछे रह गए हैं। जिन मुद्दों पर राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव में सफलता मिली, उन मुद्दों को लेकर वह हरियाणा नहीं गए। राहुल गांधी ने जहां प्रचार किया, वहां 13 में केवल पांच सीटों पर कांग्रेस जीती। इसका मतलब यह हुआ कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी जहां खड़े थे, वहीं आज भी हैं। 

रामकृपाल सिंह: पिछले 10 साल में जितने भी चुनाव रहे हैं। सभी में यह बात हुई कि चेहरा नहीं है, इसलिए मुश्किल होगी, लेकिन हर चुनाव में यह बात गलत साबित हुई। चाहे मध्य प्रदेश हो, राजस्थान हो, छत्तीसगढ़ हो या 2017 का उत्तर प्रदेश हो। संकेत पूरी तरह से साफ हैं कि जो पिरामिड के निचले हिस्से में है, आप उसे देखिए कि उसको क्या हो रहा है। अगर आपको सफलता मिलती है तो वो अंहकार का पैकेट लेकर भी आती है। चार जून को आए नतीजे के बाद चार महीने में आपने भाजपा को विक्टिम कार्ड खेलने का मौका दे दिया। ये सारी चीजें पलट गईं। हम पिरामिड के शीर्ष को देखकर चीजें तय करते हैं, पिरामिड का निचला हिस्सा देखना भूल जाते हैं। 

राखी बख्शी: कांग्रेस को कहीं न कहीं अति आत्मविश्वास की वजह से नुकसान पहुंचा। इतने सारे चेहरे टीवी पर आकर अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा की बात कर रहे थे। कहीं न कहीं यही कांग्रेस को ले डूबा। कुमारी सैलजा के अनमना रहने, भूपेंद्र हुड्डा का हर चीज पर हावी रहने का भी असर पड़ा। दूसरी तरफ भाजपा ने हर चीज पर होमवर्क किया। संघ और भाजपा के बेहतर तालमेल का भी सत्ताधारी दल का फायदा मिला। 


विनोद अग्निहोत्री: जब आप नतीजा तय करके उसके हिसाब से आकलन करते हैं तो कई बार आपके अनुमान गलत साबित होते हैं। अगर जीता हुआ चुनाव हारना है तो यह कांग्रेस से सीखना चाहिए। पहले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और अब हरियाणा। वहीं, अगर हारा हुआ चुनाव जीतना है तो यह भाजपा से सीखना चाहिए। यह भारतीय राजनीति में शोध का विषय है। सारा चुनाव हुड्डा के इर्द-गिर्द हो गया। किसान का मतलब जाट हो गया। पहलवान के मुद्दे को आप महिला अस्मिता का मुद्दा नहीं बना पाए। दलित वोट बंट गया। इसका बड़ा हिस्सा भाजपा को चला गया। जो अखिलेश यादव के साथ 2022 में हुआ था, वही यहां कांग्रेस के साथ हुआ है। कांग्रेस में चुनाव उम्मीदवार लड़ता है और भाजपा में चुनाव पार्टी लड़ती है। इसीलिए उनका कमजोर उम्मीदवार भी जीत जाता है।
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